बिहार में जातीय जनगणना से किसे नफा और किसे नुकसान, समझिए आंकड़ों का गणित
बिहार में जातिगत जनगणना को लेकर सियासी पारा चढ़ा हुआ है। भारतीय जनता पार्टी ने पहले तो जातीय जनगणना पर सहमति नहीं जताई थी लेकिन अब बिहार में नीतीश कुमार के सामन सरेंडर करते हुए हामी भर दी है।
पटना, 2 जून 2022। बिहार में जातिगत जनगणना को लेकर सियासी पारा चढ़ा हुआ है। भारतीय जनता पार्टी ने पहले तो जातीय जनगणना पर सहमति नहीं जताई थी लेकिन अब बिहार में नीतीश कुमार के सामन सरेंडर करते हुए हामी भर दी है। जातीय जनगणना के मुद्दे पर नीतीश कुमार के समर्थन राष्ट्री य जनता दल भी है। जातीय जनगणना से बिहार में किस पार्टी को क्या नफा और क्या नुक्सान है इसके लिए आंकड़ों के गणित को समझना ज्यादा ज़रूरी है। फिलहाल जातिगत जनगणना से जनता दल यूनाइटेड को फायदा होने की उम्मीद दिख रही है।
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बिहार में होगी जातीय जनगणना
जातीय जनगणना का मुद्दा नेताओं द्वारा समय-समय पर उठाया जाता रहा है। कई नेता जातीय जनगणना के पक्ष मंक होते हैं वहीं कुछ नेता इसके पक्ष में नहीं रहते हैं। ग़ौरतलब है कि ज्यादातर यही देखा गया है कि जातीय जनगणना के मुद्दे को विपक्ष ही उठाता रहा है। इस बार बिहार में राजद और जदयू दोनो ही जातीय जनगणना के पक्ष में नज़र रही है। ग़ौर करने वाली बात है कि अब भाजपा भी बिहार में जातीय जनगणना के समर्थन में है।

कांग्रेस सरकार ने भी करवाई थी जातीय जनगणना
जातीय जनगणना पर सियासत की क्या वजह है, अगर इस मुद्दे पर ज़िक्र किया जाए तो इसके पीछे बड़ा सियासी खेल है। 2010 में केंद्र में कांग्रेस की सरकार के वक़्त भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे ने संसद में जातिगत जनगणना की मांग की थी। लेकिन अब जब केंद्र में भाजपा की सरकार है तो केंद्र सरकार जातीय जनगणना नहीं लागू करना चाह रही है। ग़ौरतलब है कि 2011 में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने भी जातीय जनगणना करवाई थी लेकिन आंकड़े जारी नहीं किए गए थे। देश की बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों में कांग्रेस और भाजपा है लेकिन दोनों ही जातीय जनगणना नहीं कराने के समर्थन में है।

जातीय जनगणना से क्षेत्रीय पार्टियों को हो सकता है फ़ायदा
भाजपा और कांग्रेस का जातीय जनगणना को लेकर रुख एक ही है, इसके पीछे की सियासी वजहों को देखा जाए तो भाजपा की हिंदुत्व की सियासत करती है। जातीय जनगणना की वजह से क्षेत्रीय राजनीति में वोटों का बंटवारा हो सकता है जिसका सीधा फ़ायदा क्षेत्रीय दलों को होगा और भाजपा को वोट बैंक का ध्रुवीकरण हो जाएगा। ठीक इसके उलट कांग्रेस भी राष्ट्रीय पार्टी है और वह भाजपा की खामियों पर सियासत कर रही है। अब सियासी समीकरण बदल चुके हैं कई क्षेत्रीय पार्टियां खास जाती की ही सियासत कर रही हैं। ऐसे में जातीय जनगणना होने से राष्ट्रीय पार्टियों के वोट बैंक का ध्रुवीकरण होना मुमकिन है। क्योंकी जातीय जनगणना से क्षेत्रीय पार्टियों की सियासत को पंख लग सकता है।

आखिरी बार कब हुई थी जातीय जनगणना ?
एक लफ़्ज़ में कहा जाए तो जाति के आधार पर हुई गणना को जातीय जनगणना की संज्ञा दी जाती है। इस जनगणना की मदद से सही आबादी की जानकारी मिल जाती है। अंग्रेज़ों के हुकुमत के दौरान भारत में आखिरी बार 1931 में जातीय जनगणना हुई थी। भारत आजाद होने के बाद आज तक जातीय जनगणना नहीं हुई। 1942 में एक बार जातीय जनगणना हुई भी तो उसके आंकड़े जारी नहीं किए गए। फिर 2011 में यूपीए की कार्यकाल के दौरान जातीय जनगणना लेकिन कुछ कमिया बताते हुए रिपोर्ट जारी नहीं हुए। जातीय जनगणना के नफा की बात की जाए तो इससे देश की पिछड़ी जातियों का सही आंकड़ा मिल पाएगा। इसके साथ ही पिछड़ेपन की शिकार जातियों को आरक्षण का देकर सशक्त भी बनाया जा सकता है। इससे किसी भी जाति की आर्थिक, सामाजिक और शिक्षा की भी सही जानकारी मिल पाएगी। जिससे विकास योजनाएं बनाने में भी आसानी होगी।

1951 में सरदार पटेल ने भी खारिज किया था प्रस्ताव
बिहार में एक बार जातीय जनगणना का जिन्न निकल आने के साथ ही सियासत भी शुरू हो चुकी है। जानकारों की मानें तो जातीय जनगणना से अगर फ़ायदे हैं तो उसके नुकसान भी हो सकते है। जातीय जनगणना के बाद अगर किसी समाज को उनके घटने की जानकारी मिलेगी तो वह अपनी तादाद बढ़ाने के लिए परिवार नियोजन छोड़ सकते हैं। जिसकी वजह से देश की आबादी बढ़ेगी। इसके साथ ही समाजिक स्थिरता क़ायम रखने में भी मुश्किल पैदा हो सकती है। इसी वजह तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल ने साल 1951 में इसी तर्क के साथ जातीय जनगणना के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।
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