बुंदेलखंड में कुपोषण से लड़ने में जुटी हैं ननद-भाभी

malnutrition
लखनऊ। वास्तविक और रंगमंच पर ननद-भाभी के झगड़े तो सभी ने देखे-सुने होंगे मगर बुंदेलखंड के ललितपुर जनपद में राजघाट गांव में ननद-भाभी की एक जोड़ी ने अपने गांव को कुपोषण मुक्त कर एक उदाहरण पेश किया है।सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ललितपुर में 6 वर्ष तक के 73,609 बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। ऐसे में महज ढाई साल के भीतर अपने गांव को कुपोषण मुक्त बनाने वाली ननद-भाभी राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में है और इनके चर्चे राजधानी लखनऊ से लेकर दिल्ली तक हो रहे हैं। इनके प्रयास से राजघाट गांव को आदर्श आगनवाड़ी केंद्र का दर्जा दिया गया है। यह बुंदेलखंड का पहला मॉडल केंद्र है।

बुंदेलखंड की ललितपुर की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कल्पना और विमला अब परिचय की मोहताज नहीं। राजघाट गांव में कदम रखते ही नामुमकिन को मुमकिन बनाने वाले इनके प्रयास का एहसास होने लगता है। बेहद पिछड़े इस गांव में सरकार और प्रशासन जो काम न कर सकी उसे दो महिलाओं ने कर दिखाया है। यही वजह है कि राजघाट के आंगनवाड़ी केंद्र को आदर्श केंद्र का दर्जा दिया गया है। राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम में दोनों को दिल्ली में आमंत्रित किया गया।

कुपोषण के खात्मे के लिए कल्पना और विमला ने न सिर्फ बुंदेलखंड में दशकों से चली रही रूढ़ीवादी परंपराओं की जड़ों को उखाड़ा, बल्कि घर-घर जा कर सरकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार किया। गांव की हर महिला को स्वास्थ्य से जुड़ी बारीकियां समझाईं। हैरत वाली बात है कि इतनी बड़ी उपलब्धि के बावजूद प्रशासनिक अमला इन दोनों को असली हकदार बताने की जगह यूनिसेफ और दूसरे लोगों को सारा श्रेय दे रहा है। जिलाधिकारी ओ. पी. वर्मा इसे भी सभी का सामूहिक प्रयास बता रहे हैं। ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बुंदेलखंड के सबसे पिछड़े जनपद में शुमार ललितपुर में 6 माह तक के 5,057 बच्चे तथा 6 माह से 6 वर्ष तक के 67,743 नौनिहाल कुपोषण से जूझ रहे हैं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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