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राजनीति के गलियारे में कहां निकल गये पुराने दोस्‍त

लखनऊ। उत्‍तर प्रदेश की बागडोर मायावती ने थामी तो उनके दो करीबियों के नाम चमकने लगे। पहले थे बाबू सिंह कुशवाहा और दूसरे नसीमुद्दीन सिद्दीकी। विपक्षियों की माने तो दोनों ही मायावती के लिए पैसा एकत्र करने का काम करते थे लेकिन वर्तमान समय में समीकरण पूरी तरह से बदल चुके हैं। दोनों ही लोकायुक्त की जांच के जद में हैं फर्क यह है कि एक बसपा में हैं जबकि दूसरे को पार्टी से निकाला जा चुका है।

बसपा से निकाले जाने के बाद कुशवाहा अब भारतीय जनता पार्टी के लिए वोट मांग रहे हैं। जबकि लोक निर्माण समेत 18 विभाग संभाले श्री सिद्दीकी बसपा की सरकार दोबारा बनवाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। ज्ञात हो कि विधानसभा के लिये 2007 के चुनाव में नसीमुद्दीन सिद्दीकी तथा कुशवाहा ने साथ साथ बसपा का प्रचार किया था। दोनों नेताओं के प्रयास का नतीजा था कि बुंदेलखंड की 21 सीटों में पार्टी को 16 सीटें मिल गयी थीं।

आज हालात इस कदर बदल चुके हैं कि सिद्दीकी अपने पुराने दोस्त कुशवाहा को गद्दार कहने में भी संकोच नहीं करते। उन्होंने बाबू सिंह कुशवाहा पर कई आरोप लगाए जिसमें उन्होंने कहा कि कुशवाहा नेता ही नहीं है वह तो बसपा में प्रबंधक की हैसियत से थे। कुशवाहा वोट बैंक पर खास पकड रखने वाले कुशवाहा भाजपा में आये लेकिन सीबीआई के छापे और पार्टी के बडे नेताओं के विरोध के कारण उनकी सदस्यता स्थगित कर दी गयी। हालांकि वह कुशवाहा बाहुल्य इलाके में वह भाजपा के लिये वोट मांग रहे हैं।

कुशवाहा का कहना है कि वह बसपा में बाईस साल तक रहे लेकिन उनकी वफादारी का सिला मायावती ने उन्हें पार्टी से निकाल कर दिया। उनके दिल में मायावती के कई राज दफन हैं यदि जुबान खुल गयी तो मायावती मुश्किल में पड सकती हैं। बुंदेलखंड के बांदा, महोबा, हमीरपुर और जालौन में आज हो रहे मतदान में पिछड़े वोट बड़ी संख्या में हैं। सभाओं में उन्हें लोगों ने ध्यान से सुना है। कुशवाहा की बातें भाजपा के लिये वोट में कितना तब्दील हुई यह आगामी छह मार्च को पता चलेगा।

विधानसभा के पिछले चुनाव में उनके साथ मंच पर सभा करने वाले सिद्दीकी और कुशवाहा के नेता होने पर ही सवाल खडा करते हैं। उनका कहना है कि वह तो बसपा में प्रबन्धक के तौर पर थे जो पार्टी मामले का प्रबन्ध किया करते थे। सिद्दीकी उन्हें गद्दार कहते हैं। उनका कहना है बाबू ङ्क्षसह ने बसपा की पीठ में छुरा भोंका है। मायावती ने उनके लिये बहुत कुछ किया। मंत्री बनाया लेकिन वह बसपा विरोधियों के साथ चले गये। पिछले एक सप्ताह में दोनों नेताओं ने अपने अपने दल के लिये बुंदेलखंड में जोरदार प्रचार किया और एक दूसरे पर शब्द बाण चलाये।

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