नरेन्द्र मोदी के मुकाबले पिछड़े नीतीश, जूनियर पार्टनर बनने को होंगे मजबूर

नरेन्द्र मोदी के मुकाबले पिछड़े नीतीश, जूनियर पार्टनर बनने को होंगे मजबूर

मतगणना रुझानों के मुताबिक जदयू को बहुत बड़ा नुकसान होता दिख रहा है। क्या बिहार में नरेन्द्र मोदी के मुकाबले 'ब्रांड नीतीश’ की वैल्यू कम हो गयी ? नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा बिहार में शानदार प्रदर्शन करती दिख रही है। जदयू, भाजपा की तुलना में पिछड़ता दिखा। बिहार में सबसे बड़ा दल कौन होगा, इसके लिए भाजपा और राजद में नेक टू नेक फाइट चलती रही। दिन के बारह बजे तक भाजपा 71 सीटों पर आगे चल रही थी और वह राजद के मुकाबले आगे निकल रही थी। 2015 में जदयू को 71 सीटें मिली थीं। अब भाजपा को इसके आसपास सीटें मिलती दिख रही है। लोजपा की वजह से जदयू को नुकसान होता दिख रहा है। लोजपा भले खुद अपना वजूद बनाती नहीं दिख रही है लेकिन वह जदयू का खेल बिगाड़ती दिख रही है।

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कितने असरदार रहे नीतीश ?

नीतीश कुमार को बिहारी की चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा माना जाता रह है। लेकिन 2020 के रुझानों के मुताबिक नीतीश की यह छवि खंडित होती दिख रही है। उनका सामाजिक समीकरण भी फेल होता नजर आ रहा है। 2015 में जदयू को 71 सीटें मिलीं थीं। लेकिन अब उसको करीब 15-20 सीटों का नुकसान होता दिख रहा है। माना जा रहा है जदयू को जो भी नुकसान हुए हैं वो लोजपा की वजह से हुए हैं। अगर लोजपा भी एनडीए में रहती तो नतीजे शायद कुछ और होते। नीतीश कुमार और चिराग पासवान की आपसी खुन्नस में दोनों का खेल खराब होता दिख रहा है। नीतीश कुमार और नरेन्द्र मोदी की जोड़ी ने दूसरे और तीसरे चरण में खूब जोर लगाया था। दोनों की मिलीजुली कोशिश ने रंग दिखाया। दोपहर 12 बजे तक सीमांचल की 21 सीटों में से 15 सीटों पर एनडीए के उम्मीदवार आगे चल रहे थे।

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क्या ब्रांड मोदी अधिक असरदार ?

2020 के विधनसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कुल 99 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव प्रचार किया था। इसमें से 53 सीटों पर एनडीए के उम्मीदवार आगे चल रहे हैं। इसक मतलब ये हुआ कि नीतीश की तुलना में मोदी का प्रभाव अधिक दिख रहा है। वैसे भी पार्टी वाइज टैली में भाजपा, जदयू की तुलना में बहुत आगे चल रही है। पिछले चुनाव की तुलना में भाजपा का प्रदर्शन बेहतर होता दिख रहा है।

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क्या नीतीश ने लोजपा को अंडरस्टीमेट किया ?

चुनाव के पहले नीतीश कुमार लोजपा को कोई अहमियत नहीं दे रहे थे। नीतीश कुमार ने लोजपा को दरकिनार करने के लिए जीतन राम मांझी से हाथ मिलाया था। लेकिन नीतीश की यह रणनीति नाकाम होती दिख रही है। जीतन राम मांझी जदयू को दलित वोट ट्रांसफर करते हुए नहीं दिख रहे हैं। लोजपा का एनडीए से अलग होना अब नुकसानदेह साबित होता दिख रहा है। लोजपा की वजह से जदयू के करीब 50 उम्मीदवार पीछे चल रहे थे। कांटे के इस मुकाबले में दो- चार हजार वोटों का अंतर भी बहुत बड़ा फर्क पैदा करेगा।

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राजद के मेल से वामपंथियों को फायदा

राजद के मेल से इस बार वामपंथी दलों को बहुत फायदा मिलता दिख रहा है। सीपीएम और सीपीआइ दोनों बिहार में मृतप्राय हो गये थे। लेकिन इस बार दोनों को जीवनदान मिलता दिख रहा है। सीपीएम 4 तो सीपीआइ 3 सीटों पर आगे है। सबसे अधिक लाभ भाकपा माले को मिलता दिख रहा है। अभी तक माले के सर्वाधिक 7 विधायक ही जीते हैं। लेकिन इस बार वह 12 सीटों पर आगे चल रही हैं। वामपंथियों को तो फायदा मिलता दिख रहा है लेकिन राजद को नहीं। राजद ने 2015 में 80 सीटें जीती थीं लेकिन इस बार वह 60-65 के आसपास सिमटता दिख रहा है।

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