गर्मी से पहले वापस लौट गये विदेशी मेहमान

देशी मुनिया प्रजाति के पक्षी ग्रीष्मकाल में आनन्द लेने तथा प्रजनन के लिये यहां के जंगलों में डेरा जमा रहे हैं तथा अपने नवजात शिशु के साथ सुख एवं शान्ति के साथ रहने के लिये अपने परिवार के साथ अलग अलग घोंसला बना रहे हैं। देश के विभिन्न अंचलों से सैकडों किलोमीटर की यात्रा तय करके भारी सं या में पक्षी यहां आ रहे हैं।
विंध्य क्षेत्र की प्राकृतिक सुर य वादियों में अजब नजारा है। देश केविभिन्न भागों से आये देशी प्रजाति के पक्षी अलग अलग पेड़ों की डालियों पर शोभायमान हैं। इनके कलात्मक घोंसले एक अलग आर्कषण पैदा कर रहे हैं। इन पक्षियों की चहचहाहट का शोर किसी संगीत से कम नहीं है। ग्रीष्मकालीन मौसम इनके लिये अनुकूल रहता है।
लिहाजा देश के विभिन्न राज्यों से अलग अलग प्रजाति के पक्षी लंबी यात्रा कर ग्रीष्मकाल में प्रजजन क्षेत्र में यहां आते हैं। यह पक्षी पर्यावरण एवं भोजन के लिये उपयुक्त प्रजनन क्षेत्र में बसन्त काल के बाद मार्च-अप्रैल में बच्चों को पालते हैं क्योंकि मार्च-अप्रैल माह में घास के मैदानों मे जड़ी-बूटियों पर बहार रहती है। केवल सेमल ही 60 प्रजातियों के पक्षियों को आकर्षित कर लेता है। अधिकंाश पक्षी अपने प्रतिदिन रहने के लिये घोसला नहीं बनाते।
उन्हें केवल प्रजजन काल में अंडे देकर बच्चों को सेने के लिये ही घोंसले बनाने की आवश्यकता पड़ती है। कुछ पक्षी प्रजातियों में घोंसला बनाने का कार्य केवल नर करता हैतो कुछ प्रजातियों में नर-मादा दोनों मिलकर बनाते हैं। इन पक्षियों का संसार ही कुछ अलग होता है। इन पक्षियों में भी मान स्वभावगत ईष्र्या का भाव पाया जाता है। ये अपने-अपने घोंसले को कलात्मक रुप देने के लिये एक दूसरे से होड़ रखते हैं। इनके परिवारों में भी मादा पक्षियों का ही आदेश चलता है।












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