बंधना-बुधिया के घर क्‍यों नहीं रात गुजारते राहुल गांधी?

Poor Bundelkhand families never get benefited
बांदा। बुंदेलखंड को लेकर केंद्र और यूपी सरकार की तमाम योजनाएं तब फेल हो जाती हैं, जब हम जमीनी स्‍तर पर जाकर देखते हैं। राहुल गांधी तमाम दलितों के घरों में रात गुज़ार चुके हैं, क्‍या कभी बुंदेलखंड के गरीबों पर नज़र डाली है। यूपी के सीएम अखिलेश तो जैसे बुंदेलखंड को यूपी का मानते ही नहीं हैं।

पास में फूटी कौड़ी भी नहीं है, डेढ़ साल की बच्ची भूख से तड़प रही है। पर बेचारा यह दम्पति क्या करे? पति पैर से विकलांग है तो पत्नी की दोनों आंखे नहीं है। दोनों में अब कुछ काम करने की कूबत भी तो नहीं रह गई, लेकिन जिन्दा तो हैं मगर भीख में मिली पड़ोसियों की रोटी खाकर। यह दास्तान है बुंदेलखंड़ के बांदा जनपद के एक गांव में रह रहे बेबस ‘बंधना' और उसकी पत्नी ‘बुधियां' की, जिसको मरा बता कर सरकारी मदद के नाम पर मिलने वाली पेंशन भी रोक दी गई है।

उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड़ में गरीबी और भुखमरी का जायजा लेना हो तो बानगी के तौर पर बांदा जनपद के करीब छह हजार आबादी वाले तेन्दुरा गांव के विकलांग दम्पति ‘बंधना और बुधिया' से रूबरू होना न भूलें। वैसे तो इस गांव में एक सैकड़ा अनुसूचित वर्ग के ऐसे परिवार हैं, जिन्हें दो वक्त की रोटी के इंतजाम के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ रही है। पर, इस गांव के अमली थोक में एक बेबस विकलांग दम्पति ‘बंधना-बुधिया' की दीन-हीन दशा रोंगटे खड़े कर देने वाली है।

बिक गई बड़ी बेटी

बंधना रैदास का बाया पैर जन्म से बेकार है, वह बांस की लाठी के सहारे ही चल सकता है। उसकी बीवी बुधिया जन्म से नेत्रहीन है, उसे दैनिक क्रिया के लिए घर से बाहर जाने तक में पति के सहारे की जरूरत है। परिवार में और अगर तीसरा कोई है तो सिर्फ इन दोनों की डेढ़ साल की बच्ची पुष्‍पा। एक और सात साल की बेटी थी जो मां-बाप का सहारा बनती उसे गांव का एक व्यक्ति दिल्ली में बेच आया, पुलिस में लिखाई रपट भी बरामद नहीं कर सकी।

समूचे पड़ोस के कामगार घरों में ताला लगा कर अपने किसानों के खेत में धान की फसल की कटाई-मड़ाई करने गए हुए हैं, मगर यह दोनों अपनी ड्योढ़ी में पड़ोसियों से मिलने वाली रोटी की आस लगाए बैठे हैं। क्योंकि उनकी डेढ़ साल की दुधमुंही बच्ची भूख से तड़प रही है। न तो इस परिवार के पास एक बिस्‍वा खेती करने वाली जमीन है और न ही रहने के लिए घर।

गृहस्थी के नाम पर फटी-पुरानी ‘कथरी' और टूटे एल्मीनियम के बर्तन दूर से ही उसकी माली हालत बयां कर रहे हैं। इन हालातों में जिन्दा रहना उसकी नियत बन चुकी है, अक्सर भूखें पेट भी रात गुजारनी पड़ती है। सरकारी मदद के नाम पर मिलने वाली विकलांग पेंशन भी बंधना को मरा बता कर रोक दी गई है। बंधना बताता है कि ‘बीस साल तक वह मामूली कर्ज के बदले एक लम्बरदार के यहां बंधुआ मजदूर रहा, जानवरों का गोबर फेंकने का काम उससे लिया जाता रहा।

