VIDEO: आगरा में ताज से कम नहीं यह मंदिर, 300 मजदूर बना रहे, 120 साल बाद भी अधूरा है काम
आगरा। ताजनगरी में ताजमहल देखने तो सभी आते हैं, मगर जो लोग राधास्वामी मंदिर के दर भी आ जाते हैं, वो इसकी भव्यता के कायल हो जाते हैं। शहर के दयालबाग एरिया में इस मंदिर का निर्माण कार्य 120 साल से चल रहा है, जिसे बनाने में मजदूरों की चार पीढ़ियां लग गईं। अब न सिर्फ इस मंदिर की सजावट और नक्काशीदार बनावट देखने लायक है, बल्कि स्वर्ण प्रतिमा और चोटी में भी गजब की चकाचौंध है। देशी दर्शनार्थियों के अलावा विदेशियों की भी अच्छी खासी संख्या इन दिनों देखने को मिल रही है।

इनकी देन है यह मंदिर
मंदिर प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, यह मंदिर राधास्वामी मत के अनुयायियों की अपार श्रद्धा और लगन से बनकर तैयार हुआ है। यह राधास्वामी मत के अनुयायी सत्संगियों के गुरु स्वामी जी का समाधि स्थल है। पूरन धानी महाराज का जन्म 24 अगस्त, 1818 को जन्माष्टमी के दिन हुआ था। उन्हें अनेकों भाषाओं हिन्दी, अरबी, फारसी, संस्कृत, उर्दू का भी ज्ञान था। पूरन धानी महाराज ने बाँदा में नौकरी भी की थी, लेकिन उनकी रुचि आध्यात्म की ओर थी। इसी कारण वो नौकरी छोड़कर साधना में लग गए। 1861 में बसन्त पंचमी के दिन राधस्वामी मत की स्थापना की। कहा जाता है कि उन्होंने 5 वर्ष की आयु में ही सूरत शब्द योग की साधना प्राप्त कर ली थी। इसके बाद वे स्वामी जी महाराज के नाम से प्रसिद्ध हुए। 15 जून, 1878 को को उनका निधन हुआ। जिसके बाद उनकी स्मृति में यह मंदिर बनाने का निर्णय लिया गया।

400 मजदूर जुटे दिन रात काम पर
आगरा में दयालबाग क्षेत्र में 19वीं सदी में इस मंदिर की नींव रखी गई। यह नीवं कुछ ताजमहल जैसी ही थी। 52 कुएं बनाए गए। लगभग 50 से 60 फ़ीट गहराई तक पत्थरों को जमीन के अंदर डाला गया। एक के ऊपर एक ही पिलर बनाये, ताकि यह गिर न पाये। इन पिलरों के ऊपर बने गुम्बद को इस तरह रखा गया कि भूकम्प या तूफ़ान का असर भी न पड़े।

400 मजदूर जुटते थे काम पर
वैसे, इतने सालों में इसे बनाने में यहां मजदूरों और कारीगरों की चार पीढ़ी लग गईं, जिनकी संख्या 400 तक चली जाती थी। अब तक भी करीब 200 लोगों ने इसका काम संभाले रखा। मंदिर परिसर बनाने के लिए बड़े बड़े पत्थर एक के ऊपर एक रखे गए। विशेष नक्काशी की गई। 5 मुख्य द्वार बनाये गए, जोकि राधास्वामी नाम में आने वाले 5 अक्षरों के मुताबिक ही रखे।

श्रद्धालुओं ने ही उठाया खर्च
बताया जा रहा है कि इस मन्दिर को बनाने का खर्च सिर्फ राधास्वामी मत के अनुयायियों ने ही उठाया। ऐसे में काम धीमी गति से होता रहा। कई लोगों की धारणा भी ऐसी हो गई कि मन्दिर को बनते रहने का श्राप है। मगर, अब इसका काम लगभग पूरा हो चुका है।
इस मंदिर में दर्शनार्थियों से कोई चंदा या दान नहीं वसूला जाता। सिर्फ राधास्वामी मत के अनुयायी ही इस मन्दिर को कुछ दे सकते हैं। अन्य व्यक्ति का दान भी मान्य नहीं हैं।

