पर्यावरण दिवस पर क्या किसी ने गंगा नदी के बारे में सोचा?

गंगा को प्रदूषण मुक्त करने की योजनाओं पर करोड़ों खर्च हो रहे हैं लेकिन गंगा स्वच्छता अभियान फिसड्डी ही साबित हो रहा है। यही नहीं नालों द्वारा गंगा का प्रदूषण जारी है। पिछली बार इलाहाबाद कुंभ के दौरान तत्कालीन मुख्य सचिव भोलानाथ तिवारी ने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए सारे नालों का पानी एक अलग गड्ढे में डलवाने की व्यवस्था की थी जिससे पूरे कुंभ के दौरान गंगा पूरी तरह से प्रदूषण मुक्त रही लेकिन यह व्यवस्था ज्यादा दिन तक बहाल नहीं रही। जिसका नतीजा यह रहा कि गंगा फिर से प्रदूषित होने लगी और इसका विकराल रूप आज सामने है।
गंगा में शुद्घ जल कम नालों और नालियों का पानी ज्यादा बढ़ गया है। नालों के कारण ऐतिहासिक गंगा घाटों परबायोलाजिकल आक्सीजन डिमान्ड (बीओडी), सोलह से 21 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुंच गयी है। नालों के पास तो बीओडी साठ से 80 मिलीग्राम प्रति लीटर है जबकि नदी के पानी में इसकी मात्रा एक अथवा दो मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक नहीं होना चाहिए। इन नालों से शहर भर का मलजल सीधे गंगा में गिर रहा है।
गंगा में बीओडी की मात्रा अधिक होने से डायरिया सहित तमाम बीमारियों से लोग ग्रसित हो रहे है। वहीं कानपुर में टनेरियों द्वारा गंगा को प्रदूषित करने का सिललिसा जारी है। पर्यावरणविदों ने इसे गहन चिन्ता का विषय बताया हहै उनका कहना है कारखानों से निकला अवशेष और रसायन गंगा में गिर रहा है। इससे गंगा जल में आक्सीजन नष्ट हो रहा है। आकसीजन की कमी से जहां जलीय जीवों के सांस लेने में कठिनाई हो रही है वहीं उनकी मौत के साथ प्रजनन क्षमता खत्म हो रही है।
नालों के अलावा वाराणसी में गंगा में प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण मणिकर्णिका एवं हरिश्चन्द्र दो श्मशान घाट हैं। हर साल इन दोनों घाटों पर 32 हजार शव जलाये जाते है। इनकी राख एवं अधजले शव गंगा में डाले जा रहे है । इसके अलावा पालतू जानवरों के शवों को भी गंगा में बहाया जा रहा है।












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