क्‍या करें इस राशन कार्ड का

कुछ साल पूर्व ही पुलिस अधिकारी गांव आकर उसे मुक्त करा गए। बंधुआ मजदूरी करते समय इतनी मजबूरी नहीं थी, कम से कम जिन्दा रहने के लिए भोजन तो मिलता था। अब तो पड़ोसी न दें तो भूखे ही रात गुजरती है।' वह बताता है कि ‘उसके पास एक रुपया नहीं है, विकलांग पेंशन मिला करती थी अब दस माह से वह भी नहीं मिली। किसी कर्मचारी ने उसे मरा दिखा दिया है, जिससे पेंशन बंद कर दी गई है।

कई बार अधिकारियों के पास दौड़ चुका है उससे जिन्दा होने का प्रमाण मांगा जा रहा है। मनरेगा में काम करने का जॉब कार्ड भी बना है, लेकिन आज तक एक भी दिन काम नहीं मिला।'

वह हताश होकर कहता है कि ‘इस जिन्दगी से ऊब गया है, जहर खा कर तीनों लोग मर जाएंगे।' बंधना की मानें तो भुखमरी से ऊब कर वह गांव के हीरालाल धोबी के साथ पत्नी समेत इस आशय से दिल्ली गया कि दक्षिणी दिल्ली के प्रसिद्ध कालका मन्दिर में रुक कर भीख मांग बसर करेगा, लेकिन यहां भी दगा हुआ। इस व्यक्ति ने सात साल की उसकी बड़ी बेटी को बेच कर भाग आया।

उसने गांव लौट कर बिसंड़ा थाना में बेटी बेचने का मुकदमा लिखाया, पर अब तक न तो बेटी का पता चला और न ही आरोपी को पुलिस पकड़ सकी। थानाध्यक्ष बिसंड़ा एलआर सिंह का कहना है कि ‘पिछले साल बंधना की तहरीर पर मुकदमा लिखा गया था, जिसे विवेचना के लिए दिल्ली स्थानान्तरित कर दिया गया है।'

ग्राम प्रधान धीरेन्द्र सिंह का कहना है कि ‘बंधना के परिवार की आर्थिक हालत बेहद खराब है, मगर पंचायत के पास ऐसे परिवार की मदद का अधिकार नहीं है, रही बात मनरेगा में काम देने की तो दोनों लोग कुछ भी काम करने लायक नहीं है।' उप जिलाधिकारी (एसडीएम) अतर्रा अशोक कुमार पुष्‍कर का कहना है कि ‘बंधना रैदास को अन्त्योदय राषन कार्ड बनाया गया है, जिसमें दो रुपए प्रति किलो के हिसाब से 15 किलो गेहूं और तीन रुपए प्रति किलो के हिसाब से 20 किलो चावल यानी 90 रुपए में 35 किलोग्राम अनाज गांव की सरकारी राशन की दुकान से खरीद सकता है।' लेकिन जब बंधना के पास एक धेला नहीं है तो वह 90 रुपए का इंतजाम कैसे करे? इस पर एसडीएम कोई तरकीब नहीं बता पाए। उसका पड़ोसी बेनी रैदास बताता है कि ‘गांव के लोग तरस खाकर बंधना को रोजाना कुछ न कुछ खाने को जरूर देते हैं।'

हम सिर्फ चार सवाल करना चाहते हैं। दो कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी से और दो यूपी के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव से। राहुल कई किसानों के घरों में रातें गुज़ार चुके हैं, क्‍या बंधना जैसे गरीब के घर रात गुजारी है, या कभी गुजारेंगे? जिस मनरेगा का ढिंढोरा पीट कर वोट मांगते हैं, क्‍या जमीनी स्‍तर पर जाकर आपकने कभी उसकी असलियत देखी है? बाकी के दो सवाल अखिलेश से कि बुंदेलखंड के गरीब किसानों के लिये उनकी सरकार की आंख कब खुलेगी? केंद्र सरकार बुंदेलखंड के लिये भारी भरकम पैकेज दे चुकी है, वो पैसा कहां जा रहा है?

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