विदिशा के किसान ने जगाई अलख, अब गांव में 300 बीघा में हो रही औषधीय पौधों की खेती

विदिशा के किसान लखनलाल ने बताया कि गांव पाली में 70 प्रतिशत किसानों द्वारा अश्वगंधा की खेती लगभग 300 बीघा जमीन में की जा रही है। गांव के सभी किसान काफी अच्छा लाभ कमा रहे हैं।

Farmers of Pali village of Vidisha are cultivating medicinal plants in 300 bighas.

सोयाबीन की खेती के लिए फेमस मध्य प्रदेश के किसान सोयाबीन छोड़कर अन्य फसलों में भी रूचि ले रहे हैं। इन दिनों प्रदेश के किसान पारंपरिक खेती को छोड़कर व्यावसायिक ऑर्गेनिक खेती कर रहे हैं। इसका एक उदाहरण विदिशा जिले की नटेरन तहसील के गांव पाली में देखने को मिल रहा है। पाली गांव के किसान लखनलाल पाठक ने अश्वगंधा की खेती करके गांव की समृद्धि के नए द्वार खोल दिए हैं। लखनलाल से प्रभावित होकर गांव के अन्य किसान भी अश्वगंधा की खेती करने लगे है। अब पाली गांव अश्वगंधा व अन्य औषधि फसलों के उत्पादन में अपनी विशिष्ट पहचान बना रहा है। आखिर किसान लखन लाल को कैसे अश्वगंधा की खेती का आइडिया आया और इसके क्या फायदे हैं ? नीचे पूरी खबर विस्तार से जाने....

पारंपरिक खेती से हटकर पहली बार की अश्वगंधा की खेती

पारंपरिक खेती से हटकर पहली बार की अश्वगंधा की खेती

किसान लखन लाल ने बताया कि 2013 में सीहोर के कृषि महाविद्यालय में प्रशिक्षण शिविर में आत्मा परियोजना के बारे में जानकारी ली थी। इसके बाद ही उन्होंने अगले साल यानी 2014 से अश्वगंधा की खेती शुरू कर दी। शुरू में मन में कई सवाल आए। क्योंकि पारंपरिक खेती से हटकर पहली बार अश्वगंधा की खेती कर रहे थे। ऐसे में उनके मन में अश्वगंधा को लेकर कई सवाल खड़े हुए। उन्हें डर था कही घाटा न हो जाए, लेकिन उन्होंने अश्वगंधा के साथ सफेद मूसली, कलौंजी, हल्दी, सर्पगंधा जैसी औषधि फसलों को भी लगाया।

35 से ₹40 हजार प्रति क्विंटल भाव

35 से ₹40 हजार प्रति क्विंटल भाव

लखनलाल बताया कि एक बीघा जमीन में दो तीन कुंटल अश्वगंधा का उत्पादन होता है, जिसका मूल्य 35 से ₹40 हजार प्रति क्विंटल मिलता है। अब गांव के 70 से 80% किसान अश्वगंधा की खेती कर रहे हैं गांव में लगभग 300 बीघा जमीन में औषधीय खेती हो रही है। किसानों का कहना है कि सोयाबीन और गेहूं के बाद उन्हें अश्वगंधा की खेती लाभ का खेती लग रही है।औषधीय फसलों के विक्रय के लिए कृषक नीमच कृषि उपज मण्डी जाते हैं, लेकिन आज के समय में कई प्रकार की हर्बल कंपनियां गांव में आकर ही किसानों से संपर्क कर उपज को खरीदने में अपनी रूचि दिखाने लगी हैं।

अश्वगंधा की खेती सितंबर अक्टूबर के महीने में होती है सबसे ज्यादा

अश्वगंधा की खेती सितंबर अक्टूबर के महीने में होती है सबसे ज्यादा

कृषि वैज्ञानिक बलराज सिंह ने जानकारी देते हुए बताया कि अश्वगंधा की खेती सितंबर अक्टूबर के महीने में सबसे ज्यादा की जाती है। भारत में उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में अश्वगंधा की खेती सबसे ज्यादा की जाती है। अश्वगंधा के फल, बीज और छाल का प्रयोग कई प्रकार की दवाइयां बनाने में किया जाता है। इसके बीज का अंकुरण सात से आठ दिन में हो सकता है। कृषि बाजार में अश्वगंधा की डिमांड रोजाना बढ़ रही है। अश्वगंधा के पौधे की कटाई जनवरी से लेकर मार्च के बीच की जाती है।

शमशाबाद को औषधि तहसील बनाने का लक्ष्य

शमशाबाद को औषधि तहसील बनाने का लक्ष्य

नटेरन तहसील के पाली गांव में किसानों का कहना है कि क्षेत्र के अधिक से अधिक किसानों को अश्वगंधा की खेती के बारे में जागरूक कर रहे हैं। किसान लखन लाल ने बताया कि औषधि निर्माण और बिक्री के लिए आयुष विभाग से लाइसेंस लेकर कंपनी बनाई। उन्होंने भरतद्वाज हर्बल एण्ड आयुर्वेदा ओपीसी प्रा. लिमिटेड के नाम से कंपनी रजिस्टर्ड कराई है। पहले तो नटेरन तहसील की किसान अश्वगंधा में रुचि ले रहे थे,लेकिन अब पास की तहसील शमशाबाद के किसान भी अश्वगंधा की खेती करने लगे हैं। उनका लक्ष्य 2025 तक शमशाबाद को औषधीय तहसील बनाने का है।

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