MP News: मध्यप्रदेश विधानसभा में क्यों हुआ हंगामा, जानिए, आदिवासी अधिकारों को लेकर कांग्रेस का जोरदार प्रदर्शन
मध्य प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र के तीसरे दिन, 30 जुलाई 2025 को, विपक्षी दल कांग्रेस ने आदिवासी अधिकारों को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के नेतृत्व में कांग्रेस विधायकों ने विधानसभा परिसर में प्रतीकात्मक विरोध दर्ज किया।
विधायकों ने पत्तों से बनी मालाएं पहनकर और बैनरों के साथ नारेबाजी कर सरकार पर आदिवासियों की जमीन बेदखली, वन अधिकार पट्टों को निरस्त करने, पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम (पेसा) को लागू न करने, और जल-जंगल-जमीन पर आदिवासियों के अधिकार छीनने का आरोप लगाया।

यह प्रदर्शन विधानसभा परिसर में चर्चा का विषय बन गया, जिसने सत्तारूढ़ भाजपा सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया। यह खबर प्रदर्शन के कारणों, घटनाक्रम, और इसके राजनीतिक निहितार्थों को विस्तार से उजागर करती है।
प्रतीकात्मक प्रदर्शन: पत्तों की मालाएं और नारेबाजी
मानसून सत्र के तीसरे दिन, बुधवार सुबह 10 बजे, कांग्रेस विधायकों ने विधानसभा परिसर में एक अनोखा प्रदर्शन शुरू किया। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार, जो स्वयं आदिवासी समुदाय से हैं, के नेतृत्व में विधायकों ने पत्तों से बनी मालाएं पहनीं और बैनरों के साथ नारे लगाए, जैसे "जल-जंगल-जमीन बचाओ, आदिवासी अधिकार सुनिश्चित करो" और "भाजपा सरकार मुर्दाबाद, आदिवासियों पर अत्याचार बंद करो।" यह प्रतीकात्मक प्रदर्शन आदिवासियों के प्रकृति से गहरे जुड़ाव और उनके अधिकारों की रक्षा की मांग को दर्शाने के लिए था।
उमंग सिंघार ने विधानसभा परिसर में पत्रकारों से कहा, "भाजपा सरकार आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन के अधिकार छीन रही है। वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत दिए गए पट्टों को निरस्त किया जा रहा है, और पेसा कानून को लागू करने में सरकार पूरी तरह विफल रही है। यह प्रदर्शन सरकार की संवेदनहीनता के खिलाफ है।"
प्रदर्शन के मुद्दे
आदिवासियों की जमीन बेदखली: उमंग सिंघार ने आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश में आदिवासियों की पुश्तैनी जमीन को कॉरपोरेट्स और बाहरी लोगों को सौंपा जा रहा है। खासकर मंडला, डिंडोरी, और बालाघाट जैसे आदिवासी बहुल जिलों में जमीन बेदखली की शिकायतें बढ़ी हैं।
वन अधिकार पट्टों का निरस्तीकरण: वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत आदिवासियों को दिए गए सामुदायिक और व्यक्तिगत वन पट्टों को सरकार द्वारा निरस्त किया जा रहा है। सिंघार ने कहा, "आदिवासियों को उनके जंगल से बेदखल किया जा रहा है, जो उनकी आजीविका का आधार है।"
पेसा कानून का गैर-अनुपालन: पेसा कानून, जो अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों को विशेष अधिकार देता है, को मध्य प्रदेश में प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया गया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सरकार आदिवासियों के स्वशासन के अधिकारों को कमजोर कर रही है।
जल-जंगल-जमीन पर अधिकारों का हनन: आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों को संरक्षित करने के बजाय, सरकार विकास परियोजनाओं के नाम पर जंगलों और नदियों पर नियंत्रण बढ़ा रही है। उमंग सिंघार ने मंडला में हाल के फर्जी नक्सली एनकाउंटर का जिक्र करते हुए कहा, "आदिवासी असुरक्षित हैं। सरकार उनकी आवाज दबा रही है।"

