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जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए सूरज मद्धिम करने की कोशिश

हीट वेव का होना बढ़ता जा रहा है

नई दिल्ली, 19 जुलाई। धरती गर्म हो रही है, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव बढ़ रहा है और जीवाश्म ईंधनों के प्रयोग में कटौती करना अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. ऐसे में कुछ वैज्ञानिक एक ऐसी तकनीक विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं जो सूरज की गर्मी में कुछ कमी कर दे.

वैज्ञानिक एक ऐसी तकनीक विकसित करने पर काम कर रहे हैं जो सूरज की गर्म किरणों को धरती पर पहुंचने से पहले ही परावर्तित कर दे ताकि धरती पर उतनी गर्मी ना हो, जितनी कि खतरनाक है. ऐसा विमानों के जरिए कुछ विशेष रसायनों के छिड़काव से किया जाने की संभावना है. स्ट्रैटोस्फीरिक एरोसोल इंजेक्शन (SAI) तकनीक के समर्थक कहते हैं कि ऐसा करना सस्ता और साधारण होगा व हर साल कुछ अरब डॉलर के खर्च में किया जा सकेगा.

इन समर्थकों का तर्क है कि अगर यह तकनीक कामयाब होती है तो धरती का तापमान औसत 1.5 डिग्री सेल्सियस के खतरनाक स्तर को पार करने से रोका जा सकता है. सैन्य-रणनीतिक विषयों पर शोध करने वाले थिंक टैंक आरएएनडी (RAND) में जलवायु जियोइंजीनियरिंग के खतरों पर शोध करने वालीं एमी योनेकूरा कहती हैं, "मुझे लगता है कि यह एक संभावित विकल्प हो सकता है."

क्या है तकनीक?

यह तकनीक ज्वालामुखियों के विस्फोट के वक्त आसमान के ढक जाने का ही अनुरूप है. इसलिए इस तकनीक के आलोचक वैज्ञानिकों की चिंता यह है कि प्रयोग के खतरे गंभीर और अनजाने हो सकते हैं. इसलिए वे इस तकनीक के शोध और परीक्षण पर फौरन प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं.

वैज्ञानिक इस तकनीक के जो खतरे बताते हैं उनमें बारिश के चलन में बदलाव जैसी बातें हैं जिसके कारण भूखमरी बदतर हो सकती है. इसके अलावा तापमान में अनियंत्रित वृद्धि को भी एक बड़ा खतरा बताया जा रहा है. साथ ही, यह आशंका भी जताई गई है कि इस तरह की तकनीक इस्तेमाल करने से प्रदूषकों को खुली छूट मिल जाएगी.

पर क्या इस तकनीक के इस्तेमाल के बारे में नियम-कानून बनाकर इन खतरों को टाला नहीं जा सकता? इस सवाल के जवाब में आलोचकों का कहना है कि ताकतवर देश या व्यक्ति भी ऐसे नियमों पर हावी हो सकते हैं जिससे खतरा बढ़ जाएगा. ड्यूक सेंटर ऑन रिस्क के सह-निदेशक जोनाथन वीनर कहते हैं, "तूफान, जंगली आग या ग्रीष्म लहर जैसी आपदाएं जितनी ज्यादा बढ़ेंगी, वे लोग अपने आपको बचाने के लिए उतनी ज्यादा कोशिश करेंगे." वीनर कहते हैं कि इस तरह की तकनीक का एकतरफा प्रयोग "भू-राजनीतिक नजरिए से मुश्किलें पैदा कर सकता है."

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कुछ तो करना होगा!

वैज्ञानिक इस बात को लेकर एकमत हैं कि जैसे-जैसे पृथ्वी का तापमान पेरिस समझौते में तय की गई औसत सीमा 1.5 डिग्री सेल्यिसय से ज्यादा बढ़ने की ओर गतिशील है, इस बारे में गंभीरता से सोचने की जरूरत है कि अगर यह सीमा पार हो गई तो क्या होगा. कारनेजी क्लाइमेट गवर्नेंस इनिशिएटिव के कार्यकारी निदेशक जानोस पास्तोर कहते हैं, "अब हम उस स्थिति में प्रवेश कर रहे हैं जहां 1.5 डिग्री की सीमा पार करने जाने की संभावना ऐसा ना होने से कहीं ज्यादा ज्यादा है."

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पास्तोर की संस्था उन तकनीकों पर काम करती है जो जलवायु परिवर्तन में मददगार हो सकती हैं. वह कहते हैं कि अभी भी दुनिया ऐसी स्थिति से काफी दूर है जहां बहुत आक्रामक कदम उठाने की जरूरत हो लेकिन जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन के असर गंभीर होंगे, वैसे-वैसे परिणाम भी विनाशक होते जाएंगे. और उस स्थिति में आक्रामक कदमों की जरूरत बढ़ती जाएगी.

पास्तोर ने कहा कि ऐसे उपायों के खतरों का आकलन भी जरूरी है. उन्होंने कहा, "कुछ ना करना या जरूरत से कम करना भी तो अपने आप में बहुत बड़ा खतरा है."

वीके/सीके (रॉयटर्स)

Source: DW

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