Bihar Chunav Result 2025: बिहार में कांग्रेस का ‘सूपड़ा साफ' कैसे हुआ? खड़गे-राहुल की चल रही इमरजेंसी बैठक
: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का नतीजा जिस तरह सामने आया है, उसने न सिर्फ राज्य की राजनीति बल्कि कांग्रेस के भीतर भी भूचाल ला दिया है। एनडीए ने 243 में से 202 सीटें जीतकर रिकॉर्ड बहुमत हासिल कर लिया, जबकि महागठबंधन अपनी परंपरागत सीटें भी बचा नहीं पाया। बीजेपी 89 सीटों के साथ नंबर-1 पार्टी बनी और नीतीश कुमार की जेडीयू 85 सीटों पर जीतकर फिर राज्य की सत्ता पर काबिज होने जा रही है।
दूसरी तरफ कांग्रेस के लिए यह चुनाव किसी बड़े झटके से कम नहीं रहा। 61 सीटों पर लड़कर सिर्फ 6 सीटें जीत पाना कांग्रेस की असल स्थिति दिखाता है। यही वजह है कि अब पार्टी नेतृत्व ने खुद नुकसान की वजह तलाशने की कवायद शुरू कर दी है।

खड़गे-राहुल गांधी की अचानक बड़ी बैठक:क्या है एजेंडा?
चुनाव परिणामों के बाद शनिवार (15 नवंबर) को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने दिल्ली में आपात बैठक बुला ली। बैठक में राहुल गांधी, केसी वेणुगोपाल और अजय माकन मौजूद हैं। अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक,बैठक में तीन बड़े मुद्दों पर चर्चा हो रही है, बिहार में करारी हार की समीक्षा, टिकट बंटवारे और संगठनात्मक ढांचे पर सवाल और 2026 की तैयारी के लिए नई रणनीति।
पार्टी नेतृत्व साफतौर पर यह समझने की कोशिश कर रहा है कि आखिर बिहार जैसे बड़े राज्य में कांग्रेस सिर्फ 'नाम मात्र की' पार्टी क्यों बनकर रह गई।
बीजेपी का हमला: 'राहुल गांधी अभी भी गंभीर नहीं'
चुनाव नतीजों के बाद बीजेपी ने कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी पर सीधा हमला बोला। बिहार बीजेपी अध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने कहा,''राहुल गांधी को पहले खुद में झांकने की जरूरत है। देश के मुद्दों पर उनकी परिपक्वता नजर नहीं आती।
जब तक वे राष्ट्रवाद पर स्पष्ट स्टैंड नहीं लेते, जनता उन्हें स्वीकार नहीं करेगी।''
जायसवाल का यह बयान आने वाले समय में कांग्रेस की राजनीतिक चुनौती और बढ़ा देता है। राष्ट्रीय नेतृत्व पर उठते प्रश्न कांग्रेस की नींव को और कमजोर करते हैं।
महागठबंधन क्यों टूटा? कांग्रेस के सूपड़ा साफ होने की 5 बड़ी वजह
बिहार में महागठबंधन की हार किसी एक कारक की वजह से नहीं हुई। जमीनी स्तर पर कई ऐसी गलतियां थीं, जिसने एनडीए को आसान जीत का रास्ता दे दिया।
1. घोषणाओं का असर नहीं -'हम सरकार बनाएंगे तब देंगे' वाली राजनीति फेल
नीतीश सरकार ने चुनाव से पहले कई योजनाओं को तत्काल लागू कर बढ़त बना ली। इसके उलट महागठबंधन कहता रहा "सरकार बनी तो देंगे।" यही झिझक मतदाताओं को नाराज कर गई।
2. सीटों पर झगड़ा - महागठबंधन चुनाव के बीच ही उलझा रहा
पीएम मोदी की दो रैलियों के बाद भी महागठबंधन सीट बंटवारे के विवाद में फंसा रहा। 12 सीटों पर फ्रेंडली फाइट होने से वोट सीधे-सीधे कटे। सबसे बड़ी गलती सीएम फेस पर बनी खींचतान, जिसने गठबंधन की एकजुटता को कमजोर कर दिया।
3. कांग्रेस में टिकट बंटवारे की लड़ाई - अंदरूनी क्लेश खुलकर सामने आया
कांग्रेस के टिकट वितरण पर कई जिलों में बगावत हो गई। खरीद-फरोख्त के आरोप लगे। सहनी की 'डिप्टी सीएम' की मांग और वामदलों की ज्यादा सीटें लेने की हठ, दोनों ने महागठबंधन की छवि खराब की। इन विवादों ने जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा दिया।
4. प्रचार में कमजोरी - मैदान में अकेले दिखे तेजस्वी
तेजस्वी यादव ने पूरे चुनाव में आक्रामक प्रचार किया।
लेकिन कांग्रेस का टॉप नेतृत्व खड़गे,राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने बेहद कम सभाओं में दिखे। राहुल गांधी ने शुरुआत में SIR मुद्दा जोर से उठाया, लेकिन बाद में पूरी तरह गायब हो गए। इससे जनता में संदेश गया कि कांग्रेस खुद चुनाव को लेकर गंभीर नहीं।
5. सामाजिक लामबंदी - मोकामा से लेकर अनंत सिंह की गिरफ्तारी तक
मोकामा के दुलारचंद यादव हत्याकांड ने सवर्ण वोटरों में तीखी प्रतिक्रिया पैदा की। अनंत सिंह की गिरफ्तारी ने एनडीए को 'सुशासन' का मजबूत नैरेटिव दे दिया। इससे महागठबंधन के खिलाफ हवा और तेज हो गई।
AIMIM का सीमांचल में असर और कांग्रेस का पतन
सीमांचल में AIMIM ने एक बार फिर मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई और 5 सीटें जीत लीं। जो वोट कभी कांग्रेस और RJD को मिला करता था, वह अब तेजी से AIMIM की ओर जाता दिख रहा है। सीमांचल में कांग्रेस पूरी तरह हाशिये पर चली गई है।
क्या कांग्रेस वापसी कर पाएगी?
विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में कांग्रेस का पुनर्जीवन अब उसी समय संभव है जब पार्टी, जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करे, स्थानीय नेतृत्व को उभारे, टिकट बंटवारे की प्रक्रिया पारदर्शी करे और सबसे जरूरी राष्ट्रीय नेतृत्व चुनाव में लगातार दिखे।
खड़गे-राहुल की बैठक से क्या निकलता है यह आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल तस्वीर साफ है कि बिहार में कांग्रेस की हालत बेहद खराब है और उसे जमीन पर वापस काम करना होगा।
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