रुला देगी 87 वर्षीय बुजुर्ग महिला की कहानी, करोड़ों की संपत्ति..चार बेटे, फिर भी ठोकरें खाने को है मजबूर

Agra से 87 वर्षीय बुजुर्ग महिला की रुला देने वाली कहानी सामने आई है। कभी गोपीचंद अग्रवाल की गिनती शहर के अरबपतियों में होती थी, लेकिन आज उनकी 87 साल की पत्नी विद्या देवी आज वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर है।

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Agra News: नामचीन आंखों के अस्पताल के संस्थापक रहे गोपीचंद अग्रवाल की 87 साल की पत्नी विद्या देवी आज वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर है। बता दें, गोपीचंद की गिनती शहर के अरबपतियों में होती थी और उनकी विद्या देवी अपने चार बेटों के साथ आलीश कोठी में रहती थीं।

ऐसा नहीं है कि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई हो। बल्कि, उनके चारों बेटों के पास आज भी करोड़ों की संपत्ति है। इसके बावजूद बुजुर्ग महिला आज दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर है।

87 साल की बुजुर्ग महिला विद्या देवी के पति गोपीचंद अग्रवाल की 13 साल पहले मृत्यु हो गई थी। पति की मृत्यु के बाद से उनके बेटे और बहुएं उन्हें अपने पास रखने के लिए तैयार नहीं हैं। विद्या देवी की मानें तो बेटों ने प्रॉपर्टी का बंटवारा कर लिया, लेकिन उन्हें कुछ नहीं मिला।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अस्पताल के साथ गोपीचंद का लोहे का कारोबार था। पति की मृत्यु के बाद बेटों ने व्यापार को अपने हाथ में ले लिया। वहीं, दूसरे के पास ट्रैक्टर के स्पेयर पार्ट का बिजनेस है।

विद्या देवी की मानें तो वो जिस घर में रहती थीं, उसे बडे़ बेटे ने गुपचुप तरीके से बेच दिया। रुपए अपने पास रख लिए। मुझे मारपीट कर घर से निकाल दिया। आंखों में आंसू लाते हुए विद्या देवी कहती है कि जब बडे़ बेटे ने घर से निकाल दिया तो मैं दूसरे बेटे के घर पर गईं।

उसने कुछ दिनों तक मुझको अपने साथ रखा। लेकिन, कुछ दिनों बाद भी उसने कहा कि कहीं और अपना ठिकाना देख लें। जब मैं कहती थीं कि इस हाल में कहां जाऊंगी। तो कहते थे कि कहीं भी जाओ। यमुना में कूद जाओ।

विद्या देवी की मानें तो इसके बाद वो अपने तीसरे बेटे के घर पहुंची। लेकिन, उसने भी अपने पास रखने से साफ इनकार कर दिया। चौथे बेटों को भी मां पर दया नहीं आई, उसने भी मां को अपने घर में जगह नहीं दी। जब उन्होंने घर नहीं छोड़ा तो बेटे ने अपनी बुजुर्ग मां से मारपीट कर धक्के देकर कोठी से बाहर कर दिया।

विद्या देवी कहती हैं कि एक बार मेरे हाथ की हड्‌डी टूट गई थी। उस वक्त रिश्तेदारों ने बेटों को समझाया। पंचायत भी हुई,इसके बाद बडे़ और छोटे बेटे ने 15-15 दिन अपने साथ रखने की बात पर हामी तो भरी थी। लेकिन, ये व्यवस्था भी लंबी नहीं चल सकी। बुजुर्ग महिला ने बतया कि उन्हें दवाई भी नहीं दिलाई जाती थी।

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    इसके बाद वो वृंदावन आश्रम चली गईं थी। अब वो रामलाल वृद्धाश्रम आई हैं। रोते हुए कहती है कि अब यही मेरा परिवार है। यहां पर रहने वाले लड़के मेरे बेटे और बुजुर्ग महिलाएं मेरी बहन है। दिल में दर्द लिए इस बूढ़ी मां के जुबान से बस यही शब्द निकलते हैं कि अगर मैं मर भी जाऊं तो मेरे बेटों को इसकी खबर नहीं दी जाए।

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