नरेंद्र मोदी ने मारी चायवालों के पेट पर लात!

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बेंगलोर। अपने आपको को चाय वालों का मसीहा कहने वाले नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद सबसे पहले चाय वालों के पेट पर ही लात मारी है। देश में लाखों लोग चाय के रूप में पेय पदार्थ बेचकर अपनी रोजी-रोटी जुटाते हैं। उनके लिए चीनी महंगी होने के बाद अब चीनी तो खरीदना महंगा पड़ेगा ही, इसके साथ ही मजबूरन एक चाय की प्याली का दाम बढ़ाने पर उनके ग्राहकों के कम होने की आशंका है।

दरअसल, अर्थशास्त्र के नियमों के मुताबिक यह मानवीय स्वभाव हमेशा रहा है कि यदि कोई चीज महंगी हो जाती है या उसको खरीदने में थोड़ी बहुत भी परेशानी महसूस की जा रही है तो मानवीय व्यवहार के अनुसार ही व्यक्ति अपनी रुचि को देखते हुए उसकी स्थानापन्न वस्तु या सेवा का सेवन करने लगता है। यानि उसकी जैसी ही स्वाद या संतुष्टी देने वाली वस्तु का उपयोग किया जाने लगता है। उत्तर-प्रदेश, बिहार, दिल्ली, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य-प्रदेश, उड़िसा, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कई लोग चाय की रेढ़ी या ठेला लगाते हैं। यही नहीं कई चाय विक्रेताओं के लिए तो यही एक इकलोता आय का ज़रिया है। जिस पर अब महंगाई डायन ने अपने नुकिले दांत मार दिए हैं।

इसलिए आया चायवालों की रोजी-रोटी पर संकट

यह संकट तब से खड़ा हुआ है जब से नरेंद्र मोदी सरकार ने चीनी पर आयात ड्यूटी को पंद्रह फीसदी से बढ़ाकर चालीस फीसदी करने का निर्णय लिया। बाजार से खबर है कि ड्यूटी बढ़ाने के बाद से कई बड़े शहरों के थोक बाजार में चीनी के दामों में 40-50 रुपए प्रति क्विटल का इजाफा हुआ है। जिसके बाद कई खुदरा बाजार में चीनी के दाम 10 फीसदी बढ़ गए हैं।

चायवालों का समर्थन था मोदी को

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री बनने से पहले लोकसभा चुनाव में अपने अभियान के दौरान नरेंद्र मोदी ने चाय (पेय पदार्थ) ) विक्रेताओं पर विशेष रूप से फोकस किया था। एक रैली में विशेष रूप से छोटे चाय वालों को ही आमंत्रित किया गया था और उनसे तरह-तरह के वायदे भी किए थे।

उत्पादन कम रह सकता है

देश में करीब 695 मिलें हैं और दुनिया में दूसरे नम्बर पर चीनी उत्पादन भारत में ही होता है। वर्ष 2013-14 में भारत में चीनी का कुल उत्पादन 245 लाख टन दर्ज किया गया है। जो पिछले दो वर्षों में काफी कम है। 2011-12 में 263 लाख टन और 2012-13- 251 लाख टन उत्पादन रहा। जबकि वर्ष 2013-14 में भारत में चीनी का कुल उत्पादन 245 लाख टन उम्मीद से काफी कम दर्ज किया गया।

दूसरी ओर, इस बार चीनी मिल मालिकों की ओर से किसानों के साथ को-ऑपरेशन नहीं करने की वजह से गन्ने की पेराई में देरी हुई है। जिससे साफ आशंका उभर रही है कि आगे भविष्य में चीनी का उत्पादन और कम रह सकता है। जिससे भारतीय बाजार में चीनी के दाम और भी बढ़ेंगे। जो आम आदमी का स्वाद तो फीका करेंगा ही साथ ही चाय विक्रेताओं के रोजगार पर कुल्हाड़ी भी मारेंगा।

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