हर साल घर छोड़ कर बीहड़ में चले जाते हैं इस गांव के लोग, जानिए इसकी खास वजह

भिंड के चंबल नदी के किनारे बसे दो दर्जन गांव के लोगों को हर साल बाढ़ की वजह स अपने धर छोड़ने पड़ जाते हैं और बीहड़ों में चले जाते हैं

भिंड, 25 अगस्त। भिंड के दो दर्जन गांव के ग्रामीणों को हर साल अपना घर छोड़ना पड़ जाता है। अपनी घर गृहस्ती को सिर पर लादकर इन ग्रामीणों को बीहड़ों में डेरा जमाना पड़ता है। हर साल खुले आसमान के नीचे और जंगली जीव जंतुओं के बीच ग्रामीणों की रहना मजबूरी बन गई है। न चाहते हुए भी घरों को छोड़ना इनके लिए बेहद जरूरी हो जाता है क्योंकि घरों से ज्यादा महत्वपूर्ण इन लोगों की जान है।

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    अटेर इलाके के ग्रामीणों की है यह परेशानी

    अटेर इलाके के ग्रामीणों की है यह परेशानी

    अटेर इलाके से गुजरने वाली चंबल नदी के किनारे बसे मुकुटपुरा समेत तकरीबन दो दर्जन गांव के लोग हर साल अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं। ग्रामीण अपनी घर गृहस्ती का सामान घरों से एक-एक करके निकालना शुरू कर देते हैं और खुले आसमान के नीचे सामान जमाना शुरू कर देते हैं। इस साल भी मुकुटपुरा गांव के ग्रामीणों ने अपने घर खाली करना शुरू कर दिए हैं। लावारिस हालत में अपने-अपने घरों को छोड़कर ग्रामीण बीहड़ की तरफ रुख कर रहे हैं।

    मुकुटपुरा गांव के ग्रामीण अपने घरों से कर रहे हैं पलायन

    मुकुटपुरा गांव के ग्रामीण अपने घरों से कर रहे हैं पलायन

    कोई अपने सिर पर बिस्तर रखे हुए है तो कोई अपने सिर पर बक्सा रखे हुए हैं, कोई कपड़ों की गठरी बनाकर सिर पर रखे हुए हैं। सभी लोग अपने-अपने घरों से अपना सामान बांध कर घरों को छोड़कर जा रहे हैं। महिलाएं हो या पुरुष, सभी लोग अपने घरों को छोड़कर बीहड़ों की तरफ निकल रहे हैं। साथ में अनाज और पशुओं को भी ले जाना इन ग्रामीणों की मजबूरी बन गई है।

    इन ग्रामीणों के घरों में घुस रहा है बाढ़ का पानी

    इन ग्रामीणों के घरों में घुस रहा है बाढ़ का पानी

    अपने घरों को छोड़कर जा रहे इन ग्रामीणों के दिलों में किसी डकैत की दहशत नहीं है बल्कि यह दहशत तो उस पानी की है जो चंबल नदी से उफान मार कर इनके घरों में घुसने के लिए बेताब हो रहा है। चंबल नदी में कोटा बैराज बांध से पानी छोड़े जाने के बाद चंबल नदी का जलस्तर बढ़ गया है। इस वजह से चंबल नदी का पानी उफान मारता हुआ मुकुटपुरा और उसके आसपास के गांव में घुस गया है।

    जान बचाने के लिए ग्रामीण चले जाते हैं गांव छोड़कर

    जान बचाने के लिए ग्रामीण चले जाते हैं गांव छोड़कर

    चंबल नदी का पानी पहले गांव में प्रवेश करता है और फिर ग्रामीणों के घरों में प्रवेश कर जाता है। अपनी जान बचाने के लिए ग्रामीणों को मजबूरी में अपना घर छोड़ना पड़ जाता है। ग्रामीण पानी के आने की सूचना मिलते ही अपने घरों को छोड़ना शुरू कर देते हैं और सुरक्षित स्थान पर पहुंचना शुरू कर देते हैं।

    हर साल की है यह परेशानी

    हर साल की है यह परेशानी

    मुकुटपुरा और उसके आसपास के दो दर्जन गांव के ग्रामीण बताते हैं कि वे हर साल अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं। हर साल चंबल नदी में उफान आ जाता है और बाढ़ का पानी उनके घरों में घुस जाता है। अपने घर को छोड़कर बीहड़ों में डेरा जमाना इन ग्रामीणों की मजबूरी हो गया है। हर साल जमी जमाई गृहस्ती को उठाकर बीहड़ों में पहुंचना है फिर बाढ़ का पानी कम हो जाने पर वापस अपने घरों को लौटना इन ग्रामीणों की अब जैसे तकदीर सा बन गया है।

    सरकार से कर रहे हैं दूसरा गांव बसाने की मांग

    सरकार से कर रहे हैं दूसरा गांव बसाने की मांग

    मुकुटपुरा गांव के ग्रामीण बताते हैं कि वे लगातार अधिकारियों और सरकार से मांग कर रहे हैं कि इस गांव को छोड़कर उन्हें कहीं दूसरे स्थान पर बस दिया जाए जिससे उन्हें हर साल होने वाली इस परेशानी से निजात मिल सके, लेकिन कई बार गुहार लगाने के बावजूद भी इन ग्रामीणों की सुनवाई नहीं हो रही है। अधिकारी और नेता आते तो है लेकिन ग्रामीणों की बात सुनकर बिना कोई जवाब दिए वापस चले जाते हैं।

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