अल्जाइमर की दवा को मामूली लेकिन ऐतिहासिक सफलता

अल्जाइमर्स का रोग दुनियाभर में लगातार बढ़ रहा है

वैज्ञानिक अल्जाइमर की ऐसी दवा बनाने में कामयाबहुए हैं जो मस्तिष्क को होने वाले नुकसान को धीमा कर देती है. लेसानेमाब नाम की इस दवा की 18 महीने तक चली ट्रायल के नतीजे सितंबर में जारी किए गए थे. नतीजों में पाया गया कि मस्तिष्क को होने वाला नुकसान 27 प्रतिशत तक धीमा हो गया.

ट्रायल का पूरा डेटा बुधवार को न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित किया गया. हालांकि नतीजों के साथ यह चेतावनी भी दी गई है कि गंभीर दुष्परिणाम देखे गए हैं जिनमें मस्तिष्क में ब्लीडिंग से लेकर सूजन तक शामिल हैं.

ट्रायल के नतीजे दिखाते हैं कि जिन मरीजों को यह दवा दी गई, उनमें से 17.3 फीसदी मरीजों के मस्तिष्क में रक्तस्राव हुआ. जबकि, जिन लोगों को प्लेसिबो दवा दी गई, उनमें से 9 प्रतिशत मरीजों के मस्तिष्क में रक्तस्राव हुआ. दवा लेने वाले 12.6 प्रतिशत मरीजों के दिमाग में सूजन पाई गई जबकि प्लेसिबो ग्रुप में सिर्फ 1.7 फीसदी मरीजों में ऐसा हुआ.

कैसे हुआ परीक्षण?

इस दवा का दो स्वरूपों में परीक्षण हुआ है जिन्हें बायोजेन और आइसाय नाम की कंपनियों ने बनाया है. दोनों ही मामलों में ट्रायल में शामिल मरीजों में से कुछ की मौतें भी देखी गईं. फिर भी, शोधकर्ताओं और मरीजों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने इस दवा को मिली कामयाबी का स्वागत किया है.

ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं ने पार्किंसंस से निपटने के लिए हाइड्रोजेल विकसित किया

स्वागत करने वालों में बार्ड डे स्ट्रूपर भी हैं जो यूके डिमेंशिया रिसर्च इंस्टिट्यूट के डाइरेक्टर हैं. उन्होंने कहा, "यह पहली ऐसी दवा है जो अल्जाइमर के मरीजों को एक वास्तविक इलाज उपलब्ध कराती है. वैसे क्लीनिकल फायदे जो हुए हैं वे सीमित हैं लेकिन उसके बावजूद यह उम्मीद की जा सकती है कि जब लंबे समय तक दवा दी जाएगी तो वे फायदे ज्यादा नजर आएंगे."

अल्जाइमर रोग में दो प्रोटीन मस्तिष्क में बनते हैं जिन्हें ताव और एम्लॉयड बीटा कहा जाता है. इनके कारण मस्तिष्क की कोशिकाएं मर जाती हैं और मस्तिष्क सिकुड़ने लगता है.

लेसानेमाब दवा एम्लॉयड को ही निशाना बनाती है. डे स्ट्रूपर कहते हैं कि दवा इस प्रोटीन की सफाई में कामयाब रही है और साथ ही "ताव समेत अल्जाइमर की अन्य वजहों पर फायदेमंद प्रभाव डालती है."

ट्रायल के तीसरे चरण में 1,800 लोगों को शामिल किया गया था. इन्हें दो समूहों में बांटा गया. एक समूह को लेसानेमाब दवा दी गई जबकि दूसरे समूह को प्लेसिबो दवा दी गई. परीक्षण 18 महीने तक चले. उसके बाद यह देखा गया कि उनके मस्तिष्क के कामकाज पर कितना असर पड़ा और एम्लॉयड का स्तर कितना बदला.

दवा कितनी कारगर?

इस ट्रायल का नेतृत्व कर रहे यूके डिमेंशिया रिसर्च इंस्टिट्यूट में योजना प्रमुख तारा स्पायर्स-जोन्स कहती हैं कि दवा के और प्रभावों को अच्छी तरह समझने के लिए लंबे परीक्षणों की जरूरत होगी. वह कहती हैं, "यह स्पष्ट नहीं है कि (प्रोटीन के स्तर में) मामूली बदलाव से डिमेंशिया के मरीजों कितना फायदा होगा. यह सुनिश्चित करने के लिए लंबी ट्रायल की जरूरत होगी कि दवा के फायदे इसके खतरों से ज्यादा हैं."

बंदरों को आईना देखने की ट्रेनिंग

दवा की एक समस्या यह भी है कि यह डिमेंशिया के शुरुआती दौर के मरीजों के लिए है. उनके मस्तिष्क में एम्लॉयड का स्तर एक सीमा तक ही होता है. यानी, कम ही मरीज इसका लाभ उठा पाएंगे क्योंकि अक्सर अल्जाइमर होने का पता जल्दी नहीं चलता. कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि इस रोग के जल्द से जल्द पता चलने के लिए जांच की प्रक्रिया में आमूल-चूल बदलाव की जरूरत है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को दवा का फायदा पहुंचाया जा सके.

अल्जाइमर्स सोसाइटी में शोध सह निदेशक रिचर्ड ओकली कहते हैं, "लेसानेमाब की यात्रा यहां खत्म नहीं होती. अगले परीक्षणों में यह पता लगाया जाएगा कि कैसे लंबे समय तक इसका फायदा उठाया जा सकता है."

वीके/एनआर (एपी, एएफपी)

Source: DW

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+