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Explainer: समुद्र में कितनी तेजी से बढ़ रहा इंडियन नेवी का दबदबा? किन-किन देशों में बनाए बेस

Explainer: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मार्च 2025 में दो दिवसीय दौरे पर मॉरीशस गए थे और राष्ट्रीय दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। पिछले कुछ सालों में मॉरीशस हिंद महासागर इलाके में भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी बन गया है। इस यात्रा को इस क्षेत्र में भारत के सहयोग को मजबूत करने के अवसर के रूप में देखा गया। इससे मॉरीशस को भी रक्षा के क्षेत्र में फायदा होगा।

सिर्फ भारत ही नहीं सहयोगी भी होंगे मजबूत

2015 में, प्रधानमंत्री मोदी ने समुद्र क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास पर जोर दिया था। इस नजरिए ने तब से हिंद महासागर के प्रति भारत की रणनीति को एक नए सिरे से आगे पहुंचाया। अपने हालिया दौरे के दौरान, मोदी ने समुद्री क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिए पारस्परिक और दोतरफा मजबूती पर चर्चा की। जिसमें सहयोगी देशों को भी उतना ही फायदा पहुंचे जितना की भारत को। ये कदम इन्फोर्मेशन साझा करने और दुश्मन देशों के बढ़ते दखल को करने में आने वाले वक्त में बड़ी भूमिका निभाएगा।

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किन-किन देशों में हैं इंडियन नेवी के बेस

1. ओमान (दुकम बंदरगाह)
• भारत के पास नौसेना संचालन और रसद के लिए दुकम बंदरगाह तक पहुंच है।
• पश्चिमी हिंद महासागर में भारतीय नौसेना की तैनाती के लिए उपयोगी है।

2. फ्रांस (रीयूनियन द्वीप और टूलॉन जैसे मुख्य भूमि के अड्डे)
• 2018 में रसद विनिमय समझौते पर हस्ताक्षर किए गए।
• हिंद महासागर (जैसे, रीयूनियन द्वीप) और भूमध्य सागर (टूलॉन) में फ्रांसीसी ठिकानों तक पहुंच की सुविधा प्रदान करता है।

3. संयुक्त राज्य अमेरिका (डिएगो गार्सिया, गुआम और अन्य)
• LEMOA (रसद ​​विनिमय समझौता ज्ञापन) के तहत, भारत रसद और ईंधन भरने के लिए अमेरिकी ठिकानों का उपयोग कर सकता है।

4. सिंगापुर (चांगी नौसेना बेस)
• भारत ने जहाज यात्राओं और रसद के लिए पहुँच की अनुमति देने वाले एक द्विपक्षीय नौसैनिक सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए।

5. जापान
• भारत और जापान के बीच आपूर्ति और सेवाओं के पारस्परिक प्रावधान के लिए एक समझौता है।

6. ऑस्ट्रेलिया
• 2020 में आपसी रसद सहायता समझौते पर हस्ताक्षर किए गए।
• ऑस्ट्रेलियाई नौसेना सुविधाओं के उपयोग की अनुमति देता है।

7. सेशेल्स और मॉरीशस
• भारत ने तटीय रडार और अन्य समुद्री बुनियादी ढांचे को विकसित करने में मदद की है।
• निगरानी और ईंधन भरने की सुविधाओं तक पहुँच।

8. श्रीलंका और मालदीव
• संयुक्त अभ्यास के दौरान प्रशिक्षण और बंदरगाहों के उपयोग सहित घनिष्ठ समुद्री सहयोग।

9. ईरान (चाबहार बंदरगाह)
• हालाँकि यह वाणिज्यिक रूप से केंद्रित है, लेकिन यह भारत को अफ़गानिस्तान और मध्य एशिया तक रणनीतिक पहुँच प्रदान करता है।

सिर्फ भारत ही नहीं सहयोगी भी होंगे मजबूत

2015 में, प्रधानमंत्री मोदी ने समुद्र क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास पर जोर दिया था। इस नजरिए ने तब से हिंद महासागर के प्रति भारत की रणनीति को एक नए सिरे से आगे पहुंचाया। अपने हालिया दौरे के दौरान, मोदी ने समुद्री क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिए पारस्परिक और दोतरफा मजबूती पर चर्चा की। जिसमें सहयोगी देशों को भी उतना ही फायदा पहुंचे जितना की भारत को। ये कदम इन्फोर्मेशन साझा करने और दुश्मन देशों के बढ़ते दखल को करने में आने वाले वक्त में बड़ी भूमिका निभाएगा।


