कौन हैं भाजपा में बागी हुए सांसद श्यामा चरण जो हर चुनाव में हासिल करते हैं टिकट

Prayagraj news, प्रयागराज। भारतीय राजनीति में दल बदल का किस्सा बहुत पुराना है, लेकिन अब नये जमाने ने इस रूप को थोड़ा बदल दिया है। अब पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में, फिर तीसरी में जाना और फिर वापस आना-जाना यह नये समय का ट्रेंड है। इसी कड़ी में एक बड़ा नाम उद्योगपति श्यामाचरण गुप्ता का भी है। पिछले लोकसभा चुनाव में इलाहाबाद संसदीय क्षेत्र से भाजपा के टिकट पर चुनाव जीतकर सांसद बने श्यामा चरण को इस बार समाजवादी पार्टी ने टिकट देकर अपना प्रत्याशी बनाया है।

7 बार चुनाव लड़ा, दो बार जीते

7 बार चुनाव लड़ा, दो बार जीते

श्यामा चरण का अगर पिछला रिकॉर्ड देखें तो लगभग वह 30 साल से इसी दल बदल राजनीति के चलते किसी न किसी दल से टिकट हासिल करते रहते हैं और चुनाव लड़ते हैं। पिछले पांच लोकसभा चुनाव में वह जीत कर दूसरी बार सांसद बने थे, जबकि वह कुल 7 बार चुनाव लड़ चुके हैं, जिसमें दो बार उनके खाते में जीत आयी है। जबकि चार बार वह दूसरे स्थान पर रहे हैं। इसमें भी वह दो बार भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े और 4 बार सपा के टिकट पर उन्होंने चुनावी मैदान में ताल ठोकी थी। दोनों ही दलों से वह एक-एक बार सांसद रह चुके हैं।

बड़े उद्योगपति हैं श्यामा चरण

बड़े उद्योगपति हैं श्यामा चरण

सांसद श्यामाचरण ने राजनीति के बहुत से रूप देखें हैं और उन्हें जोड़तोड़ की राजनीति का बहुत अच्छा अनुभव है। यही कारण है कि जब भी लोकसभा का चुनाव आता है, वह टिकट की दावेदारी के लिये सामने आते हैं। अगर वर्तमान पार्टी से उन्हें टिकट नहीं मिलता तो दल बदलते उन्हें देर नहीं लगती। वैसे श्यामा चरण की असली पहचान उन्हें उनके बीडी ब्रांड ने दी थी। श्यामा बीडी के नाम से उनके इस ब्रांड ने पूरे यूपी बिहार ही नहीं, छत्तीसगढ़, झारखंड समेत कई राज्यों में खूब व्यापार किया। यही कारण था कि उन्हें बीड़ी किंग के नाम से भी जाना जाता है। जबकि उनके पास श्याम ग्रुप ऑफ कंपनीज का डेयरी, एफएमसीसी, होटल, तंबाकू, एग्रो प्रोडक्ट, हाउसिंग, लॉजेस्टिक एंड डिस्ट्रीब्यूशन आदि का कारोबार पूरे उत्तर भारत में फैला हुआ है। अपनी उद्योगपति छवि के कारण ही वह फंडिग की चाह रखने वाले दलों के दिल में आसानी से जगह बना लेते हैं और उनका दूसरे दल से लौटना घर वापसी कहा जाता है। इसका सीधा उदाहरण मौजूदा समय में देखा जा सकता है, भाजपा से टिकट कटते ही श्यामा चरण वापस समाजवादी पार्टी के पास पहुंचे और उन्हें बांदा से टिकट दिया गया है।

सपा नें पांचवी बार दिया टिकट

सपा नें पांचवी बार दिया टिकट

श्यामा चरण को 2019 का लोकसभा चुनाव का टिकट मिलते ही उनके खाते में यह भी उपलब्धि दर्ज हो गयी कि समाजवादी पार्टी ने उन्हें पांचवी बार चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिया है। इससे पहले वह 1998 में पहली बार इलाहाबाद संसदीय सीट से सपा के प्रत्याशी रहे। उसके बाद उन्हें लगातार 1999, 2004 व 2009 में सपा ने टिकट दिया। हालांकि, 1999 व 2004 में वह बांदा सीट से प्रत्याशी रहे। जबकि 2009 में उन्हें फूलपुर से सपा ने टिकट दिया था। फिलहाल, श्याम चरण के खाते में सपा से पांचवी बार टिकट आया है और वह इस बार जीतकर अपनी एक और पारी खेलना चाहेंगे।

