'बस्तर के टाइगर' महेंद्र कर्मा से डरते थे नक्सली
रायपुर। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की रैली पर 100 से ज्यादा नक्सलियों के हमले में वरिष्ठ नेता महेंद्र कर्मा समेत 27 लोगों की हत्या कर दी गई। इस हमले में नक्सलियों का सबसे बड़ा निशाना महेंद्र कर्मा थे। नक्सलियों ने सबसे पहले काफिला रोका और महेंद्र कर्मा को कार से बाहर निकाला। उन्हें थोड़ी दूर पर ले गये और गोलियों से भून डाला।
आखिर ऐसा क्या कारण था कि वे नक्सलियों के निशाने पर थे? यह सवाल देश भर में घूम रहा है। तो चलिये ले चलते हैं महेंद्र कर्मा के जीनव सफर पर जहां इस सवाल का जवाब जरूर मिलेगा। महेंद्र कर्मा छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे और 2004 से 2008 तक वो नेता विपक्ष थे। कर्मा की इस भूमिका से नक्सलियों को कोई ऐतराज नहीं था, लेकिन नक्सलियों के खिलाफ उनका अभियान हमेशा खटकता रहता था। असल में 2005 में महेंद्र कर्मा ने सलवा जुडूम की स्थापना की।

महेंद्र कर्मा बस्तर जिले के रहने वाले आदिवासी नेता थे। उनका जन्म दंतेवाड़ा के दाराबोडा कर्मा में हुआ था। बस्तर में पढ़ाई की और फिर जगदलपुर से ग्रेजुएशन। उन्होंने अपना राजनीतिक करियर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया से शुरू किया। वे बस्तर से लोकसभा चुनाव और दंतेवाड़ा से विधानसभा चुनाव जीते। वे छत्तीसगढ़ के औद्योगिक विकास मंत्री रहे।
1991 में जन जागरण अभियान चलाकर नक्सलियों के खिलाफ अभियान शुरू किया। देखते ही देखते उन्होंने सलवा जुडूम की स्थापना की और तभी से वो नक्सलियों के निशाने पर आ गये और उन्हें जेड-प्लस सुरक्षा दी गई। कर्मा के साथ छत्तीसगढ़ के आम लोग जुड़ते चले गये और संगठन मजबूत होता गया। संगठन को तब और मजबूती मिल गई जब राज्य सरकार ने इसे स्पेशल पुलिस ऑफीसर्स के रूप में मान्यता दे दी। लेकिन 2008 में सलवा जुडूम के कार्यकर्ताओं और नक्सलियों के बीच खूनी मुठभेड़ हुई, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने सलवा जुडूम की मान्यता खत्म करने के निर्देश दे दिये। धीरे-धीरे सलवा जुडूम का अस्तित्व फीका पड़ने लगा और बस्तर का बाघ पूरी तरह कांग्रेस की पार्टी गतिविधियों में व्यस्त हो गया।
लेकिन नक्सलियों का गुस्सा कम नहीं हुआ था। 8 नवंबर 2012 को नक्सलियों ने लैंडमाइन्स बिछा कर जानलेवा हमला किया गया तब वो बच गये, लेकिन 26 मई 2013 को जगदलपुर में हुए हमले में किसमत ने उनका साथ नहीं दिया और नक्सलियों ने बस्तर के बाघ को गोलियों से भून डाला।












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