दुर्गा जैसी शक्ति पर रौब झाड़ने वाले एक नहीं 83 'नरेंद्र भाटी'
[अजय मोहन] महज 12वीं तक पढ़े समाजवादी पार्टी के नेता नरेंद्र भाटी ने गांव वालों को अपनी पावर का अहसास दिलाने के लिये कहा कि उन्होंने 41 मिनट में आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल को सस्पेंड करा दिया। उन्होंने बड़े गर्व से कहा कि मेरे एक फोन पर मुलायम सिंह ने यह काम किया। आपको यह जानकर ताज्जुब नहीं होगा कि समाजवादी पार्टी की सरकार में एक नहीं बल्कि 83 नरेंद्र भाटी हैं, जो दुर्गा जैसे आईएएस अधिकारियों की शक्ति छीनने की पावर रखते हैं।
83 नरेंद्र भाटी कौन हैं, कहां हैं और क्या कर रहे हैं यह हम आपको जरूर बताना चाहेंगे। ये वो विधायक हैं, जिन्हें उत्तर प्रदेश की जनता ने खुद चुना है। ये वो हैं जिन्होंने पूर्व सांसद नरेंद्र भाटी की तरह 12 या उससे कम पढ़ाई की है। अगर सपा सरकार के चुने हुए विधायकों पर एक नजर डालें तो उनमें से 36 विधायक ऐसे हैं, जो महज 12वीं तक पढ़े हैं। वहीं 25 विधायक 10वीं तक, 13 विधायक आठवीं और 2 पांचवीं पास हैं। यही नहीं 9 विधायक ऐसे हैं, जो महज हस्ताक्षर करना करना जानते हैं या फिर अंगूठा छाप हैं।
जरा सोचिये प्रदेश के लाखों छात्र घर से दूर जाकर पढ़ाई करते हैं। रात-रात भर सोते नहीं। जिनका एक-एक मिनट आईएएस बनने का सपना बुनता है। जो देश की सबसे बड़ी परीक्षा सिविल सर्विसेस परीक्षा पास करके आता है, उसके जीवन से पांचवीं और आठवीं पास विधायक कैसे खिलवाड़ करते हैं, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हम नोएडा के इस प्रकरण में देख रहे हैं, जहां बालू माफियाओं के इशारे पर दुर्गा शक्ति नागपाल को सस्पेंड कर दिया गया। इसमें कोई शक नहीं कि इस मामले के पीछे खनन माफियाओं का हाथ है। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने मामले को संज्ञान में लेते हुए अखिलेश यादव से पूछा है कि इस मामले में अबतक क्या किया।
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नौकरशाही पर सवारी नहीं कर पा रहे सीएम
कहते है उप्र की नौकरशाही उस बिगडैल अरबी घोड़े के समान हैं जिसकी सवारी करने के लिए पहले इसे कसके अपने शिकंजे में लेना होता हैं। अखिलेश ने सीएम बनते ही नौकरशाही के साथ क्रिकेट मैच खेलना जैसी अच्छी शुरुआत की लेकिन उप्र की नौकरशाही इन बातों से बिगड़ गई और उसके दिल से सीएम का भय जाता कहा। इसी जगह पर पहले मुलायम और मायावती नौकरशाही को दबा और डराकर रखते थे। तभी नौकरशाह काम करते थे।

जिनकी बदौलत सरकार बनी
पूरा देश जानता है कि उत्तर प्रदेश में सपा ने छात्रों और युवाओं के बल पर सत्ता हासिल की है। इन छात्रों में अधिकांश ऐसे हैं, जिन्हें पढ़ाई से मतलब नहीं। जाहिर सी बात है मुलायम लोकसभा चुनाव में भी इन्हीं के बल पर चुनाव जीतने के प्रयास में हैं, लिहाजा अब वो कुछ भी करें, उन्हें फटकार लगाने का मतलब लोकसभा चुनाव में वोट काटना होगा। ऐसे में सपा की सरकार चलाने वाले प्रशासनिक अधिकारियों पर भी लगाम नहीं कस पा रहा है।

108 सपा विधायकों पर क्रिमिनल केस
उत्तर प्रदेश में 403 विधायकों में से 188 पर आपराधिक मुकदमें चल रहे हैं। खास बात यह है कि इन 188 में से 108 तो सत्ताधारी समाजवादी पार्टी के ही हैं। यूपी के कुल विधायकों के 23 फीसदी यानी 93 विधायकों पर गंभीर आरोप दर्ज हैं जैसे हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण, आदि।

टॉप-10 क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले विधायकों में सपा के सबसे ज्यादा
अगर आपराधिक मुकदमों की बात करें तो यूपी के टॉप-10 विधायकों में शीर्ष पांच और दस में से सात विधायक सपा के ही हैं। टॉप-20 क्रिमिनल एमएलए की लिस्ट में भी सपा का ही दबदबा है। सबसे ज्यादा क्रिमिनल केस वाले पांच सपा विधायक हैं अलीगंज से रामेश्वर सिंह (27), ज्ञानपुर से विजय कुमार (25), बीकापुर से मित्रसेन (23), गोसाईंगंज से अभय सिंह (18) और लखनऊ मध्य से रविदास मेहरोत्रा (17)।

