₹35 हजार रोज का मटन, साल में ₹1.27 करोड़ खर्च… कूनो के चीते बने सियासत का नया मुद्दा

मध्य प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र में श्योपुर जिले स्थित कूनो नेशनल पार्क एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया। कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा के सवाल के जवाब में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने लिखित जानकारी दी कि वित्तीय वर्ष 2024-25 में चीतों के भोजन पर ₹1,27,10,870 यानी करीब 1.27 करोड़ रुपये खर्च किए गए।

औसतन प्रतिदिन लगभग ₹35,000 का बकरी का मटन इन चीतों को उपलब्ध कराया जा रहा है। इस खुलासे के बाद सदन में तीखी बहस छिड़ गई और विपक्ष ने इसे "अत्यधिक खर्च" बताते हुए सरकार को घेरा।

Leopards of Kuno Is Project Cheetah proving costly or is it a long haul mp news

वर्तमान में 32 चीते मौजूद

सरकारी आंकड़ों के अनुसार कूनो वाइल्डलाइफ डिवीजन में वर्तमान में 32 चीते मौजूद हैं, जबकि पूरे मध्य प्रदेश में इनकी संख्या 38 बताई गई है। चीतों को आवश्यकता के अनुसार बकरी का मीट दिया जाता है और प्रति चीता कोई तय मानक निर्धारित नहीं है। जंगल में प्राकृतिक शिकार के रूप में चीतल छोड़े गए हैं, लेकिन सप्लीमेंट्री फीडिंग के तौर पर खरीदा गया मटन ही मुख्य भोजन बना हुआ है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि चीतों के लिए अलग से कोई विशेष फंड निर्धारित नहीं है, बल्कि खर्च सामान्य वन्यजीव संरक्षण बजट से वहन किया जाता है।

विपक्ष का आरोप है कि यदि चीतों को पर्याप्त प्राकृतिक शिकार मिल रहा होता तो इतनी बड़ी राशि मटन खरीदने पर खर्च नहीं करनी पड़ती। विधायक मुकेश मल्होत्रा ने सदन में कहा कि कई बार चीते पार्क की सीमा पार कर गांवों में पहुंच रहे हैं और ग्रामीणों की बकरियों व मवेशियों का शिकार कर रहे हैं, जिससे स्थानीय लोगों को नुकसान हो रहा है। उनका तर्क है कि करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद यदि परियोजना आत्मनिर्भर नहीं बन पा रही, तो यह सरकार के लिए "सफेद हाथी" साबित हो सकती है।

मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने जवाब में कहा कि खुला जंगल होने के कारण चीतों का कभी-कभी बाहर निकलना असामान्य नहीं है और यह प्रोजेक्ट के शुरुआती चरण में अपेक्षित स्थिति है। उन्होंने स्पष्ट किया कि चीतों का ट्रांसलोकेशन कार्यक्रम आबादी संतुलन और अनुकूलन रणनीति का हिस्सा है। सरकार का दावा है कि यह राष्ट्रीय महत्व की पहल है और दीर्घकाल में इससे जैव विविधता, पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ मिलेगा।

गौरतलब है कि प्रोजेक्ट चीता के तहत वर्ष 2022 में नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से अफ्रीकी चीतों को भारत लाया गया था। यह लगभग सात दशक बाद देश में चीते की वापसी का ऐतिहासिक प्रयास था। हालांकि शुरुआती दौर में कुछ चीतों की मृत्यु, गर्मी से अनुकूलन की समस्या और प्राकृतिक शिकार की कमी जैसी चुनौतियां सामने आईं। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि कूनो में चीतल और अन्य शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या बढ़ाने पर जोर दिया जाना चाहिए, ताकि सप्लीमेंट्री फीडिंग पर निर्भरता कम हो सके।

विधानसभा में उठी बहस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि 'प्रोजेक्ट चीता' अब केवल वन्यजीव संरक्षण का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि सार्वजनिक खर्च, प्राथमिकताओं और ग्रामीण-वन्यजीव संतुलन से जुड़ा राजनीतिक प्रश्न भी बन गया है। फिलहाल कूनो के चीते संरक्षित वातावरण में "विशेष खुराक" पर पल रहे हैं, लेकिन सरकार के सामने चुनौती यह है कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना को आर्थिक रूप से टिकाऊ और पारिस्थितिक दृष्टि से सफल कैसे बनाया जाए।

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