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15 सदस्यीय टीम के स्टार परफॉर्मर थे नीतीश, अब घरेलू मैदान पर ही कप्तान की पारी लड़खड़ायी

सीएम के रूप में आखिरी पारी खेल रहे नीतीश कुमार अपनी पुरानी लय में नहीं दिख रहे। स्लॉग ओवरों में उनकी बल्लेबाजी लड़खड़ती नजर आ रही। सियासी मैदान में जुबानी जंग और अफवाहों के कारण वे अपनी बल्लेबाजी पर फोकस नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने 15 सदस्यीय टीम की कप्तानी की। ऑपोजिशन इलेवन के स्टार फरफॉर्मर की इमेज बनायी। लेकिन अब यह इमेज खंडित हो रही है। घरेलू मुकाबले में ही वे अपनों और परायों के बाउंसर से परेशान हैं। इस परेशानी में उनका शॉट सेलेक्शन सटीक नहीं है। एक दक्ष बल्लेबाज का यूं बिखरना आश्चर्यजनक है। सीएम के रूप में नीतीश की यह आखिरी पारी इसलिए है क्योंकि वे एलान कर चुके हैं कि महागठबंधन 2025 का विधानसभा चुनाव तेजस्वी के नेतृत्व में लड़ेगा।

बिहार में राजनीतिक गर्मी चरम पर

बिहार में राजनीति का तापमान उच्चतम बिन्दु पर है। इस असह्य गर्मी के बीच बिहार विधानमंडल का मानसून सत्र चल रहा है जो बहद हंगामेदार है। भाजपा के सदस्य उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव से इस्तीफा मांग रहे हैं। वे नारा लगा रहे हैं, चार्जशीटेड डिप्टी सीएम नहीं चलेगा। जमीन के बदले नौकरी मामले में तेजस्वी यादव के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हो चुकी है। अब सारी निगाहें नीतीश कुमार पर टिकी हैं कि वे इस मामले में क्या फैसला लेते हैं। इसी मुद्दे पर नीतीश कुमार ने 2017 में तेजस्वी यादव का साथ छोड़ दिया था। उस समय भी वे उपमुख्यमंत्री थे।

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क्या टूट की आशंका से डरे हुए हैं नीतीश ?

जुबानजंगी और अफवाहों ने बिहार की राजनीति में खलबली मचा दी है। भाजपा नेता आरोप लगा रहे हैं कि जदयू में टूट की आशंका से नीतीश कुमार डरे हुए हैं और वे विधायकों के फोन टेप करा रहे हैं। पिछले कई महीनों से जदयू में टूट और उसके राजद में विलय की अटकलें लगायी जा रही हैं। अभी तक बिहार के नेता ही बयानों के तीर चला रहे थे। लेकिन अब इसमें झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी भी कूद गये हैं। उन्होंने कहा है, चर्चा है कि तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बनेंगे और जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह उप मुख्यमंत्री बनेंगे। फिर जदयू का राजद में विलय हो जाएगा। इन अफवाहों में दम हो या न हो लेकिन इनसे महागठबंधन का तालमेल बिगड़ रहा है।

तूफान के आने से पहले की शांति

राजद कोटे के शिक्षामंत्री चंद्रशेखर और विभाग के अपर मुख्य सचिव केके पाठक का झगड़ा एक असाधारण घटना है। इसके बाद जदयू नेता अशोक चौधरी और राजद नेता सुनील कुमार सिंह की जोरदार भिडंत हो गयी। इसकी आंच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक पहुंच गयी। तब लालू यादव को हस्तक्षेप करना पड़ा जिससे मामला शांत पड़ गया। लेकिन यह शांति, तूफान से आने के पहले की है। राख के अंदर अभी भी चिंगारी दबी है जो हवा के हल्के झोंके से भी धधकने लगेगी। राजद के एमएलसी सुनील कुमार सिंह ने इस संबंध में कहा है, मेरी विश्वसनीयता पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। हमारे नेता (लालूजी) ने चुप रहने के लिए कहा है इसलिए वे इस मामले में कुछ नहीं कहेंगे। महागठबंधन विधानमंडल दल की बैठक में नीतीश कुमार ने सुनील सिंह पर उस तस्वीर के लिए नाराजगी जाहिर की थी जो उन्होंने अमित शाह के साथ खिंचवायी थी। लेकिन उस समय सुनील कुमार सिंह ने भी नीतीश कुमार को तन कर जवाब दिया था। अगर सीएम ने सुनाया तो एमएलसी ने भी सुना दिया, फिर रह क्या गया ?

लालू -नीतीश तक पहुंची आंच

क्या मौजूदा मंत्री अशोक चौधरी को 1995 में लालू यादव ने जेल जाने से बचा लिया था ? मंत्री-एमएलसी की लड़ाई में ये बात भी उजागर हो गयी। राजद एमएलसी ने कहा, सहकारिता नेता और पूर्व मंत्री राजो सिंह की हत्या के आरोप का सामना कर चुके मंत्री जी को यह याद रखना चाहिए कि 1995 में अगर लालू यादव नहीं होते तो वे जेल के अंदर होते। यानी इस बात से यह पता चला कि आपराधिक मामले में किसी आरोपी को सरकार के सहयोग से बचाया भी जा सकता है। इसके पहले सुनील कुमार सिंह ने चंद्रशेखर-केक पाठक विवाद में कहा था, कई राज्यों के मुख्यमंत्री दो -चार ऐसे अधिकारी रखते हैं जो मंत्रियों को लाइन पर ला सके। जब किसी मंत्री पर नकेल कसनी होती है तो केके पाठक जैसे अधिकारी वहां तैनात कर दिये जाते हैं। रामायण मुद्दे पर जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर पर नाराज हुए तो वहां केके पाठक को अपर मुख्य सचिव बना दिया। कुछ साल पहले तो जदयू के ही एक मंत्री अफसर की प्रताड़ना से फूटफूट कर रोने लगे थे। चूंकि जदयू- राजद की लड़ाई सीमा पर कर लालू नीतीश तक पहुंच गयी इसलिए इस इमरजेंसी ब्रेक लगा दिया गया।

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