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याद रहा मनमोहन का जन्मदिन, लेकिन भगत सिंह को भूले

Bhagat Singh
बीता हुआ दिन यानी 26 सितम्बर आपको ज़रूर याद रहेगा, अब आप सोच रहे होंगे क्यों तो आपको बता दें कि इस दिन देश की दो महान हस्तियों का जन्म दिन था। एक हैं देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और दूसरे थे स्वर्गीय धर्म देव पिशोरीमल आनंद जिन्हें इस देश के लोग देव आनंद के नाम से भी जानते हैं। अखबार, टीवी, इन्टरनेट सोशल मीडिया जैसे फेसबुक और ट्विटर हर तरफ इन्ही दो लोगों की चर्चा रही। यहाँ तक की विश्व के सबसे बड़े सर्च इंजन गूगल के एक वर्ग गूगल समाचार पर भी ये दो शब्द बज़ वर्ड रहे जहां इस शब्द को लोगों द्वारा बड़ी तादाद में सर्च किया गया। ये दोनों हस्तियां हैं भी ऐसी की इन्हें सर्च किया जाना लाज़मी है।

अच्छी बात है, ये बड़े लोग हैं, बड़े लोगों का जन्मदिन खास और यादगार होना भी चाहिए। इनके जन्मदिन को याद करने का एक कारण और है इन दो हस्तियों की बदौलत बीते दिन भारत देश की चर्चा विश्व पटल पर हुई थी। जहाँ एक तरफ कला और सिने प्रेमियों ने देव साहब को उनके लाजवाब अभिनय, उनकी खास स्टाइल के लिए याद किया गया वहीं दूसरी तरफ लोगों ने देश के प्रधानमंत्री मनमोहन को अलग अलग मुद्दों पर मौन रहने के लिए याद किया। देश के कई लोगों ने जहां एक तरफ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की लम्बी आयु की कामना की वहीं देश का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी था, जिसने देश के प्रधानमंत्री को उनकी गलत नीतियों और हर मुद्दे पर शांत रहने के कारण जम कर क्रिटीसाइज भी किया।

खैर ये तो बात हो गयी कल की अब कुछ बात की जाये आज की मित्रों आज का दिन भी बड़ा ही खास है आज ही के दिन शहीद ए आज़म कहलाये जाने वाले महान क्रांतिकारी भगत सिंह का जन्म हुआ था। हममें से ऐसे बहुत से होंगे जिन्हें भगत सिंह का नाम तो याद होगा, मगर हमारे पास कहाँ इतना टाइम है की हम उनका जन्मदिन याद रख सकें। इनका जन्मदिन भूलने की एक अहम वजह भी है। इस दिन देश में कहीं भी कोई छुट्टी नहीं होती, किसी भी दफ्तर में इनको याद करते हुए सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं होते। कहीं भी मिठाई नहीं बंटती।

हमें तमाम ऊल जलूल लोगों के बर्थ डे याद रहते हैं। हम उन्हें विश भी करते हैं। मगर एक देश भक्त और भारत माता के लाल का जन्मदिन किसे याद रहा। युवाओं का देश कहे जाने वाले हिन्दुस्तान में अगर ऐसा है, तो यह दुर्भाग्यवश एक क्रांतिकारी के बलिदान का तिरस्कार और उसका अपमान ही कहा जा सकता है।

एक बात आपको और बताते चलें जो गूगल कल प्रधानमंत्री और देव साहब के नाम के सर्च और रिलेटेड सर्च से पटा पड़ा था आज भगत सिंह के विषय पर वहां सन्नाटा पसरा था वैसे भी किसी को क्या पड़ी है जो इनके बारे में जाने इनको सर्च करे। हमें आज़ादी मिल गयी है अब हम आज़ाद तो हो ही गए हैं।

