Bihar Politics: बिहार में नीतीश कुमार क्यों बन गए बीजेपी की मजबूरी? इसकी 5 वजहें जानिए

Bihar politics news: बिहार में पिछली बार नीतीश कुमार ने जिस तरह से बीजेपी का साथ छोड़कर लालू यादव के आरजेडी के साथ गठबंधन किया था, तो लगा था कि अब उनका फिर से भाजपा के साथ आना असंभव है। खुद नीतीश और बीजेपी के शीर्ष नेता भी यही कह रहे थे। लेकिन, एक बार फिर से यह दावे गलत साबित हुए हैं।

13 अप्रैल, 2023 को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने एक जनसभा में साफ तौर पर कहा था, 'एक बात स्पष्ट कह देता हूं किसी के भी मन में ये संशय हो कि चुनाव परिणामों के बाद नीतीश बाबू को भाजपा एनडीए में लेगी तो मैं बिहार की जनता को स्पष्ट कह देना चाहता हूं.....आप लोगों के लिए भाजपा के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं...'

Bihar Politics: Nitish Kumar has become a compulsion of Bihar politics, whoever goes towards him becomes stronger, BJP also has the same compulsion

ऐसे में सवाल बनता है कि आखिर बीजेपी को नीतीश के लिए फिर से दरवाजे खोलने की क्या मजबूरी रही?

1) विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' की समाप्ति का संदेश
28 विपक्षी दलों का इंडिया गठबंधन सीट बंटवारे को लेकर लगभग सभी राज्यों में उलझा हुआ है। कभी तृणमूल की ममता बनर्जी कांग्रेस को आंखें दिखा देती हैं, तो कभी अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी उसे बौना साबित करने में जुट जाती है।

ऐसे में बीजेपी ने इंडिया गठबंधन में शामिल दलों को एक प्लेटफॉर्म पर लाने के सूत्रधार रहे नीतीश कुमार को तोड़कर पूरे देश में यह संदेश देने की कोशिश की है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाले बीजेपी और एनडीए के मुकाबले विपक्ष पूरी तरह से बिखर चुका है।

भाजपा के नजरिए से यह जरूरी है कि चुनाव से पहले ही कमजोर विपक्ष का मनोबल पूरी तरह से तोड़ दिया जाए। यही नहीं, उन वोटरों (फ्लोटिंग वोटर) के मन में जरा सा भी संदेह की गुंजाइश न छोड़ना जो 'कथित' एंटी-इंकंबेंसी की वजह से इंडिया की तरफ झुकने की सोच भी सकते हों।

2) 400 सीटों के लिए बिहार की सभी 40 सीटें जरूरी
बीजेपी 2024 का लोकसभा चुनाव 'तीसरी बार, 400 पार' के नारे के साथ लड़ने जा रही है। लेकिन, बिहार की 40 लोकसभा सीटें जीत पाना इस बार उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई थी।

बिहार के करीब ढाई दशकों के चुनावी इतिहास को देखें तो यहां का परिणाम उसी गठबंधन की ओर झुकता है, जिसकी ओर नीतीश कुमार रहते हैं। अगर नीतीश की जेडीयू पार्टी अकेले चुनाव लड़ती है तो जनादेश खंडित आता है।

मतलब, बीजेपी के लिए ही नहीं, बिहार की राजनीति के लिए नीतीश एक तरह की 'मजबूरी' बन चुके हैं। इतने वर्षों के शासन में उन्होंने अपना एक खास जनाधार तैयार किया है, जिसके साथ जुड़ने से राज्य में दो+दो=पांच होते देखा गया है।

3) 'जंगल राज' की आशंका का डर खत्म
बिहार में लालू-विरोधी राजनीति में कथित 'जंगल राज' का भय एक बहुत बड़ा सियासी मुद्दा रहा है। भारतीय जनता पार्टी को लगता है कि नीतीश कुमार को साथ लाकर वह उन लोगों के मन से 'जंगल राज' की आशंका को पूरी तरह से दूर कर सकती है।