भारत का रणनीतिक दृष्टिकोण

'महासागर' पहल भारत के पिछले 'सागर' विजन का ही एक विकास का हिस्सा कही जा सकती है। यह क्षेत्रीय हितों के लिए हिंद महासागर में आपसी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए भारत के चल रही कोशिशों को दिखाता है। मोदी ने इस कदम से व्यापार सहयोग बढ़ाने, सतत विकास के लिए क्षमता और साझा भविष्य के लिए आपसी सुरक्षा पर जोर दिया। समुद्री सुरक्षा के प्रति भारत का दृष्टिकोण पारंपरिक सुरक्षा आयामों से आगे तक फैला हुआ है। इसमें उन राज्यों की भी अहम भूमिका होगी जो तटीय हैं, जैसे- केरल, तमिलनाडु, ओडिशा, गुजरात, महाराष्ट्र आदि। यह रणनीति इन राज्यों के सामने आने वाली जटिल चुनौतियों को न सिर्फ दर्शाती है बल्कि उनके समाधान के बारे में भी सोचने पर मजबूर करती है। इसके अलावा इलाके में शांति और स्थिरता के लिए भारत की एक और पहल को सामने लाती है।

सुरक्षा से ज्यादा सहयोग पर भारत का जोर

सुरक्षा अभी भी महत्वपूर्ण है, लेकिन क्षेत्रीय सहयोग की सोच भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। समुद्री सुरक्षा का ध्यान अब मानवीय सहायता और आपदा राहत जैसे गैर-पारंपरिक मुद्दों पर केंद्रित हो गया है, खासकर जलवायु परिवर्तन से प्रेरित प्राकृतिक आपदाओं के बीच। इस नए एजेंडे में भारत की भूमिका भारत को दुनिया के नक्शे पर नए सिरे से गढ़ेगी है। भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र में खुद को 'फर्स्ट इनीशिएटर' (सबसे पहले प्रतिक्रिया देने वाला) के रूप में स्थापित किया है, जो बिना शर्त कई देशों को 'समुद्र क्षेत्र में' पाइरेट्स और दूसरी चुनौतियों से बचाने के लिए ऑपरेशन चलाता रहा है। जिसमें वो देश भी शामिल हैं जो विकसित देशों की श्रेणी में आते हैं। यह बदलाव भारत के क्षेत्रीय उत्तरदायित्वों पर उसके विकसित होते दृष्टिकोण को रेखांकित करता है।

चीन के साथ कॉम्प्टीशन

हिंद महासागर में प्रभाव को लेकर भारत और चीन के बीच हल्के टकराव और वर्चस्व की होड़ चल रही है। जबकि चीन की उपस्थिति राजनीतिक रूप से बढ़ रही है, यह लेन-देन वाली बनी हुई है। भारत खुद को एक हितैषी के रूप में पेश करता है, जो साझा चुनौतियों और भविष्य पर ध्यान केंद्रित करता है और समय-समय पर सभी को मदद भी पहुंचाता है। सीधे शब्दों में कहें तो चीन पूरी तरह से दबदबे की कोशिश में आगे बढ़ रहा है। यह प्रतिस्पर्धा दोनों देशों द्वारा अपनाई गई रणनीतियों और सहभागिता के तरीकों को प्रभावित करती है। भारत की भौगोलिक रूप से केंद्रित भूमिका चीन की व्यापक राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के विपरीत है। आने वाले समय में भारत को चीन के दबदबे को कंट्रोल करने वाले देश के रूप में देखा जा सकता है।

दक्षिण की चिंताओं का हल है 'भारत'

समुद्री व्यापार जैसे सहयोग के क्षेत्रों के लिए भारत का नया नजरिया संभावनाओं को खोलता है। यह भारत के सहयोग के भौगोलिक दायरे का न सिर्फ बढ़ाता है बल्कि उसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का मौका भी देता है। इसके अलावा समुद्री जरूरतों को व्यापक वैश्विक दक्षिण चिंताओं से जोड़ता है। 'महासागर' पहल हिंद महासागर क्षेत्र (आईओआर) में भारत की रणनीतिक भागीदारी को जारी रखती है। जबकि सागर समुद्री सुरक्षा सहयोग के लिए एक रूपरेखा प्रदान करता है, महासागर साझा हितों द्वारा संचालित एक विस्तारित रणनीति प्रदान करता है।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कॉमेंट में जरूर बताएं।

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