क्यों करें यहां दर्शन? यह हैं विशेषताएं
- इस मंदिर का कलश आगरा में सबसे बड़ा एवं चमकदार बताया जा रहा है। क्योंकि, यह सोने का बना हुआ है। कलश के अलावा इसमें राधास्वामी मत के प्रथम गुरु पूरन धानी महाराज की प्रतिमा भी हैं। वैसे इसे उनका समाधि स्थल कहते हैं, जिसे स्वामीबाग के नाम से पहचाना जाता है।
- इसे बनाने का नक्शा 150 साल पहले इटली की एक कम्पनी ने तैयार किया था। जिसके अनुसार, मन्दिर के ऊपरी तलों की छत बीच से काटी गई ताकि नीचे से ऊपर तक की खूबसूरती एक नजर में दिखाई दे।
- यह मंदिर काफी बड़ा है। इसलिए इसके दर्शन क्रेन के माध्यम से भी कराए जाते हैं। यदि आप पूरा परिसर देखना चाहते हैं कुछ घंटे लग ही जाएंगे। यदि आप हेलिकॉप्टर से एरियल व्यू चाहते हैं तो इसके साथ ही पूरे आगरा को देख पाएंगे।
- मंदिर के नक्शे में हर एक जगह का विवरण है। इसके बनने के बाद किस जगह कौन-सा पेड़ लगेगा, यह भी उसी समय से तय है। अगर मजदूर का मन नही होता है तो उससे काम करने का दबाव नही डाला जाता, क्योंकि अगर एक हथौड़ी का गलत वार हो जाता तो लाखों की कीमत का पत्थर और उसको बनाने में महीनों की मेहनत खराब हो जाती।
- इस मंदिर के लिए मजदूर के काम करने की कोई उम्र तय नहीं की गई थी। जब तक वो काम करने की इक्षा रखता था, तब तक उसे काम करने दिया गया। बता दें कि मन्दिर में लगे हर पत्थर पर डिजाइन कारीगरों ने हाथ से ही बनाये हैं।
- मन्दिर में लगभग हर फल और सब्जी की बेलें पत्थरों को तराश कर बनाई गयीं, जिन्हें बनाने में महीनो लग जाते थे। हर बेल की डिजाइन पर उसका वैज्ञानिक नाम लिखा है। पूरी डिजाइनों में सिर्फ एक जीवित कृति तितली की है।
- एक पत्थर को तराशने में हर एक हथौड़ी के वार की कीमत है। वहीं, मन्दिर की छतें किसी भी पत्थर को जोड़ कर नही बनीं। छतों के लिए बड़े-बड़े पत्थरों को पिलरों पर रखा गया है।
- पूरी डिजायनों में पत्थर का काम है। मगर, लोगों को पहली नजर में यहाँ पेंटिंग जैसा नजर आता है। पत्थरों पर रंगीन डिजाइन भरने के लिए पत्थरो में छेद कर आकर्षक पत्थर बने हैं।
- मंदिर के खर्च पर प्रबंधन के लोग कहते हैं कि उन्हें भी नहीं मालूम कितनी लागत आई। अब तक मन्दिर निर्माण पर कितना खर्चा हुआ? या कितने पत्थर तराश कर डिजाइन किये गए? बस एक अंदाजा है कि लगभग 7 करोड़ रुपये सालाना खर्च हुए।
- मंदिर पर लगे पिलरों का प्रति पिलर औसत वजन टनो में है। इन्हें क्रेन पर लटकाकर यथा-स्थान पहुंचाया जाता था।
- देखने में इस मन्दिर में कोई जोड़ नजर नही आता, क्योंकि जहाँ भी जोड़ लगता है तो उस पर पत्थर तराश कर अलग-अलग डिजाइन बना कर कवर कर दिया जाता है।
- मन्दिर के द्वार पर ऐतिहासिक कुआं है, जिसका पानी प्रसाद के रूप में इस्तेमाल होता है।
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