गोरक्षा के लिए खून के आखिरी कतरे तक लड़ी यह ‘गुजरातन’!
अहमदाबाद। 27 अगस्त, 1993 का दिन अहिंसा और जीवदया प्रेमियों के लिए आघातजनक था। शहर के आंबावाडी क्षेत्र में चंद हिंसक और स्वार्थी लोगों ने हिंसा का जो खेल खेला, उसने जीवदया प्रेमियों के रोंगटे खड़े कर दिए। उस समय इन चंद स्वार्थी तत्वों को लगा होगा कि एक गीताबेन रांभिया को खत्म कर देने से उनका रास्ता साफ हो जाएगा, लेकिन उनका बलिदान लाखों पशुओं के लिए ‘अभयदान' बन चुका है। गीताबेन का जीव हत्या रोकने का वह कार्य आज कारवां बन चुका है और यह काम किया है गीताबेन के जीवनसाथी बचुभाई ने।
गीताबेन रांभिया को शायद आज का अहमदाबाद या गुजरात और उसकी नई पीढ़ी नहीं जानती होगी, परंतु यह वह बहादुर गुजरातन थी, जो खून के आखिरी कतरे तक गोरक्षा के लिए लड़ती रही। बचुभाई रांभिया आज से ठीक 20 वर्ष पूर्व हुई उस वारदात को आज भी याद तो करते हैं, लेकिन गीताबेन की शहादत वर्ष दर वर्ष उनमें नया जोश भरती है। पत्नी के अधूरे कार्य को पूरा करने के लिए उन्होंने उनकी मौत के तुरंत बाद गीताबेन रांभिया स्मृति अहिंसा ट्रस्ट और गीताबेन रांभिया परिवार चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना की और गीताबेन के कार्य को लगातार आगे बढ़ाया। बचुभाई का कहना है कि उनका परिवार जीव हिंसा रोकने के लिए हर कुर्बानी देने को तैयार है।

‘झांसी की रानी' की उपाधि प्राप्त गीताबेन रांभिया के बलिदान का ही परिणाम है कि आज गुजरात में गोवंश प्रतिबंध कानून के रूप में लागू है। गीताबेन का जन्म मध्य प्रदेश के जबलपुर में 30 जून, 1957 को हुआ था। मुंबई से एमए करने के बाद गीताबेन का विवाह 3 दिसम्बर, 1977 को कच्छ जिले के रामाणिया गांव के जैन युवक बचुभाई रांभिया के साथ हुआ। इसके बाद दोनों व्यवसाय के लिए गांधीधाम में स्थाई हुए। गांधीधाम में ही गीताबेन को जीवदया कार्यों की प्रेरणा मिली और उन्होंने इसकी शुरूआत भी कर दी। इसी दौरान 3 दिसम्बर, 1983 को अखिल भारतीय हिंसा निवारण संघ के महासचिव सुरेशभाई झवेरी के निमंत्रण पर गीताबेन ने जीवदया कार्यों के लिए अहमदाबाद को कर्मभूमि बनाया।
अहमदाबाद में आते ही गीताबेन रांभिया का जीवदया अभियान गति पकडऩे लगा। उनके कार्यों से गुजरात सरकार भी प्रभावित हुई। गुजरात सरकार ने नवंबर-1984 में अवैध रूप से कत्लखाने जाने वाले अबोध पशुओं को बचाने का काम करने के लिए गीताबेन रांभिया को मानद् पुलिस निरीक्षक की उपाधि दी। कानून की वर्दी पहनने के बाद तो मानो गीताबेन का जीवदया कार्य परवान चढऩे लगा। पुलिस निरीक्षक बनने के बाद गीताबेन ने 5 नवंबर, 1984 को पानकोर नाका क्षेत्र में पांच गायों को कत्लखाने जाने से बचा कर जीवदया कार्य की शुरूआत की और यह सिलसिला जीवन भर चलता रहा। अपनी अल्पायु में गीताबेन ने 1 लाख 65 हजार से अधिक अबोध पशुओं को मौत के मुख में जाने से बचाया। गीताबेन ने अपने कार्यकाल के दौरान कागडापीठ थानांतर्गत कुरैशी ढोर बाजार से 137 बछड़ों को बचाया, वहीं 1989 में अहमदाबाद मनपा की ओरसे पकड़े जाने वाले आवारा कुत्तों को मारेजाने का विरोध करते हुए पुलिस में फरियादी बन कर रिपोर्ट दर्ज कराई। इसके बाद 18 मार्च को तत्कालीन महापौर जयेन्द्र पंडित ने गीताबेन को ‘झांसी की रानी' का पुरस्कार दिया। गीताबेन ने बाद में साबरमती में जोधपुर की एक मालगाड़ी को रोक कर उसमें से 686 बछड़ों को बचाया। 1990 में कच्छ के तृणा बंदरगाह से 1156 भेंड़-बकरियों को निर्यात होने से रोका।
गीताबेन के जीवदया प्रेम की चरमसीमा को 7 जून, 1991 की उस घटना से सहज ही समझा जा सकता है, जब गीताबेन गर्भवती थीं। उनकी प्रसूति की अंतिम घडिय़ां थीं। उस दिन वे बहेरामपुरा में थीं, जहां से 21 बछड़ों को कत्लखाने जाने से उन्होंने बचाया। इस अभियान के कुछ देर बाद ही उन्होंने पुत्र चैतन्य को जन्म दिया।
झांसी की रानी का यह सफर 27 अगस्त, 1993 को थम गया। उस दिन गीताबेन ने आस्टोडिया थाना क्षेत्र में छह बछड़ों को कत्लखाने जाने से बचाया। इन बछड़ों को लेकर वे पोलीटेक्निक स्थित पिंजरापोल छोडऩे गईं। वहां से जब गीताबेन लौट रही थीं, तभी आंबावाडी स्थित सी. एन. विद्यालय के पास चंद हिंसक तत्वों ने गीताबेन को घेर लिया और छुरे से उनकी हत्या कर दी।
गीताबेन की हत्या सरकार और समाज को कई सबक दे गई। उनकी शहादत का एक माह होने से पहले ही तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल ने 25 सितम्बर को विधानसभा में गोवंश प्रतिबंध विधेयक पारित कराया। गीताबेन का वह बलिदान आज लाखों पशुओं के लिए अभयदान बन चुका है। गीताबेन की शहादत के बाद उनके पति बचुभाई ने भी जीवदया को ही अपने जीवन का ध्येय बना लिया और दो संगठनों की स्थापना की। अब तक बचुभाई रांभिया के संगठनों ने लाखों अबोध पशुओं को बचाया है। इसके अलावा घायल-बीमार पशुओं की सेवा और उपचार का कार्य भी वे कर रहे हैं।












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