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Bihar Chunav: राघोपुर से तेजस्वी को हराने के प्रशांत किशोर के दावे में कितना दम? समझें वोटों का गणित

Bihar Chunav Prashant Kishor: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का सबसे दिलचस्प मुकाबला एक बार फिर राघोपुर सीट पर नजर आ सकता है। प्रशांत किशोर ने शनिवार को यहां का दौरा किया था। पीके ने दावा किया है कि अगर उन्होंने चुनाव लड़ा, तो इस सीट पर तेजस्वी का हाल राहुल गांधी के जैसा होगा। 2019 में राहुल गांधी अमेठी से चुनाव हार गए थे, जो उनकी पारंपरिक सीट है। राघोपुर की सीट आरजेडी के लिए अमेठी जैसी मान सकते हैं, क्योंकि यहां से पहले 2 बार लालू यादव और फिर 5 बार राबड़ी यादव विधायक बनी थीं। पिछले दो चुनाव से यहां से तेजस्वी यादव ही जीते हैं।

राघोपुर की सीट को इसके जातीय समीकरणों की वजह से यह आरजेडी के लिए सेफ सीट मानी जाती है। यही वजह है कि लालू यादव ने जब औपचारिक तौर पर अपनी विरासत तेजस्वी को सौंपने का फैसला किया, तो उनकी राजनीति में एंट्री के लिए इसी पारंपरिक सीट को चुना गया। समझें इस सीट का सियासी समीकरण।

Bihar Chunav Prashant Kishor

Raghopur सीट है लालू परिवार का गढ़

राघोपुर लालू प्रसाद यादव की पारंपरिक सीट मानी जाती है। लालू खुद दो बार यहां से विधायक रहे और फिर उन्होंने इस सीट से राबड़ी देवी को उतारा, जो यहां से 5 बार विधायक रहीं। 2015 में तेजस्वी यादव को यहां से उतारा गया और 2020 में भी उन्होंने इसी सीट से चुनाव लड़ा था। तेजस्वी यादव ने इस सीट से करीब 38 हजार से अधिक वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी। हालांकि, पिछले कुछ समय में यह सीट चर्चा के केंद्र में दूसरी वजहों से है। यहां प्रशांत किशोर की पार्टी जनसुराज भी सक्रिय है। लालू के बड़े बेटे तेजस्वी यादव भी इस सीट से अपने उम्मीदवार उतारने का ऐलान कर चुके हैं और उन्होंने खुले तौर पर तेजस्वी के खिलाफ मोर्चा भी खोल दिया है।

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Bihar Chunav में राघोपुर सीट बना हॉट टॉपिक

⦁ राघोपुर विधानसभा क्षेत्र का वोट गणित बेहद दिलचस्प है। यादव और मुसलमान वोटर्स मिलकर करीब 48-50% हैं, जो RJD का पारंपरिक आधार हैं।

⦁ अति पिछड़ा वर्ग (EBC) और दलित समुदाय लगभग 35% हैं, जिनमें पीके ने अपने संगठन के जरिए प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की है।

⦁ भूमिहार और ब्राह्मण वोटर्स करीब 12-13% हैं, जो पहले NDA के साथ रहे हैं। हालांकि, इस वर्गे में एक हिस्सा प्रशांत किशोर के विकास-आधारित एजेंडे से प्रभावित हो सकते हैं।

⦁ राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, अगर पीके इस बार यादव-मुस्लिम मतदाताओं के कुछ प्रतिशत वोट भी तोड़ने में सफल रहे, तो मुकाबला रोमांचक हो सकता है।

Prashant Kishor के लिए लड़ाई बेहद मुश्किल

प्रशांत किशोर का पूरा फोकस स्थानीय असंतोष, बेरोजगारी और विकास की कमी पर है। वे खुद को जनसुराज के विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं। हालांकि, तेजस्वी यादव के पास पारिवारिक प्रभाव, संगठन की मजबूती और यादव-मुस्लिम वोट बैंक की एकजुटता का लाभ है। राघोपुर का चुनाव इस बार सिर्फ दो व्यक्तियों के बीच नहीं, बल्कि परिवार बनाम विकल्प की लड़ाई बनता दिख रहा है। पीके अगर वाकई में यहां से उतरते हैं, तो उनके लिए जीत का सफर तय करना मुश्किल होगा।

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