क्या भारत को राष्ट्रपति पद पर कठपुतली चाहिये?

देश भर में राष्ट्रपति चुनाव को लेकर चर्चाएं गर्म हैं। हर जगह यही चर्चा हो रही है कि किस पार्टी ने किसके नाम का प्रस्ताव दिया है। अगर पिछले कुछ हफ्तों पर नजर डालें तो जिन-जिन लोगों के नाम विभिन्न पार्टियों ने दिये हैं, उनमें से किसी ने भी खुलकर देश का प्रथम नागरिक बनने की इच्छा जाहिर नहीं की है। हां किसी ने इंकार भी नहीं किया है। लेकिन इस दिशा में यूपीए सरकार की चाल पर नजर डालें तो कहीं न कहीं आप को भी लगेगा कि कांग्रेस राष्ट्रपति पद पर भी कठपुतली को बिठाना चाहती है।
जैसा कि अनुमान था, वैसा ही हुआ, राजनीतिक पार्टियां सक्षम व्यक्तियों को भूल गईं और ऐसे लोगों के नाम लेकर आगे आने लगीं, जिन्हें राष्ट्रपति बनाने के बारे में वोटर को भी कई बार सोचना पड़ेगा।
सबसे पहले समाजवादी पार्टी ने डा. एपीजे अब्दुल कलाम का नाम प्रस्तावित किया। नाम के आते ही देश भर में चर्चाएं गर्म हो गईं कि कलाम साहब दोबारा देश के राष्ट्रपति बन सकते हैं। खास बात यह है कि डा. कलाम ने भी इस बात से इंकार नहीं किया है कि वो इस पद पर दोबारा नहीं आना चाहते। भाजपा ने कहा है कि वो कलाम के नाम पर मुहर तभी लगायेगी जब पार्टी के सभी नेता राजी होंगे।
फिर एकदम से नाम उजागर हुआ प्रणब मुखर्जी का। माना जा रहा है कि प्रणब दा यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की च्वाइस हैं। हालांकि तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी ने प्रणब मुखर्जी के नाम पर कुछ नहीं कहा है। डीएमके और एनसीपी नेता प्रणब पर अपनी मुहर लगा चुके हैं।
सामान्य रूप से देखा जाता है कि सत्ताधारी गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का चयन करती है, जिसका बाकी दल सहयोग करते हैं, लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा। कांग्रेस अपना प्रत्याशी अन्य सहयोगी दलों पर थोप नहीं पायेगी। लिहाजा कांग्रेस इस समय अपने सहयोगियों और विपक्षी दलों के सांसदों को मनाने का काम कर रही है। हालांकि यह सब कुछ अंदर ही अंदर हो रहा है।
अभी राष्ट्रपति चुनाव में थोड़ा समय है। लेकिन एक बात लगभग तय हो चुकी है कि इस बार का राष्ट्रपति राजनीति के बैकग्राउंड वाला होगा। और हो सकता है कि इस बार का राष्ट्रपति कमजोर भी हो।
क्योंकि कांग्रेस पूरी कोशिश करेगी कि ऐसा व्यक्ति राष्ट्रपति बने जो उसके इशारों पर चल सके। विडंबना इस बात की है कि जिस देश की जनसंख्या 120 करोड़ है वहां राष्ट्रपति पद के लिए उपयुक्त व्यक्ति नहीं मिल रहा है। किसी ने भी वैज्ञानिकों, उद्यमियों, उद्योगपतियों की ओर नहीं देखा, जो राष्ट्रपति बनने लायक हैं।
अगर पिछले राष्ट्रपतियों की बात करें तो देश को सबसे अच्छे राष्ट्रपति के रूप में डा. राजेन्द्र प्रसाद और डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन मिले, जिन्होंने 50 और 60 के दशक में देश को नई दिशा दिखाई।
उन्होंने कई मील के पत्थर स्थापित किये। 70 के दशक में हमारे देश में ऐसे भी राष्ट्रपति हुए जिन्होंने इंदिरा गांधी की कैबिनेट की उस सिफारिश पर हस्ताक्षर कर दिये, जिसमें देश में इमर्जेंसी लगाने की बात कही गई थी। फखरुद्दीन अहमद का वो फैसला हमारे लोकतंत्र का काला अध्याय था।
कुछ और वर्ष आगे बढ़ें तो ज्ञानी जैल सिंह, जो इंदिरा गांधी को लेने के लिए राष्ट्रपति भवन से निकल कर बाहर तक आते थे। हालांकि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तब उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया।
ऐसे कई वाक्ये हैं, जिससे पता चलता है कि राष्ट्रपति भी राजनीतिक दलों की कठपुतलियां रहे हैं। आज भी कुछ ऐसी ही स्थिति बनती दिखाई दे रही है। अब देखना यह है कि देश में क्या कुछ ऐसा फिर से होता है?
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