नक्सलवाद: सेना के अलावा अब कोई विकल्प नहीं
[नवीन निगम] छत्तीसगढ़ के बस्तर में शनिवार की शाम हुए नक्सली हमले में 3 कांग्रेसी नेताओं समेत 27 लोगों की नृशंस हत्या कर दी गई। इस हमले ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कब तक देश नक्सलियों को बर्दाश्त करेगा। भारत में नक्सली हिंसा की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुई जिससे इस आंदोलन को इसका नाम मिला हालांकि इस विद्रोह को तो पुलिस ने कुचल दिया लेकिन उसके बाद के दशकों में मध्य और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में नक्सली गुटों का प्रभाव बढ़ता रहा। कल के हमले के बाद नक्सली समस्या पर देश में फिर बहस का दौर शुरू हो गया हैं। दरअसल नक्सली समस्या का हल इसलिए नहीं हो पा रहा है क्योंकि केंद्र और राज्य सरकारों को वोट की भी चिंता रहती है और यही वोट इन्हें समस्या का हल नहीं करने दे रहा है।
अभी पिछलों दिनों उप्र के मंत्री आजम खां से अमेरिका में बदसलूकी हुई, काफी हंगामा हुआ विदेश मंत्रालय सक्रिय हुआ लेकिन क्या हुआ, अमेरिका ने एक शब्द भी नहीं बोला क्यों, क्योंकि सुरक्षा जैसे विषयों पर वह राजनीति नहीं करते है। अगर अफगानिस्तान से लादेन गायब हो गया तो वह मरा समझकर बैठ नहीं गए वह उसे 10 साल तक खोजते रहे और पाक में घुसकर मारा। इन दो उदाहरणों से मेरा मतलब नक्सली समस्या से कठोरता से निपटने का नहीं हैं बल्कि एक सर्वमान्य नीति पर चलना है। हमला हुआ नहीं कि अजीत जोगी, रमन सिंह को कोसकर वोट बटोरने में लग गए कि सुरक्षा नहीं थी जिन नक्सलियों ने 76 जवान मार डाले वो अगर 20 सुरक्षा के जवान और होते तो उन्हे भी मारकर दम लेते।

मेरे एक मित्र भोमेंद्र शुक्ल जो छत्तीसगढ़ में कई साल पत्रकारिता से जुड़े रहे, ने फेसबुक ठीक लिखा...मैं बस्तर में 8 वर्ष रहा हूं। अपने गुरु और प्रसिद्ध अधिवक्ता डा. प्रताप नारायण अग्रवाल के साथ लगातार तीन वर्षों तक नक्सलियों पर लिखता-पढ़ता-सुनता और समझता रहा। एक दिन फोन पर वरिष्ठ कांग्रेसी वीसी शुक्ला से डा. अग्रवाल ने कहा था। भाई साहब, नक्सलियों को मत मारों, उन नौकरशाहों, धनपशुओं, नेताओं और ठेकेदारों चाहे वे मीडिया से जुड़े भी क्यों न हों, उन्हें गोलियों से सड़क पर भुनवा दो, नक्सली आंदोलन का खात्मा स्वयं हो जाएगा। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।
यहां अपने मित्र का इस कमेंट को लिखने का एक ही मकसद था नक्सली कोई कश्मीरी आतंकवादी नहीं है जो दूसरे देश से हमारे यहां भेजे जाते हैं, न ही वह इस देश से अलग होकर दूसरे मुल्क से मिलने की बात करते है। वह तो कथित अन्याय को बंद करने की बात करते हैं और अब इस अन्याय के खिलाफ लड़ते हुए वह भी अपने लोगों से दूर होते जा रहे है।
भारत सरकार नक्सली आंदोलन पर सालों से एक निर्णय नहीं ले पा रही है, क्या वह सेना को इसकी कमान सौंप दे या पैरामिलेट्री फोर्स ही लगी रहे। सरकार को इस मामले में कश्मीर के उदाहरण से सबक लेना चाहिए। कश्मीर में जब सेना ने कार्य संभाला तो उन्होंने न केवल कश्मीर में आतंक पर लगाम लगाई बल्कि आतंक से प्रभावित क्षेत्रों में उन्होंने लोगों को दवाएं बांटी, लोगों का इलाज किया। स्थानीय स्तर का कोई नेता वह चाहे नेशनल कांफ्रेस का हो या हुर्रियत का, सेना के जवान उसकी बात नहीं अपने बिग्रेडियर की बात ही सुनते थे। इसी का परिणाम यह निकला कि छोटी-छोटी बातों से सेना ने लोगों का दिल जीतना शुरू कर दिया जिसने स्थानीय लोगों को आतंकवादियों से दूर किया।
ज्ञात हो कि जब पाक ने अफगानिस्तान से कई विदेशी आतंकी भेजे और उन्होंने कश्मीर में कई लड़कियों को अपनी हवस का शिकार बनाया, तो सेना ने ऐसे समय में कश्मीर के लोगों की भरपूर मदद की और आतंकवादियों के खिलाफ पूरी ताकत लगा दी। इजराइल से आतंक पर काबू पाने की नई तकनीक का इस्तेमाल सेना ने कश्मीर में बखूबी किया। जैसे वारदात के बाद आतंकियों से सीधी मुठभेड़ न करके उन्हें घेर कर आत्मसमर्पण कराना। मकान पर कब्जा किए आतंकियों को बाहर निकालने के लिए नागरिकों को निकालकर मकान में आग लगा देना। इन बातों का जिक्र मैं यहां इसलिए कर रहा हूं क्योंकि नक्सली समस्या से निपटने के लिए शक्ति और सेवा दोनों का भाव ईमानदारी के साथ होना आवश्यक हैं और भारतीय सेना कश्मीर में यह काम बखूबी कर चुकी है। नक्सल प्रभावित इलाकों में पैरा मिलेट्री जब कोई योजना बनाकर नक्सलियों को कुचलना शुरू करती है तो खबरें निकलती है कि आम लोग मारे जा रहे हैं।
दबाव पड़ता है तो नक्सली वार्ता की बात करके नेताओं में यश लेने की होड़ लगवा देते हैं परिणाम स्वरूप आपरेशन बंद कर दिए जाते है और नक्सली फिर ताकतवर होकर ऊभर आते हैं। सेना के विकल्प में यह दोनों ही बाते मुश्किल होती है क्योंकि सेना लम्बा अभियान चलाती है और उसके पास संसाधनों की भी कमी नहीं है। अब इसी मामले को ले, अगर सुकुमा इलाके में सेना आपरेशन चला रही होती तो वह कांग्रेस को यह रैली करने पर अपनी साफ राय बता देती कि खतरा है।
इसके बाद भी यदि कांग्रेस वहां आयोजन करती तो उसका नेटवर्क नक्सली हमले के बारे में पता लगा लेता। जैसे कोई मुखबिर जो ऐसी जानकारी देता और उसे नक्सलियों से डर लगता तो सेना उसे नौकरी दे देती। क्योंकि उसके पास एक बड़ा नेटवर्क हैं। अब पैरामिलेट्री जिसके हर महीने कंमाडर बदलते रहते है उसे कौन मुखबिर सूचना देगा और ऐसे मामलों में मुखबिर की सूचना ही सबसे बड़ा सहारा होती है। अब भी समय है कि भारत में सभी सियासी पार्टिंयां मिलकर एक सर्वमान्य नीति बनाए और इसपूरे इलाके को सैनिक छावनी में बदल दे। तभी आज से 8-10 साल बाद इस समस्या से निपटा जा सकता है।












Click it and Unblock the Notifications