राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस को 'बावन कोट' का डर

आपने ताश के पत्तों से खेला जाने वाला दहला पकड़ जरूर खेला होगा। अगर नहीं तो दूसरों को खेलते जरूर देखा होगा। अगर ट्रम्प यानी तुरुप घोषित करने वाली टीम हारती है, तो उस पर 52 कोट चढ़ जाते हैं। यह 52 कोट उस टीम की सबसे बड़ी हार होती है। ऐसा ही हाल कुछ सोनिया गांधी की ब्रिगेड का है। कांग्रेस को डर है अगर उसके द्वारा चुने गये प्रत्याशी पर उसी के सहयोगी दलों ने मुहर नहीं लगाई तो यह पार्टी की कभी न भुलाने वाली हार होगी।
किस बात का डर
कांग्रेस चाहती है कि वो वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी या उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी में से किसी एक को राष्ट्रपति पद के लिए प्रस्तावित करे। इस पर कांग्रेस ने ममता बनर्जी और मुलायम समेत अपने सभी सहयोगी दलों से राय-मश्विरा भी किया। लेकिन घंटे भर में ममता और मुलायम पलट गये। दोनों ने कांग्रेस के प्रत्याशियों पर मुहर लगाने से इंकार कर दिया।
कांग्रेस को इस बात का डर है कि कहीं ऐसा न हो कि जिस नाम का वो प्रस्ताव रखे, उस पर उसी के सहयोगी दल वोट न करें। ऐसी स्थिति कांग्रेस के लिए शर्मनाक होगी। खास बात यह है कि अगर मतदान के दौरान सत्ताधारी दल के प्रत्याशी पर उसी दल के नेताओं ने मुहर नहीं लगाई, तो विपक्ष नो कॉन्फिडेंस मोशन कभी भी ला सकेगी और उस स्थिति में सरकार गिरना लगभग तय हो जायेगा।
तृणमूल-कांग्रेस-सपा की नाजुक डोर
तृणमूल-कांग्रेस-सपा के बीच डोर इस समय काफी नाजुक हो चुकी है। पेट्रोल कीमतों, रेल किराये और महंगाई को लेकर ममता बनर्जी पहले ही कांग्रेस से कई बार खफा हो चुकी हैं। लिहाजा अगर कांग्रेस ममता को खुश करने में नाकाम रही तो टीएमसी और कांग्रेस के बीच डोर इस समय कभी भी टूट सकती है। मजेदार बात यह है कि कल तक कांग्रेस को इस बात की खुशी थी कि अगर ममता टूटीं तो मुलायम बैकअप के रूप में जुड़े रहेंगे, लेकिन अब वो भी बैकअप खत्म होता नजर आ रहा है। वो इसलिए क्योंकि ममता बनर्जी और मुलायम सिंह यादव दोनों इस समय काफी करीब आ चुके हैं और यह करीबी 2014 में कांग्रेस का साम्राज्य खत्म करने के लिए तीसरे मोर्चे की दस्तक दे रहा है।












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