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120 साल में बना ताजमहल जैसा ये भव्य मंदिर, नक्काशीदार ढांचा और सजावट कर देते हैं मंत्रमुग्ध

आगरा। मुगल शासक शाहजहां द्वारा आगरा में बनवाया गया ताजमहल तो दुनियाभर के पर्यटकों के बीच आकर्षण का केंद्र है ही। इसके जैसी एक और इमारत भी अब यहां बनी है, जो मकबरा नहीं बल्कि एक मंदिर है। शहर के दयालबाग एरिया में इस मंदिर का निर्माण कार्य 120 साल से चल रहा है। इसे राधास्वामी मत के अनुयायियों ने अपने गुरु स्वामी की स्मृति में बनवाया है। कुछ इसी तरह 16वीं सदी में ताजमहल बना था, जिसे शाहजहां ने बेगम मुमताज महल की याद में बनवाया था।

इस इमारत को बनाने में मजदूरों की 4 पीढ़ियां लगीं

इस इमारत को बनाने में मजदूरों की 4 पीढ़ियां लगीं

मंदिर प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, इस स्थल को स्वामी बाग (Samadh Soamiji Maharaj, Soami Bagh) के रूप में जाना जाता है। ताज महल की तरह सफेद संगमरमर से बनी इस इमारत को बनाने में मजदूरों की चार पीढ़ियां लग गईं। अब न सिर्फ इस मंदिर की सजावट और नक्काशीदार बनावट देखने लायक है, बल्कि स्वर्ण प्रतिमा और चोटी में भी गजब की चकाचौंध है। देशी दर्शनार्थियों के अलावा यहां विदेशियों की भी अच्छी खासी संख्या इन दिनों देखने को मिल रही है।

पूरन धानी महाराज ने राधस्वामी मत की स्थापना की

पूरन धानी महाराज ने राधस्वामी मत की स्थापना की

दस्तावेजों में उल्लेख है कि, पूरन धानी महाराज का जन्म 24 अगस्त, 1818 को जन्माष्टमी के दिन हुआ था। उन्हें अनेकों भाषाओं हिन्दी, अरबी, फारसी, संस्कृत, उर्दू का भी ज्ञान था। पूरन धानी महाराज ने बाँदा में नौकरी भी की थी, लेकिन उनकी रुचि आध्यात्म की ओर थी। इसी कारण वो नौकरी छोड़कर साधना में लग गए। 1861 में बसन्त पंचमी के दिन पूरन धानी ने राधस्वामी मत की स्थापना की। कहा जाता है कि उन्होंने 5 वर्ष की आयु में ही सूरत शब्द योग की साधना प्राप्त कर ली थी। 15 जून, 1878 को उनका निधन हो गया। उनकी स्मृति में ही यह मंदिर बनाने का निर्णय लिया गया।

19वीं सदी में मंदिर की नींव रखी, 52 कुएं बनाए गए

19वीं सदी में मंदिर की नींव रखी, 52 कुएं बनाए गए

दयालबाग क्षेत्र में 19वीं सदी में इस मंदिर की नींव रखी गई। यह नींव कुछ ताजमहल जैसी ही थी। इसके लिए 52 कुएं बनाए गए। लगभग 50 से 60 फ़ीट गहराई तक पत्थरों को जमीन के अंदर डाला गया। एक के ऊपर एक पिलर बनाये, ताकि यह गिर न पाये। इन पिलरों के ऊपर बने डोमो को इस तरह रखा गया कि भूकम्प या तूफ़ान का असर भी न पड़े। ढांचे में 5 मुख्य द्वार बनाये गए, जोकि राधास्वामी नाम में आने वाले 5 अक्षरों के मुताबिक ही रखे।

श्रद्धालुओं ने ही उठाया खर्च, इसलिए धीमा रहा काम

श्रद्धालुओं ने ही उठाया खर्च, इसलिए धीमा रहा काम

बताया जा रहा है कि इस इमारत को बनाने का खर्च सिर्फ राधास्वामी मत के अनुयायियों ने ही उठाया। ऐसे में काम धीमी गति से होता रहा। कई लोगों की धारणा भी ऐसी हो गई कि मन्दिर को बनते रहने का श्राप है। मगर, अब इसका काम लगभग पूरा हो चुका है। इस मंदिर में दर्शनार्थियों से कोई चंदा या दान नहीं वसूला जाता। सिर्फ राधास्वामी मत के अनुयायी ही इस मन्दिर को कुछ दे सकते हैं। अन्य व्यक्ति का दान मान्य नहीं हैं।

इस मंदिर का कलश आगरा में सबसे बड़ा और चमकदार

इस मंदिर का कलश आगरा में सबसे बड़ा और चमकदार

आगरा में इस मंदिर का कलश सबसे बड़ा और चमकदार बताया जाता है। सोने से सजे कलश और चांदी के आभूषण देखने योग्य हैं। इसमें राधास्वामी मत के प्रथम गुरु पूरन धानी महाराज की प्रतिमा भी हैं। परिसर काफी बड़ा है। इसलिए इसके दर्शन क्रेन के माध्यम से भी कराए जाते हैं।

सिर्फ एक जीवित कृति तितली की

सिर्फ एक जीवित कृति तितली की

मन्दिर में लगभग हर फल और सब्जी की बेलें पत्थरों को तराश कर बनाई गयीं, जिन्हें बनाने में महीनो लग जाते थे। हर बेल की डिजाइन पर उसका वैज्ञानिक नाम लिखा है। पूरी डिजाइनों में सिर्फ एक जीवित कृति तितली की है। मन्दिर के द्वार पर ऐतिहासिक कुआं है, जिसका पानी प्रसाद के रूप में इस्तेमाल होता है।

निर्माण कार्य में 7 करोड़ रुपये सालाना खर्च हुए

निर्माण कार्य में 7 करोड़ रुपये सालाना खर्च हुए

यदि आप पूरा परिसर निहारना चाहते हैं तो लगभग एक घंटा देना होगा। यदि हेलिकॉप्टर से एरियल व्यू चाहते हैं तो इसके साथ ही पूरे आगरा को देख पाएंगे। कहा जाता है कि इस इमारत के निर्माण कार्य में 7 करोड़ रुपये सालाना खर्च हुए।

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