सरफ़रोशी की तमन्ना सिर्फ एक तमन्ना बनकर रह गयी…

Ram Prasad Bismil
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है

जी हाँ ये शब्द थे उस महान क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल के जिन्होंने भारत माता को आज़ाद कराने के लिए हंसते- हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दी, मगर आगे बढ़ने से पहले वो कुछ बातें जिन्होंने मुझे अन्दर से झकझोर कर रख दिया।

अभी सुबह सुबह आदतन अपना ट्वीटर और फेसबुक खोला केवल ये जानने के लिए कि- चलो भाई देखा जाए कि हममें से कितने लोगों को याद है की आज भारत के एक लाल और एक महान क्रांतिकारी का बर्थ-डे है। शुरुआत करता हूं फेसबुक से जैसा कि मुझे आशा थी फेसबुक पे वही हुआ, देश के सारे बुद्धिजीवी इस बात पर मगजमारी कर रहे थे की आखिर क्यों आडवाणी जी ने पार्टी से इस्तीफा दिया, तो वहीं दूसरी तरफ कुछ भाई बंधू ऐसे भी थे जो इस बात पर चर्चा कर रहे थे कि गुजरात में विकास का परचम लहराने वाले मोदी अगर देश के पीएम बन गए तो क्या होगा? ग्लोबली हमारा भारत क्या दोबारा एक विश्व शक्ति के रूप में फल फूल पायगा।

सब से परे देश का युवा जो की दिगभ्रमित है वो इस बात पर चर्चा कर रहा था कि - यार नया फ़ोन लेना है कौन सा लिया जाए एंड्राइड या विंडो, फिल्म ये जवानी है दीवानी में किसने बेहतर अभिनय किया रणबीर या दीपिका, मैंने अपना फेसबुक बंद किया और रुख किया ट्विटर का - वहां के तो कहने ही क्या आई फ़ोन 4 से लेकर हिंदी डायलौग्स इन इंग्लिश, आडवाणी, व्हाट आई वांट जैसे कई चीजें ट्रेंड में थी कुछ नहीं ट्रेंड में था तो वो था श्री राम प्रसाद बिस्मिल जी का नाम, उनके नाम का तो मुझे कोई ट्रेंड ट्वीटर पर दिखा ही नहीं।

कैसे अंजाम दिया बिस्मिल ने मैनपुरी षडयन्त्र

सन 1915 में भाई परमानन्द की फाँसी का समाचार सुनकर रामप्रसाद ब्रिटिश साम्राज्य को समूल नष्ट करने की प्रतिज्ञा कर चुके थे, 1916 में एक पुस्तक छपकर आ चुकी थी, कुछ नवयुवक उनसे जुड़ चुके थे, स्वामी सोमदेव का आशीर्वाद भी उन्हें प्राप्त हो चुका था; अब तलाश थी तो एक संगठन की जो उन्होंने पं० गेंदालाल दीक्षित के मार्गदर्शन में मातृवेदी के नाम से खुद खड़ा कर लिया था।

इस संगठन की ओर से एक इश्तिहार और एक प्रतिज्ञा भी प्रकाशित की गयी। दल के लिये धन एकत्र करने के उद्देश्य से रामप्रसाद ने, जो अब तक 'बिस्मिल' के नाम से प्रसिद्ध हो चुके थे, जून 1918 में दो तथा सितम्बर 1918 में एक - कुल मिलाकर तीन डकैती भी डालीं, जिससे पुलिस सतर्क होकर इन युवकों की खोज में जगह-जगह छापे डाल रही थी। 26से 31 दिसम्बर1918 तक दिल्ली में लाल किले के सामने हुए कांग्रेस अधिवेशन में इस संगठन के नवयुवकों ने चिल्ला-चिल्ला कर जैसे ही पुस्तकें बेचना शुरू किया कि पुलिस ने छापा डाला किन्तु बिस्मिल की सूझ बूझ से सभी पुस्तकें बच गयीं।

