दीपावली की रात में चिराग बुझ गए: सीहोर के कचनारिया गांव में झोलाछाप की लापरवाही से दो मासूमों की मौत
दीपावली का त्योहार रोशनी, खुशियों और समृद्धि का प्रतीक है, लेकिन मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के आष्टा तहसील के कचनारिया गांव में यह पर्व एक परिवार के लिए अनंत अंधेरे का कारण बन गया। सोमवार रात से शुरू हुई यह त्रासदी मंगलवार दोपहर तक चली, जिसमें 1.5 वर्षीय अंशिका और 8 वर्षीय वंश नामक दो भाई-बहन की दर्दनाक मौत हो गई।
परिवार की तीसरी संतान-3 वर्षीय वंशिका-भोपाल के हमीदिया अस्पताल में वेंटिलेटर पर जिंदगी की जंग लड़ रही है। परिजनों का आरोप है कि बच्चों को उल्टी-दस्त की शिकायत के बाद गांव के एक झोलाछाप डॉक्टर के पास ले गए थे, जहां गलत दवा और इंजेक्शन ने उनकी हालत बिगाड़ दी। 14 घंटे के भीतर तीनों बच्चों की जिंदगियां दांव पर लग गईं। स्वास्थ्य विभाग ने दवा जब्त कर ली है, लेकिन आरोपी डॉक्टर फरार बताया जा रहा है।

यह घटना न केवल ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल रही है, बल्कि झोलाछापों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग को तेज कर रही है। आइए, इस हृदयविदारक घटना की पूरी परतें खोलते हैं-परिजनों की जुबानी, पुलिस की जांच और विशेषज्ञों की राय।
त्रासदी की शुरुआत: दीपावली की रौनक में अचानक बीमारी का साया
कचनारिया गांव, जो आष्टा से करीब 20 किलोमीटर दूर भोपाल-इंदौर राजमार्ग पर बसा एक छोटा-सा ग्रामीण इलाका है, सोमवार शाम तक दीपावली की चहल-पहल से गूंज रहा था। पटाखों की गूंज, दीयों की रोशनी और मिठाइयों की खुशबू के बीच अखिलेश मालवीय का परिवार भी उत्सव में मग्न था। अखिलेश, एक छोटे से किसान और मजदूर हैं, जिनकी तीन संतानें-बेटी अंशिका (1.5 वर्ष), बेटा वंश (8 वर्ष) और छोटी बेटी वंशिका (3 वर्ष)-परिवार का सहारा थीं। वंश परिवार का इकलौता बेटा था, जिसकी हंसी-खुशी घर की जान थी।
लेकिन रात करीब 8 बजे अचानक अंशिका को उल्टी-दस्त शुरू हो गया। उसके बाद वंश और वंशिका को भी यही समस्या हुई। परिजनों ने बताया कि शाम को घर पर बनी खीर खाने के बाद यह शिकायत हुई, लेकिन प्रारंभ में इसे मामूली पेट दर्द समझा गया। अखिलेश की पत्नी सुनीता ने कहा, "हमने घरेलू उपाय किए, लेकिन बच्चों की हालत बिगड़ती गई। गांव में रात का समय था, नजदीकी सिविल अस्पताल बंद था। इसलिए हमने गांव के ही एक झोलाछाप-जिसे स्थानीय लोग 'डॉक्टर साहब' कहते हैं-के पास ले गए।" यह डॉक्टर, जिसका नाम गोपनीय रखा गया है, गांव के एक छोटे क्लीनिक में काम करता है और बिना किसी डिग्री के इलाज का दावा करता है।
परिजनों के अनुसार, डॉक्टर ने बच्चों को देखा और बिना किसी जांच के दवाएं दे दीं। फिर इंजेक्शन लगाए। सुनीता ने रोते हुए बताया, "दवा खाने के आधे घंटे बाद ही अंशिका की हालत ज्यादा खराब हो गई। वह सांस लेने लगी मुश्किल से। हम घबरा गए।" इसी बीच वंश और वंशिका भी छटपटाने लगे। रात 10 बजे के आसपास परिवार ने बच्चों को आष्टा के सिविल अस्पताल पहुंचाया, लेकिन वहां सुविधाओं की कमी के कारण उन्हें जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया। रास्ते में ही 1.5 वर्षीय अंशिका की सांसें थम गईं। डॉक्टरों ने कहा कि इंजेक्शन की वजह से एलर्जी हो गई, जो विषाक्त प्रतिक्रिया का रूप ले चुकी थी।
14 घंटे की जंग: दूसरी मौत और तीसरी बहन की गंभीर हालत
अंशिका की मौत के बाद परिवार टूट चुका था, लेकिन संघर्ष खत्म नहीं हुआ। मंगलवार सुबह करीब 6 बजे वंश को जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी हालत स्थिर बताई गई। लेकिन दोपहर 12 बजे अचानक उसकी सांसें रुक गईं। वंशिका को तुरंत भोपाल रेफर किया गया, जहां हमीदिया अस्पताल के आईसीयू में उसे वेंटिलेटर पर रखा गया। डॉक्टरों का कहना है कि उसकी किडनी और लीवर प्रभावित हो चुके हैं, और 50-50 की संभावना है। अखिलेश ने बताया, "वंश हमारा इकलौता बेटा था। वह स्कूल जाता था, खेलता था। अब घर सूना हो गया। वंशिका को बचाना है, उसके लिए हम कुछ भी करेंगे।"
