वेस्टर्न-इंडियन म्यूजिक ने मिलकर दी कैंसर को मात
बेंगलुरु। कहते हैं भारत के उत्तर से दक्षिण तक जाते-जाते तमाम विविधताएं दिखती हैं। ये विविधता संगीत में भी है। लेकिन अगर कश्मीर का संगीत वाद्ययंत्र हो और कर्नाटक का राग तो कैसा लगेगा। जी हां हर कोई इस संगीत में खो जाना चाहेगा।

ऐसा ही संगीत संध्या का आयोजन बेंगलुरु के चौडैया मेमोरी हॉल में शुक्रवार की रात को किया गया, जिसमें कश्मीरी संतूर पर कर्नाटक का मशहूर चारुकेशी राग सुनने को मिला। प्रख्यात संतूर वादक राहुल शर्मा का यह संगीत कैंसर से मरने वालों को एक श्रद्धांजलि और कैंसर के मरीजों के लिये एक उम्मीद जगाने के लिये था।

भारतीय कैंसर सोसाइटी द्वारा आयोजित इस संगीत सध्या गूगल यू्ट्यूब के पूर्व प्रमुख वेंकट पंचापकेशन के नाम थी। संगीत संध्या की शुरुआत में वेंकट को याद किया गया, कि किस तरह वो जिंदगी के हर एक पल को जीते थे और दूसरों में ऊर्जा का संचार करते थे।
इस संगीत संध्या में राहुल शर्मा के साथ ड्रम्रर व पर्क्यूशन एक्सपर्ट शिवामणि ने चमत्कारिक ढंग से पाश्चात्य संगीत को भारतीय शस्त्रीय संगीत में घोल कर रख दिया। मंदिरों में घंटे बहुत सुने होंगे, कथक संध्या में पैरों में बंधे घुघरु बहुत देखे होंगे, लेकिन ड्रम के साथ घुगरु, शंख, घंटा और तो और मिनरल वॉटर की बोतल से बेहद सुरीला संगीत निकालने का काम शिवामणि ने किया।

इस मौके पर तबले पर थाप दी सत्यजीत तलवालकर ने, मोर्सिंग तरंग पर भरद्वाज आर सतावल्ली ने। गिरिधर उडुपा ने घटम पर तो यू राजेश ने मंडोलिन की धुनों से पूरे सभागार को संगीत में सराबोर कर दिया। और तो और स्टीफेन डेवासी ने पियानो को ऐसे अंदाज में पेश किया, मानो पियानो नहीं कोई ड्रम बजा रहा हो।

इस मौके पर वेंकट के परिवार के अलावा इंडियन कैंसर सोसाइटी से जुड़े भारत विजय, अशोक सूटा, भरत देवानाथन, सचिन बंसल समेत तमाम लोग उपस्थित थे।

इस मौके पर कैंसर से बाहर निकल कर आयी भाशिणी पर एक डॉक्यूमेंट्री दिखाई गई, जिसमें यह संदेश दिया गया कि अगर लगन और हिम्मत है, तो कैंसर से लड़ना भी संभव है।












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