यूपी में अपनी जाति के भरोसे दिग्गज प्रत्याशी

BJP in UP Assembly polls
लखनऊ। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने कुछ समय पहले कहा था कि यूपी में जाति फैक्टर काम करता है। चुनाव में उनकी बात सच साबित होती नजर आ रही है। जाति के सहारे कई दिग्गज चुनावी जंग जीतने का सपना देख रहे हैं। कौन सी सीट पर सजातीय समीकरण क्या है और इससे उनको क्या फायदा होगा, चुनावी रणनीति में यह सर्वोपरि है।

जाति की हावी होती राजनीति में बाकी नारे व दावे पिछड़ गये हैं। जाति की इस जुगाड़ में शायद ही कोई नेता इसका अपवाद होगा। चाहे कभी राम मन्दिर आंदोलन के नायक कल्याण ङ्क्षसह हों, सोशल इंजीनियरिंग का प्रयोग करने वाली मुख्यमंत्री मायावती हों, सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव अथवा कोई और।

जाति की ही राजनीति का नतीजा है कि भाजपा उमा भारती को यूपी में लेकर आयी। प्रदेश विधानसभा में तेज तर्रार नेत्री उमा भारती ने चरखारी सीट महज इसलिए चुनी है क्योंकि वहां उनकी लोध बिरादरी के मतदाताओं की सं या लगभग पचास हजार है। इस इलाके में सिर्फ 2010 मुस्लिम हैं। लोध बिरादरी से अधिक मतदाता किसी भी जाति के यहां नहीं हैं। दूसरे न बर पर दलित और कुशवाहा मतदाताओं की तादाद बैठती है।

हिन्दू-मुस्लिम एकता का परचम लहराने का दावा करने वाले पीस पार्टी के डा. अयूब ने जिस खलीलाबाद सीट का चयन किया है वहां का जातीय आंकड़ा बताता है कि इस विधानसभा सीट पर एक लाख पन्द्रह हजार एक सौ मुस्लिम मतदाता हैं जबकि किन्हीं तीन-चार जातियों के लोगों की सं या भी जोड़ दी जाये तो यह आंकड़ा नहीं छुआ जा सकता है।

इसी तरह भाजपा के कलराज मिश्र ने लखनऊ पूर्वी पर उ मीदवारी का मन बनाया। इसकी भी वजह जाति का जुगाड़ ही है। इस सीट पर ब्राह्मण मतदाताओं की तादात 61909 है, सिर्फ 28070 मुस्लिम मतदाता हैं। दिलचस्प यह है कि धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देने वाली पार्टी कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी ने भी लखनऊ कैण्ट सीट का चयन जाति के जुगाड़ के मद्देनजर ही किया है। सपा के आजम खां जिस रामपुर विधानसभा सीट से जीत कर आते हैं वहां अकेले मुस्लिम मतदाताओं की तादाद 145000 है।

इस विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं के जातीय समीकरण पर नजर डाली जाये तो छह सात जातियां मिलकर भी मुस्लिम मतदाताओं को छू पाने की स्थिति में नहीं होती हैं। कभी राम जन्मभूमि के केन्द्र बिन्दु रहे कल्याण सिंह ने भी अपने लिए अतरौली सीट सिर्फ इसलिए चुनी थी क्योंकि वहां पर लोध जाति के 50993 मतदाता हैं। रालोद अध्यक्ष अजित सिंह ने अपने बेटे जयंत चौधरी को जिस माठ विधानसभा क्षेत्र से उतारा है उसके पीछे का आधार भी बिरादरी के वोटर हैं।

यहां जाट बिरादरी के 45 हजार मतदाता हैं। मुलायम सिंह भी बदायूं जिले की जिस गुन्नौर सीट को अपना अभेद किला समझते हैं उसकी वजह भी जातीय समीकरण ही है। गुन्नौर में यादव मतदाताओं की तादाद एक लाख 40 हजार 229 हैं। इस विधानसभा क्षेत्र में हालांकि इस बार वह प्रत्याशी नहीं हैं लेकिन यह किन्हीं आठ जातियों के मतदाताओं की सं या जोड़ दी जाये तो भी यादव मतदाताओं की सं या से बहुत पीछे रह जाती है।

सोशल इंजीनियरिंग की मुहिम चलाने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती अम्‍बेडकरनगर के अब आलापुर और सहारनपुर के हरोड़ा से विधानसभा चुनाव लड़ चुकी हैं। इसके पीछे भी आधार जातीय मतदाताओं का था। हरोड़ा में मायावती के बिरादरी के वोटरों की सं या तकरीबन 75 हजार बैठती है। मुस्लिम मतदाताओं को छोड़ दें तो दस जातियों की सं या मिलकर इसके बराबर नहीं आती। अम्‍बेडकरनगर की आलापुर सीट पर भी अनुसूचित जाति के मतदाताओं की तादाद लगभग 65 हजार है।

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