Bihar Voter List 2025: क्या वोटर लिस्ट रिवीजन में 'आधार कार्ड' का न होना बना विवाद की असली वजह?
Bihar Voter List 2025: बिहार की राजनीति इन दिनों सिर्फ गठबंधनों और चुनावी रणनीतियों तक सीमित नहीं रही है। इस बार मुद्दा है -मतदाता सूची (Voter List) के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) का, जिसे विपक्षी पार्टियां 'वोटबंदी' करार दे रही हैं। तो सवाल उठता है - क्या वाकई ये मतदाता सत्यापन प्रक्रिया लोकतंत्र के लिए खतरा बन सकती है? या फिर यह सिर्फ एक जरूरी प्रशासनिक कार्यवाही है? बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का काम चल रहा है। इस प्रक्रिया के तहत हर मतदाता से दस्तावेज सत्यापन मांगा जा रहा है। लेकिन दस्तावेजों की सूची में आधार कार्ड को शामिल नहीं किया गया है। जिसको लेकर विवाद हो रहा है।
10 विपक्षी दलों यानी INDIA गठबंधन के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी से मुलाकात की। नेताओं का आरोप है कि इस प्रक्रिया में मांगे गए दस्तावेज आम लोगों के पास इतनी जल्दी तैयार नहीं होंगे, जिससे राज्य के 2-3 करोड़ लोगों के वोट कट सकते हैं। उनका कहना है कि इस प्रक्रिया से गरीब, ग्रामीण, श्रमिक और सामाजिक रूप से वंचित वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होगा।

विपक्ष के आरोप- "यह नोटबंदी जैसी वोटबंदी है"
कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने इस प्रक्रिया की तुलना सीधे 2016 की नोटबंदी से की और कहा की है। उन्होंने कहा, "नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था बर्बाद की थी, अब यह 'वोटबंदी' लोकतंत्र को बर्बाद करेगी।" उनका मानना है कि यह प्रक्रिया सुनियोजित तरीके से वोटर डेटा को प्रभावित करने की कोशिश है, खासकर उन तबकों का नाम काटने की, जो सत्ता पक्ष के खिलाफ माने जाते हैं।
कांग्रेस नेता और राज्यसभा सदस्य अभिषेक मनु सिंघवी ने पूछा कि क्या 2003 में वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण के बाद से हुए चुनाव त्रुटिपूर्ण थे।
उन्होंने कहा, "सबसे पहले, हमने कहा कि आखिरी संशोधन 2003 में हुआ था। 22 वर्षों में, बिहार में चार या पांच चुनाव हुए हैं। क्या वे सभी चुनाव दोषपूर्ण या अपूर्ण या अविश्वसनीय थे?" उन्होंने कहा, "आज आप इसे जुलाई में कर रहे हैं, भारत के दूसरे सबसे बड़े आबादी वाले राज्य में चुनावी पुनरीक्षण अभ्यास के लिए अधिकतम एक या दो महीने की अवधि है, जिसमें लगभग 8 करोड़ मतदाता हैं। आप इसे एक या दो महीने में करना चाहते हैं।"
दस्तावेजों की लंबी लिस्ट, लेकिन उसमें आधार कार्ड नहीं है शामिल
चुनाव आयोग ने मतदाता सत्यापन के लिए 11 दस्तावेजों की सूची जारी की है, लेकिन आधार कार्ड, पैन कार्ड, राशन कार्ड, मनरेगा जॉब कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस जैसे आम उपयोग के पहचान पत्र इसमें शामिल नहीं हैं। चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण के लिए 11 दस्तावेजों की एक सूची जारी की है।ये दस्तावेज हैं...
