अखिलेश के राज में नहीं बंटेगा उत्‍तर प्रदेश

Chief minister of Uttar Pradesh Akhilesh Yadav
लखनऊ। बसपा सरकार में जहां उत्‍तर प्रदेश के बंटवारे का मुद्दा जोर-शोर से उठा था वहीं सपा शासन के आने के पहले ही यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया। विभाजन के वक्त सपा नेताओं ने जिस प्रकार विभाजन का विरोध किया था उससे लगता है कि अब प्रदेश का विभाजन नहीं होगा। बसपा प्रमुख व कार्यवाहक मुख्यमंत्री मायावती ने अपने शासनकाल में राज्य को बुंदेलखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, अवध प्रदेश और पूर्वी उत्तर प्रदेश में विभाजित करने का प्रस्ताव विधानसभा से पारित कराने के बाद केन्द्र सरकार को मंजूरी के लिये भेजा था।

बसपा सरकार ने गत 21 नवम्‍बर को विधानसभा में राज्य को चार हिस्सों में बांटने का एक लाईन का प्रस्ताव पारित किया था। प्रस्ताव पर न तो बहस हुई थी और न रायशुमारी ही। पूर्णबहुमत प्राप्त कर प्रदेश में सरकार बनाने जा रही सपा ही एकमात्र ऐसी पार्टी थी जिसनें राज्य विभाजन का खुला विरोध किया था। पार्टी का साफ कहना था कि छोटे राज्यों का विकास जल्द होता है इस बात में दम नहीं रह गया। उत्तराखंड को अलग करने का भी सपा ने विरोध किया थ। सपा का कहना है कि उत्तर प्रदेश का विभाजन कभी मुद्दा नहीं रहा। सही मुद्दे से ध्यान हटाने के लिये राज्य विभाजन का शिगूफा छोड़ा गया था।

यूपी में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में बड़े घोटाले हुये, बसपा सरकार ने इन घोटालों से जनता का ध्यान हटाने के लिए राज्य के विभाजन का मुददा उठाया था। सपा प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने कहा कि राज्य को चार हिस्सों में विभाजित करने का प्रस्ताव विधानसभा में असंवैधानिक तरीके से पारित कराया गया, प्रस्ताव पर कोई बहस नहीं हुई।

मायावती ने एक लाइन का प्रस्ताव पढ़ा और सदन की बैठक अनिश्चितकाल के लिये स्थगित कर दी गयी। उन्होंनें कहा कि राज्य की जनता कोई विभाजन नहीं चाहती यह सपा को मिले बहुमत ने साबित कर दिया है। विधानसभा चुनाव करीब देख केन्द्र सरकार ने बसपा सरकार की ओर से भेजे गये प्रस्ताव को कुछ आपत्तियों के साथ गत 16 दिस बरको वापस कर दिया। केन्द्र सरकार ने प्रस्तावित अलग राज्य की सीमा, उनके आधारभूत ढांचे और राजस्व आदि को लेकर आपत्ति की थी।

बुंदेलखंड, पश्चिमी प्रदेश और पूर्वाचल को अलग राज्य बनाने की कई सालों से हो रही मांग को देखते हुये संभवत: राज्य सरकार ने विभाजन का प्रस्ताव रखा। बसपा का मकसद इसका राजनीतिक फायदा लेना था। बसपा यह मानती थी अलग राज्य को लेकर कुछ हिस्सों में आन्दोलन होंगे और उसका समर्थन कर विधानसभा चुनाव में फायदा उठाया जा सकेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। चूंकि यह अलग राज्य का प्रस्ताव बसपा ने किया था इसीलिये इसका समर्थन या विरोध कांग्रेस तथा भाजपा ने नहीं किया।

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