क्योंकि, पिछले कुछ समय में नीतीश कुमार की राजनीतिक छवि खराब होने की बात कही जा रही है। लेकिन, उनकी पुरानी सुशासन वाली छवि अभी भी लोगों के मन से पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है, यह एक ठोस सत्य है। बीजेपी यह दिखाना चाहती है कि जब नीतीश उसके साथ होते हैं तो राज्य में कानून-व्यवस्था पटरी पर होती है।

4) नीतीश कुमार का जनाधार
नीतीश कुमार की अपनी जाति कुर्मी की आबादी भले ही बिहार में 3% से भी कम हो, लेकिन उन्होंने खुद को गैर-यादव वाली पिछड़ी राजनीति में शीर्ष राजनेता के तौर पर स्थापित किया है।

जातिगत जनगणना करवाने की वजह से उन्होंने देश में भी खुद को एक प्रभावी ओबीसी चेहरे के तौर पर कायम किया है। उनके साथ आज भी कुर्मी-कोयरी के अलावा अति-पिछड़ी जाति, महादलित, गैर-पासवान अन्य दलित, पसमांदा मुसलमान और महिलाओं का एक अलग जनाधार है।

अगर मोटे अनुमानों के आधार पर राजद के कोर वोटर बेस (मुस्लिम+यादव) की जनसंख्या 36% के करीब है तो नीतीश के साथ आने से इसके अलावा अधिकतर आबादी के भाजपा को अपने साथ जुड़ने की संभावना नजर आ रही है।

तथ्य भी है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी, जेडीयू और एलजेपी ने राज्य की 40 में से 39 सीटें जीतने में सफलता हासिल की थी।

भाजपा यह भी देख चुकी है कि आरसीपी सिंह जैसे कुर्मी नेता और अनेक कुशवाहा नेताओं को जोड़कर भी वह नीतीश के कोर वोटर बेस पर खास प्रभाव नहीं डाल पा रही थी। वहीं नीतीश के साथ आने से कांग्रेस के जाति जनगणना कार्ड का भी काट मिलना आसान हो सकता है।

5) आरजेडी का जनाधार
बिहार में लालू यादव की पार्टी आरजेडी मुस्लिम-यादवों की पार्टी मानी जाती है। लेकिन, 2020 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने तेजस्वी को जिस तरह से प्रोजेक्ट किया था और सरकारी नौकरियों का पिटारा खोलने का वादा किया था, उससे अन्य जातियों के बेरोजगार युवाओं में भी उनकी लोकप्रियता बढ़ी थी।

भाजपा को लगता है कि हाल में जिस तरह से राज्य में शिक्षकों की बहाली का कार्ड चला गया है, नीतीश के साथ आने से उसका फायदा भी राजद को उठाने से रोक सकती है।

तो भी नीतीश कमजोर ही रहेंगे!
नीतीश जिस अंदाज में पिछली बार पलटी मार गए थे, उसके बाद भाजपा को उनसे हाथ मिलाने का फैसला आसान नहीं था। क्योंकि, इससे उसके अपने कैडर वोट के मायूस होने का खतरा है।

लेकिन, पार्टी को लगता है कि जब वह ये संदेश दे पाने में सफल होगी कि नीतीश में अब पहले वाला राजनीतिक दम नहीं रहा तो ऐसे कैडर वोटरों की नाराजगी भी दूर कर ली जाएगी।

इसका पहला संकेत तो नीतीश कुमार के साथ भाजपा कोटे से उन दो उपमुख्यमंत्रियों का शपथ लेना है, जो सीएम के कट्टर आलोचक रहे हैं। विजय सिन्हा और सम्राट चौधरी दोनों को ही नीतीश का मुखर विरोधी माना जाता है।

कहा जा रहा है कि नीतीश तो फिर से सुशील मोदी को डिप्टी सीएम बनाना चाह रहे थे और इसी वजह से भाजपा के साथ डील में देरी हो रही थी।

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