कर्नाटक के बागी येदियुरप्पा का करियर खत्म!
[नवीन निगम] कर्नाटक चुनाव का परिणाम आ गया, सबको मालूम था कांग्रेस सरकार बनाएगी। भाजपा ने कुछ ज्यादा ही खराब प्रदर्शन किया लेकिन भाजपा के खराब प्रदर्शन के पीछे वहीं व्यक्ति था जो उसे यहां तक लेकर आया था, जीं हां हम बात कर रहे है कर्नाटक के सबसे शक्तिशाली नेता येदियुरप्पा की।
यहां मैं उन्हें शक्तिशाली इसलिए लिख रहा हूं कि आज कांग्रेस और भाजपा में कोई ऐसा नेता नहीं है जो पार्टी से बाहर होने के बाद भी इतनी शक्ति रखता हो कि वो अकेले दम पर 12 से 15 सीटें ले आए और अपनी मूल पार्टी के वोटों को बुरी तरह काटे। येदयुरप्पा ने अब तक वही किया जो एक विद्रोही सेनापति करता है, लेकिन येदयुरप्पा का संकट अब शुरू होता है ऐसे बाहुबली क्षत्रप विद्रोह करने के बाद पहले चुनाव तक तो छाए रहते है लेकिन सत्ता के अभाव में यह पार्टी नहीं खड़ी कर पाते
और गुमनामी के अंधेरे में खो जाते है।

जैसे गुजरात में केशुभाई पटेल, उप्र में कल्याण सिंह, झारखंड में बाबूलाल मरांडी, हिमाचल में सुखराम, हरियाणा में बंसीलाल और भजनलाल, तमिलनाडु में मूपनार। यह सब ऐसे नेता थे जिनके नाम के पीछे इनकी पार्टियां चला करती थी लेकिन इसी दंभ में जब यह अपने को पार्टी से बड़ा समझने लगे और विद्रोह कर बैठे तो पहले और उसके बाद के कुछ चुनाव तक यह पार्टी का तो नुकसान करते रहे लेकिन अंत में अपना ही नुकसान करा बैठे।
इसमें बस मुलायम सिंह एक अपवाद है जो जनता दल से बाहर आने के बाद उप्र में समाजवादी पार्टी बनाने के बाद उसे प्रदेश में स्थापित भी कर सके और आज वहीं पार्टी सत्ता में है। यहां मैं मुलायम सिंह यादव का उदाहरण इसलिए दे रहा हूं क्योंकि जब भाजपा मंदिर मुद्दे पर अपनी सरकार कुर्बान करने के बाद बड़े भरोसे से बैठी थी कि अगली सरकार वहीं बनाएंगी तो उसे मुलायम ने बसपा के साथ समझौता करके बड़ी चतुराई से रोका और बाद में भाजपा के बसपा के पास जाने पर प्रदेश में अपने को नंबर एक साबित किया। नहीं तो मुलायम सिंह भी ऊपर दिए गए नामों में से एक होते।
मुलायम सिंह यादव का उदाहरण मैंने इसलिए भी दिया क्योंकि जब मुलायम सिंह यादव 1993 में सरकार बनाने के लिए कांशीराम के पास समर्थन लेने के लिए जा रहे थे तो उनके आदर्श जनेश्वर मिश्र ने उन्हें रोका था यह कहकर कि किसके पास जा रहे हो कांशीराम जी को जानते नहीं हो, तो मुलायम सिंह का जवाब था इस समय सत्ता हासिल नहीं कि तो पार्टी भी नहीं खड़ी कर पाउंगा। येदयुरप्पा को यदि अपने को कर्नाटक में बनाए रखना है तो या तो वह भाजपा में लौट जाए या फिर सत्ता में शामिल हो जाए नहीं तो अगले चुनाव तक वह भी कर्नाटक की राजनीति में खो जाएंगे और भाजपा के दूसरे कल्याण सिंह कहलाएंगे।












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