वाहनों के नंबर प्लेट पर प्रेस-डॉक्टर नहीं सपा के स्टीकर
कई दशक पहले आपात स्थिति में ट्रैफिक में नहीं रोका जाये, इसके लिये डॉक्टरों के वाहनों पर प्लस के साइन लगाये गये। देखते ही देख पुलिस विभाग में काम करने वालों ने भी लगाने शुरू कर दिये। फिर प्रेस और फिर एडवोकेट और अलग-अलग विभाग के लोग नंबर प्लेट पर स्टीकर लगाने लगे। यूपी में इस समय आलम यह है कि सपा के छोटे-छोटे कार्यकर्ता भी नंबर प्लेट पर सपा लिखवाकर चलते हैं। खास बात यह है कि कोई भी पुलिस अधिकारी उन्हें कुछ नहीं बोलता।

दबंग छात्रनेता बने राज्यमंत्री
अखिलेश यादव ने अपने करीबी लोगों को लाल बत्ती तो ऐसे बांटी, जैसे खैरात बांट रहे हों। हाल ही में उन्होंने तमाम ऐसे लोगों को लाल बत्ती दे डाली, जो उसके लिये उपयुक्त नहीं थे। सबसे बड़ा उदाहरण लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रसंघ महामंत्री राम सिंह राणा हैं। जिन्हें एलयू से इसलिये निलंबित कर दिया गया था, क्योंकि उन्होंने फर्जीवाड़ा करके पीएचडी में इनरोलमेंट करवा लिया था। उनके खिलाफ जांच अभी जारी है। यही राम सिंह राणा इस समय सार्वजनिक उद्ययम विभाग के सलाहकार नियुक्ति किये गये हैं। एक दिन था जब राम सिंह राणा द्वारा कुलपति व अन्य शिक्षकों से अभद्रता के मामले आना आम बात हुआ करती थी।

भ्रष्ट आईएएस को लाल बत्ती
अखिलेश यादव ने हाल ही में पूर्व आईएएस तपेंद्र प्रसाद को प्रशासनिक सुधार विभाग का सलाहकार नियुक्ति किया और लाल बत्ती दे दी। तपेंद्र यूपीएसआईडीसी घोटाले के आरोपी हैं। जरा सोचिये एक भ्रष्ट अधिकारी राज्यमंत्री बनकर कितना प्रशासनिक सुधार करेगा?

सीएम का पॉवरफुल न होना
ऐसा नहीं है कि अखिलेश अच्छी सरकार नहीं चलाना चाहते हैं लेकिन समस्या यह है कि आज उप्र की सरकार सीएम नहीं, यादव परिवार चला रहा हैं। इसीलिए फैसले लेने से पहले अखिलेश को सारी बातों का ध्यान रखना पड़ता है। कोई भी सरकार यदि उसमें सरकार का मुखिया आजाद होकर अपने आप निर्णय नहीं लेता है वहीं सरकारी मशीनरी इसी तरह पंगु हो जाती है, इसका ताजा उदाहरण है मनमोहन सिंह और अखिलेश। उप्र में लोगों ने मजबूत नेतृत्व की सरकारें जैसे वीर बहादुर सिंह, नारायण दत्त तिवारी, मुलायम सिंह, कल्याण सिंह (पूर्ण बहुमत वाली) और मायावती की सरकारें देखी है। जो निर्णय लेने के बाद कभी पीछे नहीं हटती थी।

मंत्रिमंडल पर कंट्रोल न होना
अखिलेश का अपने मंत्रिमंडल पर बिलकुल भी नियंत्रण नहीं रह गया हैं। आजम खां, शिवपाल यादव और ऐसे ही कई अन्य नेता जो सीधे मुलायम सिंह के संपर्क में हैं वो अखिलेश से नहीं मुलायम से सीधे निर्देश लेते हैं। सूत्र बताते है कि कई बार तो निर्णय लागू होने के बाद सीएम को अपने सचिवों के माध्यम से तब पता चलता है जब फाइल साइन होने के लिए सीएम के पास आती हैं।

सपा के कार्यकर्ता देख रहे प्रशासन
इस बात को साबित करने के लिये मैं अपनी आंखों देखी का जिक्र करना चाहूंगा। बात जून माह की है, जब लखनऊ के सिकंदरबाद चौराहे के पास दो 2 पुलिसइंस्पेक्टर कुछ कॉन्स्टेबलों के साथ चेकिंग कर रहे थे। तभी एक स्कॉर्पियो आयी जिस पर सपा का झंडा लगा था। स्कॉर्पियो से एक सपा के वरिष्ठ कार्यकर्ता ने पूछा, 'सब ठीक चल रहा है न', इंस्पेक्टर ने जवाब दिया, सब आपकी कृपा है। यह यथार्थ है और इसे खुद पुलिसवाले व अन्य सरकारी अधिकारी व कर्मचारी स्वीकार भी करते हैं।

क्राइम और दंगों का का बढ़ता ग्राफ
यूपी का क्राइम और दंगों का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है और अखिलेश यादव उस पर लगाम कसने में नाकाम साबित हो रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण पुलिस की हीलाहवाली भी है, क्योंकि जब राजधानी लखनऊ में आप बिना हेलमेट वाहन चला सकते हैं, तो बाकी शहरों का क्या कहना। क्राइम रोकना है, तो सबसे पहले यातायात व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त करना होगा, ताकि अपराधी मौका-ए-वारदात से आसानी से भाग न सके।












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