Begusarai News: चुनावों में वोट खरीदने के लिए शराब की जमाखोरी!, 'पुष्पा स्टाइल' में हो रही तस्करी, जानिए मामला
Begusarai News: बिहार सरकार भले ही राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू होने का दावा करती हो, लेकिन ज़मीनी हकीकत हर बार इस दावे की पोल खोल देती है। ताज़ा मामला बेगूसराय ज़िले के रिफाइनरी थाना क्षेत्र से सामने आया है, जहां 'पुष्पा स्टाइल' में ट्रक से शराब की तस्करी की जा रही थी।
चुनाव से पहले शराब की जमाखोरी तेज
मद्यनिषेध विभाग की टीम ने गुप्त सूचना के आधार पर कार्रवाई करते हुए 15 लाख रुपए से अधिक की शराब ज़ब्त की है। शराब तस्करी का यह नेटवर्क चुनाव पूर्व तैयारियों का हिस्सा माना जा रहा है। जांच एजेंसियों को संदेह है कि यह शराब आगामी विधानसभा उपचुनावों या निकट भविष्य के किसी भी मतदान के दौरान मतदाताओं को लुभाने के लिए इस्तेमाल की जानी थी।

क्या हैं एक्सपर्ट्स के कमेंट्स?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बीते कुछ हफ्तों में राज्य के विभिन्न जिलों से बड़ी मात्रा में शराब ज़ब्त की गई है, यह एक सुनियोजित रणनीति की ओर इशारा करता है। शराबबंदी कानून के बावजूद, कुछ रसूखदार तंत्रों और राजनीतिक संरक्षण की मदद से चुनावों में वोट खरीदने के लिए शराब की जमाखोरी की जा रही है।
'पुष्पा स्टाइल' तस्करी, ट्रक बना तस्करों का नया हथियार
इस बार तस्करों ने शराब की ढुलाई के लिए ट्रक का सहारा लिया, ताकि कम शक हो और विभिन्न इलाकों में बेरोकटोक आवाजाही संभव हो। ज़ब्त शराब की खेप को ट्रक से ग्रामीण रास्तों के ज़रिए विभिन्न जिलों में सप्लाई किया जाना था। यह तरीका दक्षिण भारतीय फिल्म 'पुष्पा' में दिखाए गए तस्करी के तरीकों से प्रेरित बताया जा रहा है, जहां लकड़ी, मिट्टी और अन्य सामान की आड़ में प्रतिबंधित चीजें लाई जाती हैं।
सरकार की चुप्पी पर सवाल
हर बार की तरह इस बार भी प्रशासन शराब की बरामदगी को बड़ी उपलब्धि बता रहा है, लेकिन असली सवाल यह है कि जब शराबबंदी क़ानून इतना सख्त है तो फिर हर चुनाव से पहले शराब कहां से आती है? कौन लोग इसे संरक्षित कर रहे हैं? क्या यह पूरी तस्करी व्यवस्था किसी 'राजनीतिक इकोसिस्टम' का हिस्सा है?
जनता के सवाल, सरकार के लिए चुनौती
बिहार की जनता अब यह पूछ रही है कि क्या शराबबंदी सिर्फ गरीबों और छोटे दुकानदारों के लिए है, चुनाव आते ही शराब किसके संरक्षण में बंटने लगती है, ऐसा लगता है जैसे खुद प्रशासन और नेता की देखरेख में यह खेल होता है। बिहार में शराबबंदी अब एक चुनावी जुमला बनती जा रही है।
ज़मीनी स्तर पर शराब की उपलब्धता, तस्करी और राजनीतिक इस्तेमाल यह दर्शाता है कि कानून और सख्ती केवल कागज़ों में सीमित रह गई है। अगर सरकार वास्तव में शराबबंदी को लेकर गंभीर है, तो उसे सिर्फ ज़ब्ती की खबरें दिखाने की बजाय, इस पूरे नेटवर्क के "सरगनाओं और संरक्षकों" तक पहुंचना होगा।
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