दो खूंखार आतंकियों को पकड़कर किया था पुलिस के हवाले, मिला ये सिला कि बदल गई जिंदगी

गया। बिहार के गया में साइबर कैफै चलाने वाले एक व्यक्ति ने पुलिस की मदद करते हुए दो संदिग्ध आतंकियों को गिरफ्तार करवाया। हैरानी के बात ये है कि यह दोनों आतंकी ऐसे वैसे नहीं बल्कि कई सीरियस क्राइम में वांटेड थे। पुलिस को इनकी कई दिनों से तलाश थी। इनका पकड़ा जाना पुलिस के लिए काफी बड़ी उपलब्धि थी, क्योंकि इन आतंकियों में से एक तो 2008 में हुए अहमदाबाद ब्लास्ट का मुख्य आरोपी था। नि:संदेह हम आप साइबर कैफे के मालिक की तारीफ कर रहे हों लेकिन बता दें कि इस घटना के बाद से कैफे के मलिक अनुराग बसु की जिंदगी बदल गई है। अब बसु का कैफे चलना बंद हो गया है और वे तंगहाली से जूझ रहे हैं। जानें क्यों..

bihar man caught 2 suspected terrorists now facing money crisis

कैसे पकड़ा आतंकियों को
बता दें कि अनुराग बसु गया के सिविल लाइन्स में राजेन्द्र नगर के पास अपना साइबर कैफे चलाते हैं। एक दिन उनके कैफे में दो व्यक्ति आए, जिन्होंने इंटरनेट चलाने के लिए सिस्टम मांगा। लेकिन जब अनुराग ने उनसे आई डी देने की बात कही तो वह नहीं दे सके। इस पर अनुराग को उन दोनों पर शक हो गया। अनुराग को उनका चेहरा भी संदिग्ध लगा। अनुराग के मुताबिक उन्होंने इन आतंकियों का चेहरा दिल्ली पुलिस के विज्ञापन में देखा था। इन वित्रापन में लोगों से इन आतंकियों के कहीं भी मिलने पर पहचान बताने की अपील की गई थी। ये पोस्टर गया और पटना के कई इलाकों में भी लगे थे। जिससे अनुराग को ये समझने में देर नहीं लगी कि ये वही आतंकी हैं। जिसके बाद अनुराग ने पुलिस की मदद से उनका पीछा किया और पकड़ लिया।

अहमदाबाद ब्लास्ट का था आरोपी
पकड़े जाने के बाद जब संदिग्धों से पूछताछ की गई तो जो सच सामने आया वो हैरान करने वाला था। उनमें से एक आतंकी मोहम्मद अतीक उर्फ तौसीफ खान था, जो 'हरकत उल जिहाद अल इस्लामी' का सक्रिय आतंकी था। उनसे पूछाताछ में कुबूल किया कि 2008 में अहमदाबाद में हुए आतंकी हमले में वह शामिल था। बता दें कि इस हमले में 56 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 200 से अधिक लोग घायल हुए थे।

इस घटना के बाद कैसे बदल गई जिंदगी
साइबर कैफे मालिक अनुराग ने बताया कि इस घटना के बाद से उनका कैफे एकदम ठप्प पड़ गया। उन्होंने बताया कि लोगों ने उनके केफे आना छोड़ दिया। लोगों को लगने लगा कि कहीं मैं उनकी कोई जानकारी ना लीक कर दूं या फिर उनकी ब्राउसिंग डिटेल ना देख लूं। कुछ लोगों को तो ये तक लगने लगा कि मेरा कैफे आतंकियों का अड्डा है और यहां कभी भी कोई भी हमला हो सकता है। बासु ने बताया कि वह एक पत्रकार भी हैं और 'साफ स्वर ' नाम से सामाजिक-राजनीतिक पत्रिका भी निकालते हैं। लेकिन अफसोस इस घटना के बाद उनके इस पेशे पर भी कफी गलत प्रभाव पड़ा है। अब तो ये हालात हो गए हैं कि उनके पास ना तो घर का किराया देने के लिए पैसे हैं ना ही अपने बच्चे की फीस देने के लिए। उनकी इस मुश्किल घड़ी में सरकार भी उनकी कोई मदद नहीं कर रही है।

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