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जानिए कौन थे विधायक जवाहर पंडित, जौनपुर के छोटे से गांव से निकलकर प्रयागराज में खड़ा किया था सियासी किला

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प्रयागराज। जवाहर यादव ऊर्फ पंडित हत्याकांड का 23 साल बाद चार नवंबर को फैसला आ गया है। इस हत्याकांड में करवरिया बंधुओं को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। सजा सुनाए जाने के बाद जवाहर यादव की पत्नी विजमा यादव तथा परिवार के अन्य सदस्यों के चेहरे पर संतोष के भाव दिखे। क्या आप जानते है जवाहर यादव ऊर्फ पंडित कौन थे और ये मामला इतना हाईप्रोफाइल क्यों हुआ। कैसे एक छोटे से गांव खैरतारा से निकालकर पंडित ने झूंसी में सियासी किला बनाया।

कौन थे जवाहर पंडित

कौन थे जवाहर पंडित

जवाहर यादव उर्फ पंडित मूल रुप से जौनपुर के एक छोटे से गांव खैरतारा के रहने वाले थे। पूजा पाठ व धार्मिक क्रिया कलापों में अत्याधिक आस्थावान होने के कारण उनके करीबी उन्हें पंडित कहरकर बुलाते थे और फिर यही पंडित शब्द उनक टाइटल से जुड़ गया। वह जवाहर यादव से ज्यादा जवाहर पंडित के नाम से जाने जाने लगे। जौनपुर में अपने गांव से लेकर इलाके में जवाहर का नाम उन दबंग लोगों में गिना जाता था, जिनकी इलाके में खूब चला करती थी। कद काठी से हष्टपुष्ट जवाहर की टोली भी उसी हिसाब की थी। जवाहर ने बचपन से ही बड़ा आदमी बनने की ख्वाहिशे पाल रखी थी, लेकिन छोटा शहर जवाहर के सपनों को उड़ान नहीं दे पा रहा था।

1981 में झूंसी आ गए थे पंडित

1981 में झूंसी आ गए थे पंडित

इसी बीच जवाहर को इलाहाबाद में शराब व बालू के धंधे के साथ ठेकेदारी के लिए कुछ लोगों ने आफर किया और बताया कि वहां बेहद तेजी से पैर फैलाया जा सकता है। 1981 में जवाहर ने घर छोड़ने का फैसला लिया और वह झूंसी आ गए। शुरुआती दिनों में जवाहर ने अपने आस पास पड़ोस से लेकर इलाके को पहले समझना शुरू किया और मेल जोल के साथ बिरादरी में पकड़ बनानी शुरू की। इलाहाबाद के तत्कालीन दारू के ठेकेदारों से परिचय व दोस्ती होने के बाद जवाहर ने भी इसी धंधे में सबसे पहले हाथ डाला। अपनी दबंग छवि व पकड़ के चलते जवाहर के शराब का धंध चल निकला, पुलिस से लेकर नेताओं और अड़ंगा लगाने वालों से जवाहर ने घुलमिलकर अपना साम्राज्य स्थापित करना शुरू किया तो देखते ही देखते शराब के धंधे में जवाहर का नाम चलने लगा। लेकिन, जवाहर के सपनों की उडान ने उसे अगला कदम बालू के धंधे की ओर बढ़ाने को कहा।

बालू से बढ़ी दुश्मनी

बालू से बढ़ी दुश्मनी

जवाहर ने जिस बालू के धंधे में अपना पैर डाला था, उस धंधे पर करवरिया बंधुओं और उनके लोगों का साम्राज्य था। लेकिन, जवाहर ने बालू के धंधे में अपनी धमक बनानी शुरू की और यही से करवरिया परिवार के साथ उनकी अनबन शुरू हो गयी। यह अनबन बढती रही, लेकिन जवाहर ने कदम पीछे नहीं खीचे और अब वह राजनीति में भी आने की कोशिश करने लगा।

मुलायम सिंह का सिर पर हाथ

मुलायम सिंह का सिर पर हाथ

जवाहर के लिए वर्ष 1989 बेहद ही अहम रहा। यह वर्ष जवाहर यादव के लिये यह संजीवनी समझी जा सकती थी या संरक्षण । 1989 के आम चुनावों से पहले जवाहर पंडित ने किसी के माध्यम से मुलायम सिंह यादव से मुलाकात कर ली और फिर मुलायम का सिर पर हाथ पाकर जवाहर बेफिक्र होकर अपना साम्राज्य स्थापित करने लगा। मुलायम से मिलने के बाद जवाहर ने उस चुनाव में हर तरह से खुद को समर्पित किया और फंड देने से लेकर प्रचार प्रसार व नेताओं के आने जाने पर इंतजाम आदि की सारी जिम्मेदारियां निभाई। मुलायम सिंह, जवाहर के समर्पण से बेहद ही प्रभावित हुई और अगले कुछ सालों में वह मुलायम सिंह के इलाहाबाद में सबसे खास लोगों में शुमार हो गये, जो कभी भी मुलायम से मिल सकते थे।

1991 में झूंसी से लड़ा था चुनाव

1991 में झूंसी से लड़ा था चुनाव

जवाहर पंडित ने 1989 के आम चुनावों से पहले मुलायम सिंह यादव से मुलाकात की। उस मुलाकात के बाद फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। धीरे धीरे वह इलाहाबाद में मुलायम के करीबी लोगों में शुमार होते गए। मुलायम के मुख्यमंत्री बनने के बाद जवाहर पंडित ने राजनीति करने की ठान ली। धीरे धीरे उन्होंने झूंसी में अपनी सियासी जमीन तैयार की और पहली बार मुलायम की पार्टी से 1991 में चुनाव लड़े लेकिन महज 642 वोटों से चुनाव हार गए लेकिन खुद का सियासी रसूख स्थापित कर लिया था। उनका रसूख बढ़ते ही बालू के ठेकों में उनका दखल और बढ़ गया और दुश्मनी गाढ़ी होने लगी।

1993 में बने विधायक

1993 में बने विधायक

1993 में फिर से जब चुनाव हुआ तो जवाहर झूंसी से विधायक बन गये। सपा-बसपा गठबंधन हुआ, सरकार बनी तो जवाहर का कद आसमान छूने लगा। जवाहर का सियासी रसूख इलाहाबाद की राजनीति में आसमान छूने लगा। कुछ समय बाद एक बडी घटना 1996 में हुई। उस समय विधानसभा भंग हो चुकी थी और सिविल लाइंस में जवाहर यादव पर हमला हुआ और एके 47 से ताबडतोड़ गोलियां जवाहर यादव पर बरसाई गयी। 13 अगस्त की इस घटना में तीन लोगों की मौत हो गई, जबकि दो राहगीर घायल हो गये। हत्या की खबर सुनते ही मुलायम सिंह खुद जवाहर के घर पहुंचे और परिवार के लोगों से मुलाकात कर पूरे घटना क्रम को समझा और हर संभव मदद का आश्वासन देकर वापस लौटे। इसी मामले में करवरिया बंधुओं पर मुकदमा दर्ज हुआ और बालू के ठेके आदि की रंजिश में हत्या का आरोप लगा। जिसमे अब करवरिया बंधुओं पर आरोप साबित हुआ और उन्हें उम्र कैद की सजा सुनाई गयी है।

English summary
Know who Jawahar Pandit, come out of the small village of Jaunpur and stood in a political fort in jhansi
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