MP News: गुना फतेहगढ़ में ट्रॉली पर प्रसव, स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही उजागर, रोशनी सहरिया की दर्दनाक कहानी
Delivery On Trolley: मध्य प्रदेश के गुना जिले के फतेहगढ़ स्वास्थ्य केंद्र में एक बार फिर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खुल गई है। रामपुरिया गांव की आदिवासी महिला रोशनी सहरिया को प्रसव पीड़ा के दौरान समय पर सरकारी एंबुलेंस नहीं मिली, जिसके चलते उन्हें ट्रैक्टर की ट्रॉली में चारपाई पर लादकर अस्पताल लाना पड़ा। लेकिन अस्पताल के गेट पर पहुंचते ही ट्रॉली पर ही उनका प्रसव हो गया।
यह घटना न केवल स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली को भी सामने लाती है। अप्रैल 2025 से अब तक फतेहगढ़ स्वास्थ्य केंद्र पर 100 से अधिक ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां प्रसूताओं को निजी वाहनों या ट्रैक्टरों के सहारे अस्पताल लाना पड़ा। इस मामले में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) डॉ आर ऋषिश्वर की जिम्मेदारी पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

रोशनी सहरिया की दर्दनाक कहानी
गुरुवार सुबह रामपुरिया गांव की 28 वर्षीय रोशनी सहरिया को सुबह 8 बजे से प्रसव पीड़ा शुरू हुई। उनके पति महावीर सहरिया ने तुरंत 108 जननी एक्सप्रेस एंबुलेंस सेवा को कॉल किया, लेकिन बार-बार प्रयास के बावजूद कॉल सेंटर ने जवाब दिया कि एंबुलेंस अन्य लोकेशन पर व्यस्त है। घंटों इंतजार के बाद भी कोई मदद न मिलने पर महावीर ने गांव के रंजीत सिंह सरदार के ट्रैक्टर की मदद ली। रोशनी को चारपाई पर लिटाकर ट्रैक्टर की ट्रॉली में फतेहगढ़ स्वास्थ्य केंद्र लाया गया। लेकिन अस्पताल के गेट पर पहुंचते ही स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि रोशनी का प्रसव ट्रॉली पर ही हो गया।
महावीर ने दुखी मन से बताया, "सुबह 8 बजे से मैं 108 पर कॉल कर रहा था, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। मजबूरी में पत्नी को ट्रैक्टर से लाना पड़ा। अस्पताल के गेट पर ही डिलीवरी हो गई। अगर समय पर एंबुलेंस मिलती, तो शायद यह नौबत न आती।" सौभाग्य से रोशनी और उनके नवजात की स्थिति स्थिर बताई जा रही है, लेकिन यह घटना स्वास्थ्य केंद्र की लचर व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
108 जननी एक्सप्रेस: कागजों में सेवा, हकीकत में लापरवाही
108 जननी एक्सप्रेस सेवा को गर्भवती महिलाओं को त्वरित और मुफ्त परिवहन सुविधा प्रदान करने के लिए शुरू किया गया था। केंद्र सरकार की जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (JSSK) योजना के तहत यह सेवा गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक मुफ्त परिवहन, डिलीवरी और नवजात देखभाल सुनिश्चित करती है। लेकिन फतेहगढ़ स्वास्थ्य केंद्र की घटना इस योजना की हकीकत को उजागर करती है। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, स्वास्थ्य केंद्र के पास कागजों में एक शासकीय और एक निजी एंबुलेंस मौजूद हैं, लेकिन समय पर उपलब्धता लगभग शून्य है।
रामपुरिया गांव के निवासी रंजीत सिंह सरदार ने बताया, "एंबुलेंस के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है। कई बार तो कॉल सेंटर जवाब ही नहीं देता। अगर हमने ट्रैक्टर न दिया होता, तो रोशनी और उनके बच्चे की जान को खतरा हो सकता था।" यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्थागत खामी का परिणाम है, जो ग्रामीण क्षेत्रों में बार-बार सामने आ रही है।
अप्रैल 2025 से 100 से अधिक मामले: ट्रैक्टर और निजी वाहनों पर निर्भरता
पड़ताल में सामने आया कि अप्रैल 2025 से अब तक फतेहगढ़ स्वास्थ्य केंद्र पर 100 से अधिक प्रसव ऐसे हुए हैं, जहां प्रसूताओं को सरकारी एंबुलेंस की अनुपलब्धता के कारण निजी वाहनों, ट्रैक्टरों या अन्य साधनों से अस्पताल लाना पड़ा। स्थानीय पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि कई बार गर्भवती महिलाओं को बाइक, ऑटो-रिक्शा या बैलगाड़ी पर लाया गया है। यह स्थिति न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी को दर्शाती है, बल्कि जननी सुरक्षा योजना (JSY) और जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम जैसी योजनाओं के कार्यान्वयन पर भी सवाल उठाती है।