- केंद्र या राज्य सरकार के नियमित कर्मचारियों अथवा पेंशनधारकों को प्राप्त पहचान पत्र या पेंशन भुगतान आदेश।
- 1 जुलाई 1987 से पूर्व जारी कोई वैध पहचान पत्र या प्रमाण-पत्र - जिसे सरकार, स्थानीय निकाय, बैंक, डाकघर, एलआईसी या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSU) ने जारी किया हो।
- जन्म प्रमाण पत्र, पासपोर्ट या कोई मान्य शैक्षणिक प्रमाण पत्र।
- राज्य सरकार द्वारा जारी किया गया मूल निवास प्रमाण पत्र।
- ओबीसी, एससी या एसटी वर्ग का वैध जाति प्रमाण पत्र।
- वन अधिकार कानून के तहत जारी अधिकार पत्र।
- राज्य सरकार या स्थानीय निकाय द्वारा जारी पारिवारिक रजिस्टर की प्रति।
- सरकारी एजेंसी द्वारा जारी कोई वैध घर या ज़मीन का स्वामित्व प्रमाण पत्र।
- एनआरसी दस्तावेज (हालांकि यह बिहार में लागू नहीं है)।
नोट: इन दस्तावेजों में से कोई एक देना अनिवार्य है, जिससे आपकी पहचान और पात्रता सुनिश्चित की जा सके। सत्यापन की अंतिम तिथि 26 जुलाई 2025 है।
यह बात विपक्ष के आरोप को और मजबूती देती है कि आम जनता के लिए दस्तावेज जुटाना मुश्किल होगा। जबकि आज भी सरकार की अधिकांश सेवाएं आधार के जरिए ही दी जाती हैं -तो फिर वोटर सूची सत्यापन में इसे मान्यता क्यों नहीं दी जा रही?
चुनाव आयोग ने आधिकारिक तौर पर इसे "नियमित पुनरीक्षण" बताया है, जो हर चुनाव से पहले किया जाता है। लेकिन विपक्ष का कहना है कि जब इसमें सामान्य दस्तावेजों को नकार दिया जाता है और समयसीमा इतनी कम रखी जाती है -तब यह संदेह पैदा करता है कि कहीं ये किसी खास सियासी मकसद के तहत तो नहीं हो रहा? इसका असर न सिर्फ राज्य की वोटर टर्नआउट पर पड़ेगा, बल्कि यह चुनाव परिणामों को भी बड़ी हद तक प्रभावित कर सकता है।
बिहार वोटर लिस्ट रिवीजन में आधार को वैध दस्तावेज क्यों नहीं माना गया?
आधार कार्ड को दस्तावेज में शामिल नहीं करने के चुनाव आयोग के फैसले को लेकर आम जनता से लेकर राजनीतिक दलों तक सवाल खड़े कर रहे हैं। सवाल यह है कि जब आधार कार्ड देश के हर सरकारी और निजी कार्य में अनिवार्य या मान्य है, तो वोटर लिस्ट रिवीजन में इसे खारिज क्यों किया गया?
विपक्षी पार्टियों ने सवाला उठाया है कि चुनाव आयोग आधार कार्ड से वोटर लिस्ट को क्यों नहीं लिंक कर रहा है? सोशल मीडिया पर आम यूजर कह रहे हैं कि केंद्र सरकार द्वारा आधार कार्ड की प्रासंगिकता और स्वीकार्यता इतना क्यों बढ़ाया गया, जब वोटर लिस्ट के लिए यह आवश्यक ही नहीं है! चुनाव आयोग के मंशा पर सवाल है।
चुनाव आयोग आधार कार्ड को 'स्वैच्छिक पहचान दस्तावेज' मानती है, न कि अनिवार्य। सुप्रीम कोर्ट ने भी 2018 के अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि आधार का इस्तेमाल केवल कल्याणकारी योजनाओं के वितरण तक सीमित रहेगा और इसे नागरिकता या मताधिकार का आधार नहीं बनाया जा सकता। आधार अधिनियम 2016 के मुताबिक आधार का उपयोग नागरिकता सिद्ध करने के लिए नहीं किया जा सकता।
आधार कार्ड देश का सबसे अधिक उपलब्ध और सरल पहचान पत्र है। ग्रामीण व गरीब तबकों के पास अक्सर अन्य दस्तावेज नहीं होते, लेकिन आधार जरूर होता है। विपक्ष का आरोप है कि जिन लोगों के पास केवल आधार है, उनके वोट कट सकते हैं। इससे लाखों लोग मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं। कुछ दलों का मानना है कि यह एक रणनीतिक कदम है जिससे चुनाव परिणामों को प्रभावित किया जा सके -खासकर गरीब, दलित और पिछड़े वर्गों के वोटों को कमजोर करके।












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