परिजनों ने आरोप लगाया कि झोलाछाप ने गलत एंटीबायोटिक इंजेक्शन लगाया, जो बच्चों की उम्र के अनुपात में अधिक मात्रा का था। एक स्थानीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "ऐसे डॉक्टर अक्सर बिना लाइसेंस के काम करते हैं। ग्रामीण इलाकों में सरकारी अस्पताल दूर होने से लोग इनके पास जाते हैं।" दैनिक भास्कर की टीम ने मंगलवार दोपहर गांव पहुंचकर अखिलेश से बात की। वह रोते हुए बोले, "हम गरीब हैं, लेकिन बच्चों की जान की कीमत क्या? सरकार को ऐसे डॉक्टरों पर रोक लगानी चाहिए।"
स्वास्थ्य विभाग और पुलिस की कार्रवाई: दवा जब्त, डॉक्टर फरार
मंगलवार दोपहर स्वास्थ्य विभाग की टीम-जिसमें आष्टा बीएमओ डॉ. आरएस शर्मा और जिला स्वास्थ्य अधिकारी शामिल थे-गांव पहुंची। उन्होंने झोलाछाप के क्लीनिक पर छापा मारा और संदिग्ध दवाओं व इंजेक्शन को जब्त कर लिया। डॉ. शर्मा ने बताया, "हमने सैंपल लैब भेज दिए हैं। प्रारंभिक जांच में पाया गया कि दवाएं बिना लेबल की थीं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार है।" पुलिस ने भी मामला दर्ज कर लिया है। आष्टा थाना प्रभारी ने कहा, "परिजनों की शिकायत पर आईपीसी की धारा 304 (लापरवाही से मौत) के तहत केस दर्ज हुआ है। डॉक्टर फरार है, टीमें तलाश कर रही हैं।"
यह घटना मध्य प्रदेश में झोलाछापों के खिलाफ चल रही मुहिम को मजबूत करती है। पिछले साल राज्य में 200 से अधिक ऐसे मामले दर्ज हुए, जिनमें 50 बच्चों की मौत हुई। विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में 108 एम्बुलेंस और मोबाइल मेडिकल यूनिट बढ़ाने की जरूरत है।
झोलाछापों का काला कारोबार: ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खुली
मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में झोलाछापों की समस्या गहरी है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 70% ग्रामीण इलाकों में लोग सरकारी डॉक्टरों के बजाय इनके पास जाते हैं, क्योंकि ये सस्ते और आसानी से उपलब्ध होते हैं। लेकिन इनके इलाज से सालाना 500 से अधिक मौतें होती हैं। सीहोर जिले में ही पिछले छह महीनों में तीन इसी तरह के मामले सामने आए, जहां गलत इंजेक्शन से जहर फैल गया। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अनुराग तिवारी ने कहा, "उल्टी-दस्त जैसे मामलों में ORS और हाइड्रेशन जरूरी है, न कि एंटीबायोटिक्स। गलत दवा से सेप्सिस हो जाता है, जो बच्चों के लिए घातक है।"
परिवार का दर्द: इकलौते बेटे की मौत ने तोड़ा सब कुछ
अखिलेश का परिवार अब टूट चुका है। सुनीता ने बताया, "दीपावली पर हमने लक्ष्मी पूजा की थी, लेकिन मां ने हमारे चिराग बुझा दिए। वंशिका को बचाओ, बस यही प्रार्थना है।" गांव वाले भी सदमे में हैं। एक बुजुर्ग ने कहा, "ऐसे डॉक्टर गांव की जान ले रहे हैं। सरकार सोई हुई है।" परिवार ने आर्थिक मदद की अपील की है, जिसके लिए जिला प्रशासन ने 50 हजार रुपये की सहायता घोषित की।
आगे की राह: सख्त कानून और जागरूकता जरूरी
यह त्रासदी ग्रामीण भारत के स्वास्थ्य संकट को उजागर करती है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि झोलाछापों के खिलाफ विशेष ड्राइव चलाई जाए, और टेलीमेडिसिन को बढ़ावा दिया जाए। सीएमओ ने कहा, "हम आष्टा में मोबाइल क्लिनिक शुरू करेंगे। जांच पूरी होने पर दोषी को सजा मिलेगी।" वंशिका की हालत स्थिर होने की उम्मीद है, लेकिन परिवार का घाव गहरा है। क्या यह घटना बदलाव लाएगी, या फिर भुला दी जाएगी? समय बताएगा।
मध्य प्रदेश सरकार से मांग उठ रही है कि झोलाछापों पर पूर्ण प्रतिबंध लगे और ग्रामीणों को मुफ्त स्वास्थ्य बीमा मिले। फिलहाल, कचनारिया में दीयों की रोशनी बुझ चुकी है, लेकिन न्याय की ज्योति जलनी चाहिए।












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