विधानसभा में हंगामा और वॉकआउट
प्रदर्शन के बाद, जब विधानसभा की कार्यवाही शुरू हुई, तो कांग्रेस विधायकों ने प्रश्नकाल में आदिवासी मुद्दों को उठाने की कोशिश की। उमंग सिंघार ने मंडला में हुए कथित फर्जी नक्सली एनकाउंटर की जांच की मांग की, जिसमें एक आदिवासी युवक की मौत हुई थी। उन्होंने कहा, "मध्य प्रदेश अव्यवस्था की राजधानी बन गया है। आदिवासियों पर अत्याचार बढ़ रहे हैं, और सरकार चुप है।"
हालांकि, सत्तारूढ़ भाजपा विधायकों ने इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया, जिसके बाद सदन में हंगामा शुरू हो गया। कांग्रेस विधायकों ने सरकार की चुप्पी के विरोध में वॉकआउट किया और विधानसभा परिसर में फिर से नारेबाजी शुरू कर दी। पूर्व कृषि मंत्री सचिन यादव ने कहा, "सरकार को न किसानों की चिंता है, न आदिवासियों की। हम हर जिले में 1000 किसान न्याय योद्धा बनाएंगे और आदिवासियों की लड़ाई लड़ेंगे।"
सरकार का जवाब: आरोपों का खंडन
संसदीय कार्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने कांग्रेस के प्रदर्शन को "नौटंकी" करार देते हुए कहा, "कांग्रेस आदिवासियों के मुद्दों पर सिर्फ राजनीति कर रही है। मध्य प्रदेश में लाडली बहना योजना और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के जरिए आदिवासियों का सशक्तिकरण हो रहा है।" उन्होंने दावा किया कि वन अधिकार पट्टों की समीक्षा केवल गलत आवंटनों को ठीक करने के लिए की जा रही है, और पेसा कानून को लागू करने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी एक बयान में कहा, "हमारी सरकार आदिवासियों के कल्याण के लिए काम कर रही है। केंद्र सरकार की योजनाओं जैसे PM-JANMAN और PM Awas Yojana के तहत आदिवासी समुदाय को लाभ पहुंचाया जा रहा है। कांग्रेस का प्रदर्शन केवल सस्ती लोकप्रियता के लिए है।"
आदिवासी अधिकारों का मुद्दा: पृष्ठभूमि
मध्य प्रदेश में 21% आबादी आदिवासी समुदाय की है, और यह राज्य देश में सबसे बड़ी आदिवासी जनसंख्या वाला राज्य है। मंडला, डिंडोरी, छिंदवाड़ा, और बालाघाट जैसे जिलों में आदिवासी बहुल क्षेत्र हैं। वन अधिकार अधिनियम 2006 और पेसा कानून 1996 आदिवासियों को उनकी जमीन, जंगल, और स्वशासन के अधिकार देने के लिए बनाए गए थे, लेकिन इनके कार्यान्वयन में कई खामियां सामने आई हैं।
हाल के वर्षों में, मध्य प्रदेश में विकास परियोजनाओं जैसे खनन, बांध निर्माण, और औद्योगिक गलियारों के लिए आदिवासियों की जमीन अधिग्रहण के मामले बढ़े हैं। 2024 में, मंडला में एक कथित नक्सली एनकाउंटर में एक आदिवासी युवक की मौत ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया। इसके अलावा, केंद्र सरकार की नई वन नीति और वन संरक्षण अधिनियम में संशोधन के प्रस्ताव ने भी आदिवासी संगठनों में असंतोष पैदा किया है।
विशेषज्ञों की राय
आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता रमेश आदिवासी ने कहा, "मध्य प्रदेश में आदिवासियों की जमीन और जंगल पर उनका अधिकार संवैधानिक है, लेकिन सरकार इसे नजरअंदाज कर रही है। पेसा कानून को लागू करने के लिए ग्राम सभाओं को सशक्त करना जरूरी है।"
राजनीतिक विश्लेषक डॉ. अनिल वर्मा ने कहा, "कांग्रेस का यह प्रदर्शन आदिवासी वोट बैंक को साधने की कोशिश है, खासकर 2024 लोकसभा चुनाव के बाद BJP की प्रचंड जीत को देखते हुए। लेकिन यह मुद्दा जमीनी हकीकत को दर्शाता है, और सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।"
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