मैनपुरी षडयंत्र में शाहजहाँपुर से 6 युवक शामिल हुए थे जिनके लीडर रामप्रसाद बिस्मिल थे किन्तु वे पुलिस के हाथ नहीं आये, तत्काल फरार हो गये। 1 नवम्बर 1919 को मजिस्ट्रेट बी० एस० क्रिस ने मैनपुरी षडयंत्र का फैसला सुना दिया। जिन-जिन को सजायें हुईं उनमें मुकुन्दीलाल के अलावा सभी को फरवरी 1920 में आम माफी के ऐलान में छोड़ दिया गया। बिस्मिल पूरे 2 वर्ष भूमिगत रहे।

काकोरी कांड

शाहजहाँपुर में अपने घर हुई एक इमर्जेन्सी मीटिंग में बिस्मिल ने अपने अन्य साथियों के साथ अंग्रेजों का खजाना ले जा रही एक ट्रेन को लूटने का प्लान बनाया। 9 अगस्त 1925 को शाहजहाँपुर रेलवे स्टेशन से बिस्मिल के नेतृत्व में कुल 10 लोग, जिनमें अशफाक उल्ला खाँ, राजेन्द्र लाहिडी, चन्द्रशेखर आजाद, शचीन्द्रनाथ बख्शी, मन्मथनाथ गुप्त, मुकुन्दी लाल, केशव चक्रवर्ती (छद्मनाम), मुरारी शर्मा (वास्तविक नाम मुरारी लाल गुप्त) तथा बनवारीलाल शामिल थे, 8 डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर रेलगाड़ी में सवार हुए।

इन सबके पास पिस्तौलों के अतिरिक्त जर्मनी के बने चार माउजर भी थे जिनके बट में कुन्दा लगा लेने से वह छोटी आटोमेटिक राइफल की तरह लगता था और सामने वाले के मन में भय पैदा कर देता था। इन माउजरों की मारक क्षमता भी अधिक होती थी उन दिनों ये माउजर आज की ए० के० - 47 रायफल की तरह चर्चित थे। लखनऊ से पहले काकोरी रेलवे स्टेशन पर रुक कर जैसे ही गाड़ी आगे बढी, क्रान्तिकारियों ने चेन खींचकर उसे रोक लिया और गार्ड के डिब्बे से सरकारी खजाने का बक्सा नीचे गिरा दिया।

ब्रिटिश सरकार ने इस ट्रेन डकैती को गम्भीरता से लिया और डी० आई० जी० के सहायक (सी० आई० डी० इंस्पेक्टर) मिस्टर आर० ए० हार्टन के नेतृत्व में स्कॉटलैण्ड की सबसे तेज तर्रार पुलिस को इसकी जाँच का काम सौंप दिया। बाद में इन सभी लोगों की गिरफ्तारी हुई और अंग्रजी हुकूमत ने भारत के इस महान लाल को ये कहते हुए 19 दिसम्बर 1927 को फांसी पर चढ़ा दिया की ये और इनके अन्य साथी अंग्रेजी हुकूमत के लिए बहुत बड़ा खतरा हैं।
चलिए अब मुद्दे पर आया जाये, मित्रों अब एक छोटा सा सवाल मुझे परेशान कर रहा है। क्या हमारी देशभक्ति फेसबुक, ट्वीटर, मोदी आडवाणी तक ही सीमित है या असल में हम अपने आपको धोखा दे रहे हैं।

साथ ही मेरा सवाल देश की मीडिया से भी है कि आखिर क्यों नहीं वो हमें हमारे इतिहास से परिचित करा रही है। जरा सोचिये आखिर आज क्या गुज़र रही होगी उस परिवार पर (बिस्मिल का परिवार ) जब उन्होंने ये देखा होगा कि कैसे लोग इस महान इंसान की कुर्बानी को भूल गए हैं।

मित्रों एक बाद याद रखिये हमारा अस्तित्त्व तब तक ही है जब तक हम अपने इतिहास हो याद रखे हुए हैं जिस दिन हम अपने इतिहास हो भूले उस दिन सब कुछ नष्ट हो जायगा। आप अपने बच्चों को जितना हो सके इन लोगों से परिचित कराइए कहीं ऐसा न हो कुछ वर्षों बाद लोग ये कहें कौन भगत सिंह कौन बिस्मिल कहां का अशफाक़ उल्लाह खान

जय हिन्द जय भारत वन्देमातरम

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