अहमदाबाद की कई इमारतों में समाई हैं साराभाई की स्मृतियाँ
अहमदाबाद। भारत में अंतरिक्ष कार्यक्रम के प्रणेता डॉ. विक्रम साराभाई की आज 94वीं जयंती है। उन्होंने अंतरिक्ष विज्ञान को नित-नए आयाम दिए। आज जो टेलीफोन, टेलीविजन और मौसम भविष्यवाणी जैसी सुविधा हमें उपलब्ध हैं, उनका श्रेय साराभाई को ही जाता है।
अहमदाबाद के प्रतिष्ठित उद्योगपति परिवार में 12 अगस्त, 1919 को जन्मे साराभाई की अनेक स्मृतियां आज भी अहमदाबाद की कई इमारतों में समाई हुई हैं। डॉ. विकम साराभाई सामुदायिक विज्ञान केन्द्र हो या भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल), अहमदाबाद कपड़ा उद्योग अनुसंधान संगठन (अटीरा) हो या भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम)। ये संस्थाएं साराभाई की लगन और मेहनत की साक्षी हैं।
‘पूत के पांव पालने में ही पता चल जाते हैं'। हिन्दी की इस कहावत को साराभाई ने वास्तव में चरितार्थ कर दिखाया। जब वे आठ वर्ष के थे, तभी से उन्होंने साइकिल पर तरह-तरह के प्रयोग शुरू कर दिए थे। गणित और विज्ञान उनके सबसे प्रिय विषय थे। भौतिक शास्त्र में उनकी विशेष अभिरुचि थी। 12-14 वर्ष की उम्र में उन्होंने स्टीम इंजन बना कर सबको न केवल आश्चर्य में डाला, बल्कि अपनी प्रतिभा का परिचय भी कराया।
आइए तसवीरों के साथ जानें कुछ विवरण :

आज है 94वीं जयंती
विक्रम साराभाई का अहमदाबाद के प्रतिष्ठित उद्योगपति परिवार में 12 अगस्त, 1919 को जन्म हुआ था। आज उनकी 94वीं जयंती है।

देख न सके आर्यभट्ट का परीक्षण
भारत ने 1975 में जब अपना पहला अंतरिक्ष उपग्रह ‘आर्यभट्ट' छोड़ा, तब पूरा देश अपने वैज्ञानिकों की सफलता पर गद्गद् हुआ था, लेकिन इस हर्ष के पीछे बड़ा गम भी छिपा हुआ था। आर्यभट्ट प्रोजेक्ट की परिकल्पना भारत के महान सपूत वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई ने की थी, लेकिन जब आर्यभट्ट का परीक्षण किया गया, तब इस विरल घटना को देखने का सौभाग्य साराभाई को नहीं मिला। अपने जीवन में उन्होंने आर्यभट्ट जैसे अनेक प्रोजेक्टों को कार्यान्वित किया, जिसका लाभ आज देश की जनता उठा रही है।

अटीरा अहमदाबाद
साराभाई ने कोस्मिक किरणों और परमाणु शक्ति अनुसंधान क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया। कोस्मिक किरणों पर प्रयोग के लिए उन्होंने हिमालय के ऊंचे शिखरों का चयन किया। इसके लिए उन्होंने गुलमर्ग में वैज्ञानिक उपकरणों से लैस प्रयोगशाला की स्थापना की। पढ़ाई के बाद इंग्लैण्ड से भारत लौट कर उन्होंने विख्यात वैज्ञानिक सर सी. वी. रमन के साथ बंगलौर के भारतीय विज्ञान संस्थान में कोस्मिक किरणों के बारे में अभ्यास किया। कोस्मिक किरणों पर और अध्ययन के लिए वे दूसरी बार इंग्लैण्ड के कैब्रिज विश्वविद्यालय गए। उन्होंने 1947 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।

आईआईएम अहमदाबाद
भारतीय अंतरिक्षक कार्यक्रम में लगातार सहयोग करने वाली अहमदाबाद की पीआरएल की स्थापना भी साराभाई ने ही की थी। उन्होंने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में डॉ. भाभा के उत्तराधिकारी के रूप में अंतरिक्ष विज्ञान में कई नए आयाम और कार्यक्रम शामिल किए। उन्होंने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के कार्यक्षेत्र का भी अनेकविद् क्षेत्रों में विकास किया।

पीआरएल अहमदाबाद
बुहमुखी प्रतिभा के धनी साराभाई को विज्ञान के अलावा भी कई क्षेत्रों में रुचि थी। केवल 28 वर्ष की आयु में उन्होंने कपड़ा क्षेत्र में अनुसंधान करने वाली अटीरा की स्थापना की। उस जमाने अहमदाबाद का कपड़ा उद्योग विश्वविख्यात था और कड़पा उद्योग से जुड़े अनुसंधानों एवं समस्याओं के निराकरण में अटीरा की महत्वपूर्ण भूमिका थी। अहमदाबाद के विश्वविख्यात भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) की स्थापना में भी साराभाई का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

सामुदायिक विज्ञान केन्द्र
‘पूत के पांव पालने में ही पता चल जाते हैं'। हिन्दी की इस कहावत को साराभाई ने वास्तव में चरितार्थ कर दिखाया। जब वे आठ वर्ष के थे, तभी से उन्होंने साइकिल पर तरह-तरह के प्रयोग शुरू कर दिए थे। गणित और विज्ञान उनके सबसे प्रिय विषय थे। भौतिक शास्त्र में उनकी विशेष अभिरुचि थी। 12-14 वर्ष की उम्र में उन्होंने स्टीम इंजन बना कर सबको न केवल आश्चर्य में डाला, बल्कि अपनी प्रतिभा का परिचय भी कराया।












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