आज देश में चंद ही ऐसे लोग हैं जो भगत सिंह के विषय में जानते हैं, खैर चलिए हम आपको बताते हैं की भगत सिंह कौन थे। भगत सिंह इस देश की वो शख्सियत है जिसने असीम साहस का परिचय देते हुए गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी भारत माता को ब्रिटिश हुकूमत से आज़ाद कराया। वो शख्स जिसने सेंट्रल असेम्बली में बम फेंककर अंग्रेजों को उनकी असल औकात याद दिलाई।

भगत सिंह का क्रांतिकारी जीवन

भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर, 1907 में हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। यह एक सिख परिवार था जिसने आर्य समाज के विचार को अपना लिया था। अमृतसर में 13 अप्रैल, 1919 को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिये नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी।

काकोरी काण्ड में राम प्रसाद 'बिस्मिल' सहित 4 क्रान्तिकारियों को फाँसी व 16 अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि पण्डित चन्द्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड गये और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन।

इस संगठन का उद्देश्य सेवा,त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना था। भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर 17 दिसम्बर 1928 को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे० पी० सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनकी पूरी सहायता की थी। क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने अलीपुर रोड दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार में 8 अप्रैल 1921 को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी।

भगत सिंह की फ़ाँसी

इस महान देश भक्त को 23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु संग फाँसी दे दी गई थी। गौरतलब है की जिस समय भगत सिंह को फांसी दी गयी उस समय इनकी आयु 24 साल थी।

दोस्तों मैं बस एक छोटा सा सवाल आपसे इस देश की सरकार से, देश की सबसे बड़ी पॉवर यानी इस देश के मीडिया से करना चाहता हूँ की क्या हो गया है हमारे अन्दर छुपे देश भक्ति के जज्बे को, क्या वो जज्बा केवल इण्डिया पाकिस्तान के क्रिकेट मैच तक सीमित है, कि जब हम ये देखते हैं की विरोधी टीम यानी पकिस्तान के बल्लेबाज हमारे देश के गेंदबाजों की हर बॉल पर रन ले रहें हैं, छक्के और चौके मार रहे हैं तो उस समय हमारा खून खौल उठता है उस समय हम बस ये दिखाने की कोशिश करते हैं की हमसे बड़ा देश भक्त तो कोई है ही नहीं।

भारत देश का एक आम नागरिक होने के नाते मैं केवल ये जानने का इच्छुक हूँ की आखिर असल में कहाँ मर गया है हमारे अन्दर का जज्बा क्या इस महान क्रांतिकारी की कुर्बानी का कोई महत्त्व नहीं है? क्या इन्होने व्यर्थ में ही अपनी जान दे दी?

प्रायः ये देखने को मिलता है की लोग अपने बच्चों को किसी महान हस्ती से जोड़ते है ईश्वर न करे कहीं वो दिन आ जाये जब हमारे बच्चे हमसे कहें की मां / पिताजी ये भगत सिंह ये सुखदेव ये चंद्रशेखर आज़ाद कौन हैं तो ज़रा सोचिये क्या ये इन क्रांतिकारियों का अपमान नहीं होगा।

मित्रों ये हस्तियां इस देश की असल स्टार है हमें इन्हें जरूर याद रखना चाहिए। अगर हम अपने इतिहास से दूर हो गए तो हम अपने अस्तित्त्व से दूर हो जाएंगे ये बात हमें नहीं भूलनी चाहिए। मैं फिर से ये बात कहना चाहता हूँ कि हम तभी विकसित हो सकते है जब हम अपने इतिहास को जाने और उसे याद रखे। आपको बता दें की ये लेख वन इंडिया परिवार की तरफ से शहीद ए आज़म भगत सिंह को एक श्रद्धांजलि है।

अंत में अपनी बात खत्म करते हुए मैं आपको भगत सिंह का वो शेर ज़रूर याद दिखाना चाहूँगा जो उन्होंने अपनी फांसी से कुछ समय पहले कहा था।
ज़िन्दगी तो अपने दम पर ही जी जाती है
दूसरों के कंधे पर तो सिर्फ जनाज़े उठाए जाते हैं ...!!!

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