जानें क्या है राजनैतिक करियर

जानें क्या है राजनैतिक करियर

श्यामा चरण ने अपने राजनैतिक करियर की शुरुआत 1984 में बतौर निर्दल प्रत्याशी के तौर पर की और अपनी उद्वोगपति छवि को एक तरह से भुनाते हुये 13.02 फीसदी वोट के साथ चौथे स्थान पर रहे। हालांकि इस चुनाव से उन्हें कुछ खास उपलब्धि तो नहीं मिली लेकिन यह साफ हो गया कि आने वाले समय में श्यामचरण राजनीति में अपने कदम और बढायेंगे। श्यामा चरण ने इस चुनाव के बाद किसी पद से शुरूआत करने की रणनीति बनायी और वह इलाहाबाद आकर राजनीति में अपने हाथपांव मारने लगा। इसी बीच नगर निगम चुनाव में उनकी किस्मत का ताला पहली बार खुला और वह सभासदों की जोड़तोड़ राजनीति को सेट कर महापौर चुने गये। इसके साथ ही उनके राजनैतिक कैरियर का आगाज हुआ। परन्तु अविश्वास प्रस्ताव के कारण वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाय, लेकिन उनके नाम के साथ अब महापौर जुड चुका था। जो उन्हें आगामी लोकसभा चुनाव में टिकट की दावेदारी के लिये पेश करने वाला था। श्यामा चरण का अंदाजा सही था, थोड़े ही प्रयास के बाद 1991 में इलाहाबाद से चुनाव लड़ने के लिये भाजपा ने श्यामा चरण को टिकट दिया। यह चुनाव श्यामा चरण के कैरियर के हिसाब से अहम था, लेकिन वह जनता दल की सरोज दुबे से चुनाव हार गए। चूंकि श्यााम चरण लोकसभा चुनाव लड़ चुके थे इसलिये वह वापस नगर निगम के चुनाव में नहीं आना चाहते थे।

पत्नी को लड़ाया चुनाव

पत्नी को लड़ाया चुनाव

राजनैतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिये इस बार नगर निगम चुनाव में उन्होंने अपनी पत्नी जमुनोत्री गुप्ता को भाजपा से टिकट दिलाया और वह भाजपा से महापौर प्रत्याशी बनी। लेकिन श्यामा चरण को यहां भी झटका लगा और इस बार उन्हें निर्दलीय प्रत्याशी रीता बहुगुणा जोशी ने हरा दिया। इसके बार श्यामा चरण व उनकी पत्नी ने विधानसभा चुनाव की ओर रूख किया लेकिन बात नहीं बनी और दोनों की जमानत जब्त हो गयी। इसके बाद शयामा चरण की अहमियत भाजपा में कम हुई तो लोकसभा चुनाव में उन्हें टिकट न दिये जाने की खबरें बाहर आयी। फिर क्या था श्यामा चरण ने सपा का दामन थामा और इलाहाबाद से चुनाव लडे। लेकिन 1998 के इस चुनाव में राजनीति के शिखर पर पहुंचने को अग्रसर डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने उन्हें शिकस्त दे दी।

इलाहाबाद छोड़ वापस लौटे बांदा

इलाहाबाद छोड़ वापस लौटे बांदा

इसके बाद श्यामाचरण ने इलाहाबाद ही छोडने का फैसला लिया और वापस अपने गृह जनपद बांदा पहुंच गए। वहां 1999 में सपा से वह फिर से टिकट हासिल करने में सफल रहे और चुनाव लडे, लेकिन इस बार बसपा के राम सजीवन से वे हार गए। हालांकि श्यामा चरण दूसरे स्थान पर रहे और यह दिखा कि श्यामा चरण अब सांसद बनने की कगार पर हैं और वही हुआ भी 2004 में आम चुनाव हुये तो सपा ने फिर से श्यामा चरण पर भरोसा दिखाया और वह इस बार बसपा के ही राम सजीवन को शिकस्त देकर लोकसभा पहुंचने में सफल रहे। लेकिन, बांदा में कार्यकाल बेहतर ना होने के कारण उन्हें 2009 के चुनाव में सपा ने टिकट नहीं दिया। लेकिन जोडतोड के महारथी श्यामा चरण ने तब देश की सबसे चर्चित सीट फूलपुर से टिकट हासिल करने में सफलता हासिल की और चुनाव लडे। लेकिन इस बार उन्हें बसपा के कपिल मुनि करवरिया के हाथों हाथ का स्वाद चखना पड़ा।

मोदी लहर की सवारी

मोदी लहर की सवारी

असली दांव श्यामा चरण ने 2014 के आम चुनाव के दौरान खेला। पूरे देश में मोदी-मोदी की लहर बह रही थी और उस लहर पर सवार होने के लिये श्यामा चरण ने पूरी ताकत लगा दी। बहुत विरोध और ढेरों दावेदारों के बीच किसी तरह श्याामा चरण को इलाहाबाद संसदीय सीट से टिकट मिल गया और मोदी लहर पर सवार होकर श्याम प्रसाद अप्रत्याशित रूप से जीतकर दूसरी बार लोकसभा पहुंच गये। उन्होंने सपा के कद्दावार नेता और तत्कालीन सांसद रेवती रमण को हरा दिया था, लेकिन शुरुआत के कुछ दिन छोड़कर श्यामा चरण की भाजपा से नहीं बनी आये दिन बयान और अपनी ही पार्टी पर निशाना साधने से लेकर अपने परिवार के लोगों को टिकट न दिये जाने से श्यामा चरण नाराज रहने लगे। नतीजा भाजपा ने 2019 के चुनाव मे उनका टिकट काट दिया और टिकट कटने के बाद वह फिर से सपा के साथ साइकिल पर सवार हो गये हैं। हालांकि, बांदा में बसपा से हारने व हारने के बाद इस बार उनके जेहन में बसपा से किसी तरह का डर नहीं है, क्योंकि बसपा-सपा का गठबंधन है और वह गठबंधन के प्रत्याशी हैं।

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