बढ़ रही हैं भाजपा और बसपा की नजदीकियां

लखनऊ (नवीन निगम)। कहते हैं दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, उत्तर प्रदेश में लग रहा है यह कहावत अब सटीक बैठने वाली हैं। भाजपा के एक आला नेता जिनकी पकड़ दिल्ली तक है, से जब पूछा गया कि अब आपके निशाने पर मायावती नहीं रहती। सवाल सुनकर उन्होंने मुस्कराते हुए जवाब दिया अब वो हमारी पहली प्राथमिकता नहीं हैं। मैंने जोर देकर फिर पूछा तो उन्होंने कहा कि नाम मत ओपन करिए तो राज की बात बताऊं। मैंने हामी भरी तो बोले आलाकमान से इशारा है कि मायावती के खिलाफ तभी बोला जाए जब बहुत जरूरी हो।

भाजपा नेता के मुताबिक पार्टी में जिला स्तर पर नेताओं को बसपा के खिलाफ बोलने की पूरी छूट है, लेकिन प्रदेश व राष्‍ट्रीय स्‍तर पर नहीं। इतना कहने के बाद उन्होंने आगे कुछ भी बोलने से मना कर दिया। मैंने पूछा इस बात का क्या मतलब है तो वह बोले आप खुद समझ लीजिए। उनकी जानकारी को जब मैंने टटोलना शुरू किया तो भाजपा के कई अन्य नेता भी इस बात पर मुस्कुरा दिए।

Mayawati, Rajnath

मेरा मन फिर भी नहीं माना तो मैंने मायावती के पिछले दिनों दिनों दिए गए बयानों पर गौर करना शुरू किया। जिसमें भाजपा के खिलाफ कोई भी बड़ा बयान नहीं था। वही रटे रटाए शब्द थे, यहां तक की प्रमोशन में आरक्षण पर भी मायावती कांग्रेस के खिलाफ तो मुखर होकर बोली थी, लेकिन भाजपा जिसके हंगामें के कारण विधेयक पर चर्चा नहीं हो सकी थी उस के खिलाफ नहीं बोली। काफी दिनों से उत्तर प्रदेश में भाजपा के किसी भी बड़े नेता ने मायावती के खिलाफ कुछ नहीं बोला।

अफजल पर चुप क्‍यों रही सपा

पिछले दिनों अफजल गुरू की फांसी पर सपा ने कोई प्रतिक्रिया न देकर साफ कर दिया कि मुसलमानों के लिए संवेदनशील इस मुद्दे पर बयान देकर वह कोई जोखिम मोल नहीं लेना चाहती, इसके विपरीत मायावती ने अफजल गुरू की फांसी का समर्थन कर जता दिया कि वो अब मान चुकी हैं कि प्रदेश में मुस्लिम वोट सपा के खाते में मजबूती से जा चुका है और अब उनके पास दलित वोट ही बचा है।

मायावती को भी पता है कि 2007 में उनकी पार्टी इसलिए चुनाव में विजयी हो पाई थी, क्योंकि तब दलित वोट बैंक के अलावा उन्हें कुछ मुस्लिम और बड़ी संख्या में भाजपा से नाराज स्वर्ण हिंदू खासतौर पर बाह्मणों का वोट मिला था, मायावती फिर से उस गणित को आजमाना चाहती थी लेकिन भाजपा के मंदिर एंजेडे पर वापस जाने से अब उन्हें स्वर्ण हिंदू वोट मिलने में मुश्किल दिखाई दे रही है इसीलिए वह भाजपा से अपने रिश्तों को उस हद तक नहीं बिगाडऩा चाहती है जहां समझौते की बात करने की गुंजाइश ही न बचे।

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