Bihar aseembly elections: राघोपुर में तेजस्वी को घेरने आगे क्यों नहीं आए नीतीश कुमार?

नई दिल्ली। बिहार में मूल रूप से मुख्यमंत्री पद के दो दावेदार हैं। महागठबंधन के तेजस्वी यादव और एनडीए की ओर से नीतीश कुमार। तेजस्वी चुनाव लड़ रहे हैं और नीतीश ने 35 साल से विधानसभा का चुनाव लड़ा ही नहीं है। जाहिर है घेराबंदी तेजस्वी की ही होगी। और, तेजस्वी को घेरने में एनडीए जुट गया है। तेजस्वी यादव को एनडीए हराने में जुटे, यह चौंकाने वाली बात नहीं है। चौंकाने वाली बात यह है कि तेजस्वी को हराने की चुनौती नीतीश कुमार या उनकी पार्टी जेडीयू ने नहीं ली है। यह जिम्मेदारी बीजेपी ने ली है। आखिर नीतीश कुमार ने महागठबंधन में मुख्यमंत्री पद के दावेदार तेजस्वी यादव को हराने की जिम्मेदारी खुद उसी तरह आगे बढ़कर क्यों नहीं ली जैसे उन्होंने 2010 में राबड़ी देवी को हराने के लिए ली थी?

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    तेजस्वी यादव राघोपुर विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार हैं। बीजेपी ने तेजस्वी यादव को चुनौती देने की जिम्मेदारी लेकर एक तरह से संदेश देने का काम किया है कि सीएम की कुर्सी पर दावेदारी उसी की है। वहीं, नीतीश कुमार ने यह चुनौती छोड़कर या हाथ से जाने देकर एनडीए के भीतर खुद को कमतर साबित किया है। यह सिर्फ कहने की बात नहीं है। बल्कि, इसमें राजनीतिक रूप से संकेत भी छिपे हैं। यह संकेत बीजेपी भी दे रही है और जेडीयू भी।

    2010 में भी बीजेपी और जेडीयू ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा था। तब जेडीयू के तेवर ऐसे थे कि दूसरे नंबर पर रही बीजेपी को यह सीट न देकर खुद उम्मीदवार उतारा था और मुख्यमंत्री पद की दावेदार आरजेडी नेता व पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी को चुनौती दी थी। और, जेडीयू के सतीश कुमार ने राबड़ी देवी को हराया था। ये वही सतीश कुमार हैं जो पहले भी राघोपुर से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ चुके थे। 2010 में जेडीयू को 48 फीसदी और आरजेडी को 38 फीसदी वोट मिले थे। सतीश कुमार को 64,222 वोट और राबड़ी देवी को 51,216 वोट मिले थे।

    2020 में भी बीजेपी और जेडीयू मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं लेकिन नीतीश कुमार में 2010 वाला तेवर दिखायी नहीं पड़ रहा है। 2015 में तेजस्वी यादव महागठबंधन के उम्मीदवार थे और नीतीश कुमार साथ थे। एक और अंतर यह था कि तेजस्वी यादव नहीं, खुद नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार थे। तब राघोपुर सीट पर तेजस्वी ने बीजेपी उम्मीदवार सतीश कुमार को 22,733 वोटों से हराया था। उन्हें 91,236 वोट मिले थे। प्रतिशत रूप में देखा जाए तो तेजस्वी को 49 फीसदी वोट मिले थे और अपने निकटतम प्रतिद्द्वी सतीश कुमार से 12 फीसदी अधिक वोट हासिल हुए थे।

    2020 में एक बार फिर बीजेपी ने सतीश कुमार पर ही दांव खेला है। जेडीयू सतीश कुमार के साथ हैं। उम्मीदवार बनने के लिए पार्टी बदलना तो देखा गया है, सुना गया है लेकिन एक उम्मीदवार के लिए पार्टी खुद को बदल दे ऐसा नहीं होता। मगर, जेडीयू अपने ही पूर्व विधायक को बीजेपी उम्मीदवार के तौर पर समर्थन करने को मजबूर है।

    राघोपुर विधानसभा सीट इससे पहले 2005 में आरजेडी के पास थी जबकि 2000 में बीजेपी के पास और 1995 और 1990 में जनता दल के पास। बीजेपी 1995 के बाद से ही यहां मुकाबले में रही है। लिहाजा बीजेपी का दावा तो राघोपुर सीट पर बनता है। मगर, एनडीए में रहकर कभी मुख्यमंत्री की दावेदार राबड़ी देवी को हराने वाली जेडीयू इस बार एनडीए में रहकर मुख्यमंत्री पद के दावेदार तेजस्वी का सामना करने से क्यों कतरा गयी, यह बात चौंकाने वाली भी है और इसके राजनीतिक मायने-मतलब से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

    बहरहाल, तेजस्वी यादव के लिए कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके खिलाफ बीजेपी है या कि जेडीयू। प्रतिद्वंद्वी नया नहीं है। यह बात उनके हक में ही जाती है। प्रतिद्वंद्वी दलबदलू है यह बात भी तेजस्वी के हक में जाती है। फिर भी बीजेपी राघोपुर में तेजस्वी को हराने के लिए मजबूत किलेबंदी कर रही है और तेजस्वी यादव नहीं चाहेंगे कि अपनी सीट को लेकर वे कोई लापरवाही करें। बीजेपी की रणनीति सियासी शतरंज की बिसात पर राजा मार देने और खेल जीत लेने की है।

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