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उपद्रव: सबकुछ बस होता चला गया या परदे के पीछे कोई...

Ranvir Sena
पटना। यह शायद ही तय हो पाएगा कि बरमेश्वर मुखिया की शवयात्रा के दौरान उत्पात मचाने वाले लोग कौन थे? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या सबकुछ बस यूं ही होता चला गया या यह सब बाकायदा नियोजन का हिस्सा था और इस भयावह प्रकरण के पीछे कोई है? अगर ऐसा है, तो उसकी मंशा पर तल्ख निगाह रखनी होगी। चूंकि अभी तक यह कामयाब सी है। हां, पुलिस का संयम जरूर इसकी बड़ी बाधक रही। चूंकि उसे उकसाकर कुछ और बड़ा कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई थी। एक बात और है उत्पात शहर के कुछ इलाकों तक ही सिमटा रहा।

बेशक, पुलिस की यह एकाध सफलता रही मगर संपूर्णता में उसका, प्रशासन का और इंटेलीजेंस का रवैया फेल सा है। दरअसल, शवयात्रा के दौरान के उपद्रव ने ढेर सारे सवाल उभारे हैं। इसके लंबे रूट, स्वरूप और इसकी अनुमति तक पर प्रश्न उठ रहे हैं। ये स्वाभाविक हैं। जब शुक्रवार को आरा में ही भरपूर बवाल और इससे जुड़ा मूड बिल्कुल खुले में आ चुका था, तब इसे राजधानी तक विस्तारित होने की गुंजाइश देना क्या कहलाएगा? यह पुलिस-प्रशासन का कौन सा दिमाग है? फिर, क्या शवयात्रा का यह लम्बा रूट, वाकई सिर्फ बरमेश्वर मुखिया के घर वालों का आग्रह था?

स्वरूप, इसके मूड में उनका योगदान था या यह सब उस प्लान का हिस्सा है, जिसका बड़ा पार्ट पटना जिला में प्रवेश करते ही निभाया जाना शुरू हो गया? उत्पात मचाने वालों से सबने अपना-अपना पल्ला झाड़ लिया है। राजधानी में जब हंगामा व आगजनी शुरू हुई, तब शवयात्रा के साथ चल रहे लाउडस्पीकर लगे वाहन से एनाउंस होने लगा कि जो लोग उपद्रव कर रहे हैं उनको पहचानिए। वे हमारे लोग नहीं हैं।

इस लाइन पर कई नेताओं के बयान भी आए हैं। उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने तो यहां तक कहा है कि शवयात्रा के दौरान कुछ असामाजिक तत्वों ने स्थिति का नाजायज फायदा उठाते हुए उत्पात मचाया है। ऐसा अक्सर होता है। विरोध प्रदर्शन का कोई भी मौका हो, उत्पात विधिवत समर्थन पाता है। नेता, बच्चों से पुतले के मुंह में पेशाब कराता है। और बदनामी के बाद इससे बचाव को बड़ा ही सहूलियत वाला शब्द, तर्क आ जाता है-अज्ञात असामाजिक तत्व। यह उत्पात का संरक्षण है? इसीलिए उत्पाती बचे हैं? हमेशा उत्पात हो जाता है। मगर यह हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह अपनी खातिर इसका ध्यान रखे कि ऐसे अराजक तत्वों के चलते पुराने दिन लौट न आएं।

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