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अश्लील गानों के सहारे चुनावी मैदान में उतरे भोजपुरी स्टार, क्या बिहार में अब होगी 'व्यूज की राजनीति'?

Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में इस बार नेताओं से ज्यादा अभिनेता सुर्खियों में हैं। भोजपुरी सिनेमा के स्टार अब सियासत की पिच पर उतर चुके हैं। जिन कलाकारों ने अपने गानों से लाखों-करोड़ों व्यूज़ बटोरे, वे अब जनता के बीच 'सेवा' और 'परिवर्तन' का नारा लेकर वोट मांग रहे हैं। सवाल उठता है क्या यही नया चेहरा है बिहार की राजनीति का?

भोजपुरी इंडस्ट्री: लोकगीतों से लेकर अश्लील गानों तक

कभी भिखारी ठाकुर, भरत शर्मा और सारधा सिन्हा जैसे गायकों ने भोजपुरी संगीत को संस्कृति और समाज का आईना बनाया था। लेकिन डिजिटल युग में वही इंडस्ट्री अश्लील गानों की पहचान बन चुकी है। रितेश पांडेय और खेसारी लाल यादव जैसे लोकप्रिय गायकों के कई गाने खुलेआम फूहड़ता परोसते हैं।'बैगन लेल', 'चदरा में अदरा' जैसे गीत परिवार के साथ सुनना मुश्किल हैं, लेकिन YouTube पर इन पर करोड़ों व्यूज आते हैं। यही 'व्यूज की राजनीति' अब विधानसभा चुनाव तक पहुंच गई है।

Bhojpuri actors politics Khesari Lal Yadav election 2025 Ritesh Pandey

जब गायक बोले - अब हम जनता की आवाज उठाएंगे

बिहार की सियासत में अब वही चेहरे कह रहे हैं कि वे जनता की आवाज विधानसभा में उठाएंगे। लेकिन यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जो कलाकार अपने गीतों में महिलाओं को सिर्फ मनोरंजन का साधन बनाता है, क्या वही समाज सुधार और महिला सशक्तिकरण की बात करेगा?

लोकप्रियता के नशे में जनता के कुछ वर्ग इन कलाकारों को 'युवा आइकन' मानने लगे हैं। पर क्या गानों में नारी देह का मजाक उड़ाने वाले अब राजनीति में नारी सम्मान की बात करेंगे?

पार्टी रणनीति: वोटों के लिए पॉपुलर चेहरों पर दांव

RJD ने खेसारी लाल यादव को टिकट दिया, जबकि जनसुराज पार्टी ने रितेश पांडेय को मैदान में उतारा है। दोनों की सोशल मीडिया पर बड़ी फैन फॉलोइंग है, जो किसी भी राजनीतिक दल के लिए 'वोट बैंक' बन सकती है।

पार्टी का गणित साफ है लोकप्रिय चेहरा, वायरल गाने और भीड़ खींचने की क्षमता। लेकिन यही लोकप्रियता अब एक नई बहस भी खड़ी कर रही है क्या बिहार की राजनीति का चेहरा इतना सतही हो गया है कि गानों की फूहड़ता अब टिकट की योग्यता बन गई?

जाति, बेरोजगारी और मनोरंजन की राजनीति

बिहार की राजनीति हमेशा से जातीय समीकरणों, गरीबी और बेरोजगारी से प्रभावित रही है। लेकिन अब इसमें मनोरंजन का तड़का भी जुड़ गया है। युवा मतदाता जो बेरोजगारी, पलायन और शिक्षा की समस्याओं से जूझ रहा है, वही वोट डालते वक्त अपने पसंदीदा गायक के गानों की ताल पर झूम उठता है। राजनीति और मनोरंजन के इस मिलन ने लोकतंत्र की गंभीरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

महिलाओं का सम्मान और समाज का आईना

खेसारी लाल यादव और रितेश पांडेय के कई गानों में महिलाओं को वस्तु के रूप में पेश किया गया है। सवाल यह है कि जो मंच पर महिला का मजाक उड़ाता है, क्या वह विधानसभा में महिलाओं के अधिकारों की पैरवी कर पाएगा?

अगर ऐसे कलाकार विधायक बनते हैं, तो यह न केवल राजनीति का बल्कि समाज की सोच का भी आईना होगा। जिम्मेदारी सिर्फ नेताओं की नहीं, बल्कि उन दर्शकों की भी है जो इन गानों को व्यूज़ देकर लोकप्रिय बनाते हैं।

मनोरंजन और राजनीति की मिलावट कितनी सही?

भोजपुरी कलाकारों का राजनीति में आना गलत नहीं, लेकिन जब लोकप्रियता की नींव अश्लीलता पर रखी हो, तो सवाल उठना जरूरी है। बिहार की जनता को यह तय करना होगा कि वे अपने भविष्य के लिए किसे चुनना चाहते हैं - वो जो मंच पर गाने से तालियां बटोरता है या वो जो सच में जनता की तकलीफों की आवाज बनता है।

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