क्‍या मोदी की आंधी को रोक पायेंगे राहुल गांधी?

Rahul Gandhi, Narendra Modi
अहमदाबाद। चलो भैया। राहुल गांधी के हाथों में सौंप ही दी गई कांग्रेस की नैया। डेढ़ साल से कम वक्त दिया गया है इन महाशय को अपनी काबीलियत का परचम दिखाने के लिए। वैसे देखा जाए, तो राहुल गांधी के पास उतना वक्त भी नहीं है। उनके पास एक महीने से भी कम समय है। वैसे दोनों ही अवधियों में उनका मुकाबला तो एक ही व्यक्ति के साथ हो सकता है और वो हैं नरेन्द्र मोदी।

एक के पास है पारिवारिक विरासत, तो दूसरे के पास है राजनीतिक विरासत। हाँ, राहुल चाहें, तो मोदी की चुनौती गुजरात में ही समाप्त कर सकते हैं। यदि मोदी को राहुल गुजरात में रोक लें, तो वे 2014 में मोदी की चुनौती से बच सकते हैं।

जी हाँ। हमारा इशारा बिल्कुल गुजरात विधानसभा चुनाव 2012 की ओर है। राहुल गांधी को वैसे तो कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव 2014 की समन्वय समिति की कमान सौंपी है, लेकिन उस कमान की डोर गुजरात से अपने आप ही बंध गई है। राहुल गांधी के समक्ष वैसे तो लक्ष्य 2014 का है, परंतु इससे पहले उन्हें लक्ष्य 2012 हासिल करने की चुनौती है।

नेतृत्व की कसौटी

जाहिर सी बात है राहुल गांधी कांग्रेस की लोकसभा चुनाव समन्वय समिति के अध्यक्ष बने हैं और ऐसे में उनकी लोकप्रियता या स्वीकार्यता की क्षण-क्षण और हर राज्य में परीक्षा होनी है। राहुल को पहली परीक्षा गुजरात में ही देनी है। हालाँकि सभी जानते हैं कि ऐसी किसी समिति के अध्यक्ष बने बगैर भी राहुल का नेतृत्व अक्सर कसौटी पर रहता ही आया है, क्योंकि 2004 में प्रधानमंत्री पद कथित रूप से त्याग चुकीं सोनिया गांधी के संभवतः भविष्य में प्रधानमंत्री बनने की कोई संभावना नहीं है और कम से कम कांग्रेस पार्टी तो अब अगले प्रधानमंत्री के तौर पर राहुल को ही देखती है। ऐसे में राहुल लगातार कसौटी पर हैं और बने रहेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है। बिना किसी पद वाली कसौटी में वे फेल हुए थे। उत्तर प्रदेश चुनाव कहाँ कोई भूला है।

गुजरात का सीधा असर

अब तो उनके पास कांग्रेस लोकसभा चुनाव समन्वय समिति के अध्यक्ष पद की कमान है। इस कमान की डोर अपने आप ही गुजरात से इसलिए बंध गई है, क्योंकि गुजरात में 13 और 17 दिसम्बर को विधानसभा चुनाव है और लक्ष्य 2014 में राहुल के समक्ष जो चुनौती आने वाली है, वो भी गुजरात से ही आने वाली है। यदि इस समिति में गुजरात कांग्रेस के दो नेताओं को शामिल किया गया है, तो इसके पीछे सोची-समझी रणनीति यही है कि गुजरात में विधानसभा चुनाव हैं और कांग्रेस भी जानती है कि भले ही वह गुजरात चुनाव परिणामों को राहुल के नेतृत्व से जोड़े या ना जोड़े, लेकिन परिणाम अपने आप राहुल से जुड़े बिना नहीं रहेंगे।

मोदी की आंधी बनाम राहुल गांधी

राहुल के समक्ष 2014 में सबसे मजबूत चुनौती के रूप में नरेन्द्र मोदी ही आने वाले हैं। लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस की ओर से राहुल का नाम तय हो जाने से इतना तो स्पष्ट है कि चुनाव मैदान में एक तरफ का नेता तो तय हो चुका है। बात है दूसरे तरफ के नेता की यानी भाजपा के नेता की। वैसे भाजपा में नाम तो कई लिए जा रहे हैं, लेकिन सबकी नजर गुजरात विधानसभा चुनाव पर है।

मोदी यदि यहाँ जीत दर्ज करते हैं, तो यह तय माना जा रहा है कि मोदी भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में सबसे ऊपर आ जाएँगे। वैसे भी मोदी किसी पद के योग्य बनने के लिए पार्टी के मोहताज नहीं रहा करते। वे कहते तो अक्सर हैं कि पार्टी जो कहेगी, वही करेंगे, लेकिन उनकी कार्यशैली जनोन्मुखी है। वे जानते हैं कि लोकतंत्र में जनता ही सबसे ऊपर होती है। यदि गुजरात की जनता ने मुहर लगा दी, तो फिर पार्टी भी उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने को विवश हो जाएगी। जहाँ तक देश का सवाल है, तो ज्यादातर ओपीनियन पोल में मोदी को देश के सर्वश्रेष्ठ नेता के रूप में पसंद करती रही है।

एक माह से कम समय

अब इन सारे हालात में राहुल गांधी के समक्ष मोदी के रूप में गुजरात से चलने वाली आंधी को गुजरात में ही रोकने की सबसे बड़ी चुनौती है। यदि राहुल इस आंधी को रोकने में कामयाब रहे, तो फिर उनके लिए लक्ष्य 2014 थोड़ा आसान हो जाएगा। वैसे मोदी के अलावा भी राहुल के समक्ष चुनौतियाँ कम नहीं हैं, लेकिन वे सारी चुनौतियाँ जैसे अखिलेश यादव, करुणा निधि, ममता बनर्जी या इसी तरह के क्षेत्रीय नेता केवल अपने राज्यों तक ही चुनौती हैं। उनसे तो राहुल गठबंधन की राजनीति कर निपट ही लेंगे। ऐसे में मोदी को साधने और मात देने के लिए राहुल के पास एक माह से भी कम समय है।

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