पुलिस भर्ती बोर्ड के अधिकारियों के खिलाफ मुकदमें वापस

सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्वकाल में 2004-05 में लगभग 18 हजार 650 सिपाहियों की भर्ती की गयी थी। पूर्व मु यमंत्री मायावती ने भर्ती में व्यापक पैमाने पर घोटाला होने का आरोप लगाते हुए सिपाहियों की भर्ती को निरस्त करते हुए उन्हें बर्खास्त कर दिया था और भर्ती बोर्ड के अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई की थी।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सिपाहियों की बर्खास्तगी के मायावती सरकार के फैसले को गलत करार देते हुए उन्हें पुन: बहाल करने का आदेश दिया था और जांच के लिए बनी समिति पर भी सवाल उठाए थे। न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ मायावती सरकार ने उच्चतम न्यायालय में अपील की थी। उच्चतम न्यायालय ने भी उच्च न्यायालय के फैसले को सही करार देते हुए राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया था।
मायावती सरकार ने सिपाहियों को तो बहाल कर दिया लेकिन अधिकारियों को दंडित करने का फैसला वापस नहीं लिया था। मंत्रिमंडल की बैठक में भर्ती बोर्ड के अधिकारियों के खिलाफ चल रहे मामले को वापस लेने का निर्णय लिया गया। इस निर्णय से बोर्ड में शामिल भारतीय पुलिस सेवा के 25 और प्रांतीय पुलिस सेवा के 110 अधिकारियों को राहत मिलेगी। सरकार ने इन अधिकारियों के खिलाफ चल रही विभागीय जांच को भी वापस लेने का निर्णय किया है।
इन अधिकारियों के खिलाफ चल रहे मामले की वजह से इनकी प्रोन्नति में बाधाएं थीं। मायावती सरकार ने 13 जून, 2007 में बहुजन समाज पार्टी विधायक इरशाद अली की शिकायत पर वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी शैलजाकांत मिश्र को इसकी जांच सौंपी और बाद में भ्रष्टाचार निवारण संगठन के तत्कालीन अपर पुलिस महानिदेशक रामलाल राम की अध्यक्षता में बनी कमेटी को इसकी पूरी जांच करने के आदेश दिये। जांच समिति ने 15 सितंबर, 2007 में भर्ती में व्यापक पैमाने पर घोटाले की रिपोर्ट दी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भर्ती सिपाहियों को राहत पहुंचाते हुए जांच समिति गठित करने के आदेश को ही रद्द कर दिया।












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