Bihar Poltices:सिर्फ लालू परिवार ही नहीं! बिहार के इन 5 खानदानी नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती है प्रदेश की सियासत
Bihar Political Families: बिहार में विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट तेज हो चुकी है। राजनीतिक गलियारों में नई रणनीतियों और पुराने समीकरणों की चर्चा जोरों पर है। लेकिन जब भी बिहार की राजनीति की बात होती है, तो कुछ खास परिवारों का नाम सबसे पहले जेहन में आता है -वो "खानदानी नेता" जिन्होंने दशकों से बिहार की सियासत को अपनी मुट्ठी में रखा है।
वनइंडिया की खास सीरीज "खानदानी नेता" के तहत इस लेख में हम बात कर रहे हैं उन राजनीतिक परिवारों की, जिन्होंने बिहार की राजनीति में अपना दबदबा कायम रखा है या यूं कहें कि जिनके इर्द-गिर्द प्रदेश की सियासत घूमती है। लालू यादव का परिवार तो सबको मालूम है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ऐसे कम से कम 5 और राजनीतिक घराने हैं जिनके बिना बिहार की राजनीति अधूरी है? आइए जानते हैं, कौन हैं वो सियासी घराने जिनके इर्द-गिर्द बिहार की सत्ता का पहिया घूमता है।

1️⃣ यादव परिवार - लालू यादव से लेकर तेजस्वी तक, "पारिवारिक राजनीति" का सबसे बड़ा चेहरा
बिहार की राजनीति की चर्चा लालू प्रसाद यादव के बिना अधूरी है। कभी गोपालगंज की गलियों से निकलकर मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे लालू यादव ने राजनीति में ऐसा कद बनाया जो अब तक बरकरार है।
राबड़ी देवी ने पति के जेल जाने के बाद सत्ता संभाली और तीन बार बिहार की मुख्यमंत्री बनीं। अब उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं छोटे बेटे तेजस्वी यादव, जो आज बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। तेजस्वी अब न सिर्फ लालू की छवि को आगे बढ़ा रहे हैं, बल्कि युवाओं में अपनी अलग पहचान भी बना चुके हैं।
हालांकि, परिवार के भीतर मतभेद भी कम नहीं। बड़े बेटे तेज प्रताप यादव को पार्टी और परिवार दोनों से अलग कर दिया गया है, और अब वे अपने दम पर चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में हैं। लेकिन चाहे जो हो, यादव परिवार का प्रभाव आज भी बिहार की हर राजनीतिक बिसात पर महसूस किया जा सकता है।

2️⃣ पासवान परिवार - "दलित राजनीति" का सबसे मजबूत स्तंभ
बिहार की राजनीति में अगर यादवों के बाद किसी परिवार का सबसे बड़ा प्रभाव है, तो वह है पासवान परिवार। दिवंगत राम विलास पासवान ने लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) की नींव रखी और दलित समाज की आवाज को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया।
अब उनके बेटे चिराग पासवान NDA में सबसे युवा और फायरब्रैंड चेहरों में से एक हैं। उन्होंने अपने पिता की राजनीतिक विरासत को नए अंदाज में आगे बढ़ाया है।
हालांकि, परिवार के भीतर सत्ता को लेकर दरार भी सामने आई, जब चिराग के चाचा पशुपति कुमार पारस ने अलग राह पकड़ ली और अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी बना ली। वो इस चुनाव में महागठबंधन की ओर से हैं। फिर भी, चाहे NDA हो या विपक्ष, पासवान परिवार की मौजूदगी हर गठबंधन में एक अहम समीकरण बनकर उभरती है।