सीएमएचओ डॉ आर ऋषिश्वर की जवाबदेही पर सवाल
इस मामले में जिला स्वास्थ्य प्रशासन की भूमिका भी जांच के दायरे में है। गुना के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) डॉ. आर. ऋषिश्वर से जब इस संबंध में संपर्क करने की कोशिश की गई, तो उन्होंने बार-बार कॉल्स का जवाब नहीं दिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि डॉ. ऋषिश्वर की ओर से आपातकालीन मामलों में पहले भी उदासीनता देखी गई है। एक सामाजिक कार्यकर्ता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "सीएमएचओ साहब बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं होती। फतेहगढ़ जैसे छोटे स्वास्थ्य केंद्रों में न तो पर्याप्त स्टाफ है, न ही संसाधन।"
पिछले कुछ महीनों में गुना जिले में स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित कई शिकायतें सामने आई हैं। मई 2025 में भी एक गर्भवती महिला को समय पर एंबुलेंस न मिलने की खबर ने सुर्खियां बटोरी थीं। इन घटनाओं ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली
फतेहगढ़ स्वास्थ्य केंद्र की यह घटना मध्य प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल स्थिति को उजागर करती है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। फतेहगढ़ जैसे छोटे स्वास्थ्य केंद्रों में न तो पर्याप्त डॉक्टर हैं, न ही नर्सिंग स्टाफ, और न ही आपातकालीन उपकरण। स्थानीय निवासियों का कहना है कि कई बार स्वास्थ्य केंद्र में केवल एक नर्स या एएनएम (Auxiliary Nurse Midwife) ड्यूटी पर होती है, जो आपात स्थिति को संभालने में असमर्थ रहती है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों का आक्रोश
रोशनी सहरिया की घटना के बाद स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश है। रामपुरिया गांव के निवासी रामलाल सहरिया ने कहा, "हम आदिवासी समुदाय के लोग पहले से ही उपेक्षित हैं। सरकारी योजनाएं हमारे लिए सिर्फ कागजों तक सीमित हैं। अगर रंजीत भाई ने ट्रैक्टर न दिया होता, तो शायद रोशनी और उनके बच्चे को खो देते।" सामाजिक कार्यकर्ता मीना बाई ने मांग की कि स्वास्थ्य विभाग तत्काल एंबुलेंस सेवाओं को बेहतर करे और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई करे।
सरकार की योजनाएं और जमीनी हकीकत
केंद्र और राज्य सरकार ने गर्भवती महिलाओं और नवजातों की सुरक्षा के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। जननी सुरक्षा योजना (JSY) और जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (JSSK) के तहत गर्भवती महिलाओं को मुफ्त परिवहन, डिलीवरी और उपचार की सुविधा दी जानी चाहिए। इसके बावजूद, फतेहगढ़ जैसे छोटे स्वास्थ्य केंद्रों में इन योजनाओं का लाभ शायद ही मिलता हो। ग्रामीण क्षेत्रों में समय पर एंबुलेंस की उपलब्धता न होना और स्वास्थ्य केंद्रों में संसाधनों की कमी इन योजनाओं की विफलता को दर्शाती है।
क्या हैं समाधान?
इस घटना ने एक बार फिर ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की जरूरत को रेखांकित किया है। कुछ सुझाव इस प्रकार हैं:
- 108 जननी एक्सप्रेस की संख्या बढ़ाएं: ग्रामीण क्षेत्रों में एंबुलेंस की उपलब्धता बढ़ाने के लिए और वाहन तैनात किए जाएं।
- कॉल सेंटर की जवाबदेही: 108 सेवा के कॉल सेंटर को 24x7 जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सख्त निर्देश दिए जाएं।
- स्वास्थ्य केंद्रों में संसाधन: फतेहगढ़ जैसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों, नर्सों और आपातकालीन उपकरणों की तैनाती बढ़ाई जाए।
- सीएमएचओ की जवाबदेही तय: स्वास्थ्य अधिकारियों की लापरवाही पर सख्त कार्रवाई हो, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों।
- जागरूकता और निगरानी: ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं के बारे में जागरूक करने और स्थानीय स्तर पर निगरानी समितियों का गठन।
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