बुंदेलखंड में कुपोषण से लड़ने में जुटी हैं ननद-भाभी

बुंदेलखंड की ललितपुर की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कल्पना और विमला अब परिचय की मोहताज नहीं। राजघाट गांव में कदम रखते ही नामुमकिन को मुमकिन बनाने वाले इनके प्रयास का एहसास होने लगता है। बेहद पिछड़े इस गांव में सरकार और प्रशासन जो काम न कर सकी उसे दो महिलाओं ने कर दिखाया है। यही वजह है कि राजघाट के आंगनवाड़ी केंद्र को आदर्श केंद्र का दर्जा दिया गया है। राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम में दोनों को दिल्ली में आमंत्रित किया गया।
कुपोषण के खात्मे के लिए कल्पना और विमला ने न सिर्फ बुंदेलखंड में दशकों से चली रही रूढ़ीवादी परंपराओं की जड़ों को उखाड़ा, बल्कि घर-घर जा कर सरकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार किया। गांव की हर महिला को स्वास्थ्य से जुड़ी बारीकियां समझाईं। हैरत वाली बात है कि इतनी बड़ी उपलब्धि के बावजूद प्रशासनिक अमला इन दोनों को असली हकदार बताने की जगह यूनिसेफ और दूसरे लोगों को सारा श्रेय दे रहा है। जिलाधिकारी ओ. पी. वर्मा इसे भी सभी का सामूहिक प्रयास बता रहे हैं। ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बुंदेलखंड के सबसे पिछड़े जनपद में शुमार ललितपुर में 6 माह तक के 5,057 बच्चे तथा 6 माह से 6 वर्ष तक के 67,743 नौनिहाल कुपोषण से जूझ रहे हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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