3️⃣ सिन्हा परिवार - बिहार की सियासत का "बुद्धिजीवी चेहरा"
एक वक्त था जब सिन्हा परिवार को बिहार की राजनीति का बौद्धिक चेहरा कहा जाता था। इस परिवार की नींव रखी डॉ. अनुग्रह नारायण सिन्हा ने, जो आज़ादी के बाद बिहार के पहले उपमुख्यमंत्री बने। उनके बेटे सत्येंद्र नारायण सिन्हा ने भी मुख्यमंत्री पद संभाला और कांग्रेस के स्वर्ण युग में अपनी पहचान बनाई।
परिवार की अगली पीढ़ी भी राजनीति और प्रशासन दोनों में सक्रिय रही। निखिल कुमार केरल के राज्यपाल और दिल्ली के पुलिस कमिश्नर रहे। उनकी पत्नी श्यामा सिंह सांसद रहीं, और उनके चचेरे भाई डॉ. विजय कुमार बिहार सरकार में मंत्री बने।
हालांकि आज यह परिवार उतना सक्रिय नहीं है, लेकिन इसका प्रभाव अब भी कई प्रशासनिक और राजनीतिक संस्थाओं में देखा जा सकता है। इस घराने के लोग आज भी बिहार की "पुरानी राजनीति" की गरिमा और सादगी की मिसाल माने जाते हैं।
4️⃣ मिश्रा परिवार ललित नारायण से लेकर नितीश मिश्रा तक, "कांग्रेस की विरासत" को संजोए
पूर्व रेल मंत्री ललित नारायण मिश्रा का परिवार भी बिहार की राजनीति में एक अहम नाम रहा है। ललित नारायण मिश्रा दरभंगा के रहने वाले थे और इंदिरा गांधी के दौर में कांग्रेस के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते थे।
उनकी असामयिक मौत के बाद परिवार ने राजनीति में अपनी जड़ें बनाए रखीं। उनके पुत्र विजय कुमार मिश्रा तीन बार विधायक और एक बार सांसद रहे, जबकि उनके भाई जगन्नाथ मिश्रा तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री बने।
जगन्नाथ मिश्रा के बेटे नितीश मिश्रा आज भी राजनीति में सक्रिय हैं। परिवार की नई पीढ़ी भी सियासी जमीन पर पैर जमाने की कोशिश में जुटी है, जैसे ऋषि मिश्रा, जो RJD के टिकट पर विधायक रह चुके हैं। मिश्रा परिवार ने बिहार की राजनीति को कई कद्दावर नेता दिए, जिनकी पहचान आज भी सम्मान के साथ की जाती है।
5️⃣ ठाकुर जुगल किशोर सिन्हा परिवार - "सहकारिता आंदोलन" से निकला एक सियासी घराना
कम लोग जानते हैं कि ठाकुर जुगल किशोर सिन्हा भारतीय राजनीति में सहकारिता आंदोलन के जनक माने जाते हैं। वे देश की पहली लोकसभा के सदस्य रहे और बिहार की राजनीति में स्वच्छ छवि और जनसेवा के लिए जाने गए।
उनकी पत्नी राम दुलारी सिन्हा भी खुद में एक प्रभावशाली नेता थीं। बाद में उनके बेटे मधुरेन्द्र कुमार सिंह और पोते मृगेन्द्र कुमार सिंह ने भी कांग्रेस के साथ लंबा राजनीतिक सफर तय किया। हालांकि आज यह परिवार राजनीतिक रूप से शांत है, लेकिन इनकी विरासत बिहार की राजनीति में ईमानदारी और सिद्धांतों की पहचान के रूप में जानी जाती है।
बिहार की राजनीति को अक्सर "परिवारवाद" के लिए आलोचना झेलनी पड़ती है, लेकिन अगर गहराई से देखें तो यह राजनीतिक परंपरा और जनसेवा की निरंतरता भी है। लालू से लेकर ललित नारायण मिश्रा, पासवान से लेकर जुगल किशोर सिन्हा तक हर परिवार ने अपने तरीके से राज्य की राजनीति को दिशा दी है। चुनाव आते ही इन परिवारों के नाम फिर सुर्खियों में लौट आते हैं, क्योंकि बिहार की सियासत का इतिहास इन्हीं "खानदानी नेताओं" के बिना अधूरा है।
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