Bihar Politics: बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र 'राहुल की नई रणनीति', क्या NDA के लिए बन सकती है चुनौती
Bihar Politics: भारत का राजनीतिक परिदृश्य दो अलग-अलग धाराओं में बंट गया है। एक तरफ धर्म और राष्ट्रवाद की सियासत आगे बढ़ रही है, तो वहीं दूसरी तरफ जाति और समुदाय के आधार पर रणनीतियां गढ़ी जा रही हैं। 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद देश में राष्ट्रवाद की भावना और भी बढ़ गई, खासकर तब जब पर्यटकों की हत्या कथित तौर पर धर्म के आधार पर की गई।
इस घटना को एक खास धार्मिक समूह से जोड़कर धर्म और राष्ट्रवाद की राजनीति को हवा दी गई। इस स्थिति ने पाकिस्तान के साथ युद्ध जैसे हालात पैदा कर दिए, इन दोनों मुद्दों पर देश की भावनाएं भड़क उठीं और पाकिस्तान को सबक सिखाने का जोरदार आह्वान किया गया। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति बनाने का यह एक मौका मिल गया।

बिहार में दलित वोट बैंक पर नज़र: कांग्रेस पार्टी अपनी ताकत को फिर से हासिल करने की रणनीति के तहत बिहार में दलित वोट बैंक को आक्रामक तरीके से निशाना बना रही है। राहुल गांधी लगातार बिहार दौरा कर रहे हैं, पिछले पाँच महीनों में वह चौथी बार बिहार पहुंचे। इससे साफ है कि कांग्रेस का पूरा फोकस बिहार चुनाव पर है।
राहुल गांधी ने दलित समुदाय को एकजुट करने के उद्देश्य से विभिन्न स्मरणोत्सवों और सम्मेलनों में भाग लिया, जो उनके नेतृत्व में कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति में बदलाव का इशारा है। निजी क्षेत्र में आरक्षण की वकालत और आरक्षण पर 50% की सीमा को चुनौती देकर, गांधी ने खुद को मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और नीतीश की राज्य सरकार दोनों की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं।
बिहार में राहुल गांधी का मजबूती अभियान: बिहार में राहुल गांधी की राजनीतिक चालों को ख़ासकर एससी/एसटी समुदायों के साथ जुड़ाव, कांग्रेस पार्टी के लिए एक रणनीतिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। यह बदलाव पार्टी के अपने राज्य अध्यक्ष की जगह दलित नेता राजेश राम को लाने और एक अन्य दलित नेता सुशील पासी को बिहार का सह-प्रभारी नियुक्त करने के फैसले से साफ़ ज़ाहिर है।
ये कदम एक एकीकृत अभियान के तहत दलितों, मुसलमानों और उच्च जाति के मतदाताओं के साथ फिर से जुड़कर खुद को पुनर्जीवित करने की कांग्रेस की व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं। क्योंकि कांग्रेस को बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की पिछलग्गू पार्टी के तौर संज्ञा दी जा रही है। इसलिए कांग्रेस बिहार में खुद की छवि में सुधारने में जुटी हुई है।
बिहार में नई रणनीति और दलित की राजनीति: राजनीति के विशेषज्ञों का मानना है कि कांग्रेस बिहार में दलित राजनीति को बढ़ावा देने की पुरज़ोर कोशिश कर रही है, ताकि किसी भी तरह से इस वोट बैंक में सेंधमारी की जा सके। राज्य में राहुल गांधी की हालिया गतिविधियों से यह ज़ाहिर है, जिसमें दलितों की महत्वपूर्ण उपस्थिति वाले कार्यक्रमों में उनकी सक्रिय रूप से भागीदारी भी शामिल है।
हालांकि, पिछले तीन दशकों में बिहार में कांग्रेस पार्टी का गिरता प्रदर्शन चिंता का विषय है। 1990 के बाद से, पार्टी ने अपने वोट शेयर में लगातार गिरावट देखी है। बिहार के मतदाताओं के बीच अपनी उपस्थिति और अपील को पुनर्जीवित करने के लिए कांग्रेस को नई रणनीति पर ज़मीन से जुड़कर काम करने की ज़रूरत है।
पारंपरिक वोट बैंक साधने की कोशिश: बिहार में कांग्रेस के वोट शेयर में गिरावट, खासकर लालू यादव के सत्ता में आने के बाद, पार्टी के लिए चिंता बनी हुई है। राहुल गांधी की मौजूदा कोशिश का मकसद दलित समुदाय से फिर से जुड़ना और कांग्रेस के पारंपरिक वोट आधार को फिर से ज़िंदा करना है।
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सक्रिय रूप से सिर्फ दलित और पिछड़ी राजनीति करना, अन्य वोट बैंक को किनारा कर सकता है, जो कि पार्टी के लिए सही नहीं रहेगा। इस बीच, एनडीए ने धर्म और राष्ट्रवाद की राजनीति का लाभ उठाते हुए अपने चुनावी अभियान को रणनीतिक रूप से आकार देना शुरू कर दिया है।
पीएम मोदी की बिहार यात्रा: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 30 मई को रोहतास की आगामी यात्रा में राष्ट्रवाद और विकास पर जोर दिया जाएगा, जिसमें पाकिस्तान के खिलाफ जवाबी कार्रवाई करने और विभिन्न विकास परियोजनाओं का अनावरण करने के वादे शामिल हैं, जो उनके अभियान की आधारशिला के रूप में इन मुद्दों को भुनाने की कोशिश की जाएगी।
राजनीतिक पारा चढ़ने के बाद भी कांग्रेस और आरजेडी के बीच सीट बंटवारे को लेकर सस्पेंस बरकरार है। कांग्रेस 70 सीटों पर दांव खेलना चाहती है, वहीं आरजेडी 50 से 60 के बीच की पेशकश करने को तैयार है। राहुल गांधी का दृष्टिकोण एनडीए की तुलना में आरजेडी को अधिक नुकसान पहुंचाता दिख रहा है, क्योंकि वह आरजेडी के पारंपरिक वोट बैंकों में सेंध लगा रहे हैं।
इस टकराव के बावजूद, विशेषज्ञों का मानना है कि यह तनाव सीट बंटवारे की चर्चा तक ही सीमित रहेगा, जिससे अंततः महागठबंधन के भीतर एकता आएगी। राजनीतिक क्षेत्र में विचारधाराओं के टकराव की संभावना है, जो बिहार की राजनीतिक लड़ाई में एक नए अध्याय की शुरुआत हो सकती है।












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